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उस जमाने में लेखक के बतौर ‘अजय-अशोक’ का नाम देखते ही पत्रिकाएं खरीद लेते थे पाठक!

कुछ नयी पुरानी खट्टी-मीठी यादें… मित्रों.. आज उत्तर प्रदेश में हजारों की संख्या में न्यूज़ पेपर, मैगज़ीन और सैंकड़ों की संख्या में न्यूज़ चैनल उपलब्ध हैं … और खबरों की भी आपाधापी है… सन 1970 से सन 2000 तक राष्ट्र स्तरीय पत्रिकाएं  “सत्यकथा” और “मनोहर कहानियां” के जनक तथा अपनी कलम से उस दौर की जो कहानियां उन्होंने लिखी वो आज भी इतिहास के दस्तावेजों की तरह लोगों ने सम्भाल कर रखी हुई हैं … तथा “माया” सामयिक समाचार पत्रिका भारत की हिंदी की सबसे प्रमुख पत्रिका हुआ करती थी….

कुछ नयी पुरानी खट्टी-मीठी यादें… मित्रों.. आज उत्तर प्रदेश में हजारों की संख्या में न्यूज़ पेपर, मैगज़ीन और सैंकड़ों की संख्या में न्यूज़ चैनल उपलब्ध हैं … और खबरों की भी आपाधापी है… सन 1970 से सन 2000 तक राष्ट्र स्तरीय पत्रिकाएं  “सत्यकथा” और “मनोहर कहानियां” के जनक तथा अपनी कलम से उस दौर की जो कहानियां उन्होंने लिखी वो आज भी इतिहास के दस्तावेजों की तरह लोगों ने सम्भाल कर रखी हुई हैं … तथा “माया” सामयिक समाचार पत्रिका भारत की हिंदी की सबसे प्रमुख पत्रिका हुआ करती थी….

एक समय ऐसा भी था जब “मनोहर कहानिया” पूरे भारत में सबसे ज्यादा बिकने वाली हिंदी पत्रिका थी… बहुत से पाठक पत्रिकाएं खरीदते समय विशेष रूप से ये देखते थे कि इस अंक में किन-किन रिपोर्टरों और लेखकों की रिपोर्ट और कहानियां प्रकाशित हुई हैं… और जब उस लिस्ट में “अजय-अशोक” का नाम देखते थे तो वो पत्रिका उन्हें खरीदनी ही पड़ती थी… इसी तरह भारत के कई और भी प्रख्यात लेखक और रिपोर्टर हुआ करते थे… जिनके नाम से ही पत्रिकाएं बिक जाती थीं…

मेरे जीवन का बहुत बड़ा सौभाग्य रहा कि मैंने इन दोनों महान हस्तियों ”अजय-अशोक” से बहुत कुछ सीखा और इनके साथ फोटोग्राफी कर के अपने जीवन का स्वर्णकाल व्यतीत किया… आज भी इनका स्नेह, प्यार और भरपूर आशीर्वाद सदैव हमारे साथ रहता है… आज हम तीनों फिर इकट्ठे हुए और पुरानी खट्टी-मीठी यादें ताज़ा हुईं…

फोटो में… बाएं से.. श्री अशोक शुक्ल जी.. बीच में मैं मनमोहन शर्मा.. और श्री अजय कुमार जी…

लखनऊ के वरिष्ठ फोटोग्राफर मनमोहन शर्मा की फेसबुक वॉल से.

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