आनंद कुमार शर्मा-
अजमेर। अजयमेरु प्रेस क्लब की विशेष साधारण सभा शनिवार दोपहर 12:15 बजे जैसे ही शुरू हुई, माहौल कुछ ऐसा था मानो यह कोई साधारण बैठक नहीं, बल्कि “प्रेस कॉन्फ्रेंस ऑफ करंट अफेयर्स” चल रही हो। बैठक का सबसे बड़ा मुद्दा यही था — चुनाव वित्तीय वर्ष के आधार पर हों या फिर गुंजल के मूड के अनुसार!
गुप्त मतदान हुआ, लेकिन परिणाम अधिक देर तक गुप्त नहीं रह पाए। डॉ. रमेश अग्रवाल को 25 मत मिले, जबकि राजेंद्र गुंजल को मात्र 16 वोट ही हासिल हुए। तीन सदस्यों ने तटस्थ रहना ही उचित समझा। परिणाम ने साफ कर दिया कि डॉ. रमेश अग्रवाल ने एक बार फिर प्रेस क्लब की कमान अपने हाथों में ले ली है।
राजेंद्र गुंजल की कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं। कभी वे डॉक्टर रमेश अग्रवाल की उँगली पकड़कर क्लब में प्रवेश करने वाले सदस्य थे, लेकिन दिसंबर 2024 में उन्होंने उसी गुरु को क्लब से बाहर का रास्ता दिखा दिया। गुरु-शिष्य परंपरा में ऐसा मोड़ शायद कालिदास ने भी नहीं लिखा होता।
गुंजल के कार्यकाल में क्लब का स्वरूप धीरे-धीरे बदलकर “अजयमेरु रिटायर्ड जर्नलिस्ट वेलफेयर सोसाइटी” जैसा दिखने लगा। वहाँ अब वही सदस्य बचे थे, जिनकी प्रेस कॉन्फ्रेंस में उपस्थिति अब केवल यादों तक सिमट चुकी थी।
साल 2024 में गुंजल ने क्लब को अपनी ही शैली में ढालना शुरू किया — “जो बोले वही बाहर।” नतीजा यह हुआ कि नवाब हिदायत उल्ला, आनंद शर्मा और विकास छाबड़ा जैसे सक्रिय पत्रकारों को क्लब से निष्कासित कर दिया गया। पत्रकारों के बीच कहावत चल पड़ी — “जो कलम चलाएगा, वो सदस्यता गंवाएगा।”
गुंजल ने अपने विरोधियों को खत्म करने के लिए डॉक्टर रमेश अग्रवाल के कंधे पर बंदूक चलाने की रणनीति अपनाई। उन्होंने अग्रवाल को यह कहकर भ्रमित किया कि “ये लोग आपके विरोधी हैं और आपके सामने चुनाव लड़ने के इच्छुक हैं।” इसी बहाने उन्होंने क्लब से एस.पी. मित्तल, गिरधर तेजवानी, प्रेम आनंदकर, राजेंद्र याज्ञनिक, मनवीर सिंह चुंडावत , सुरेश कासलीवाल, दिनेश पाराशर अभिजीत दवे अशोक और विजय मौर्य जैसे वरिष्ठ एवं सम्मानित पत्रकारों को बाहर का रास्ता दिखा दिया। यह वही लोग थे जिन्होंने क्लब की नींव मजबूत की थी और इसे पहचान दिलाई थी।
कहते हैं — “भोले का भगवान होता है।” यही बात डॉक्टर रमेश अग्रवाल पर भी खरी उतरी। उन्होंने अपमान और अन्याय के बावजूद धैर्य नहीं खोया, और आखिरकार वही व्यक्ति आज फिर से क्लब की कमान संभाल रहे हैं। समय ने एक बार फिर दिखा दिया कि कर्म का फल देर से ही सही, लेकिन अवश्य मिलता है।
अब निगाहें दिसंबर में होने वाले आगामी चुनावों पर टिकी हैं — देखना यह है कि क्या ‘गुंजल’ नाम का मकड़जाल फिर बुना जाएगा या डॉक्टर अग्रवाल उस पर प्रेस की कैंची चलाकर क्लब में पारदर्शिता और निष्पक्षता की नई परंपरा स्थापित करेंगे।
वरिष्ठ पत्रकार स्वर्गीय नरेंद्र राजगुरु ने भी कभी राजेंद्र गुंजल को उनकी अवैध गतिविधियों के कारण क्लब से निष्कासित किया था। इसके बावजूद गुंजल ने हमेशा क्लब को अपने नियंत्रण में रखने की कोशिश की, मानो यह कोई छात्र संगठन हो जहाँ केवल उनकी ही चले। विरोधियों की राह में रोड़े अटकाना और असहमति की हर आवाज़ को दबाना उनकी कार्यशैली बन गई।
गुंजल अक्सर यह दावा करते सुने जाते हैं कि पत्रकारों को प्लॉट आवंटन कराने की पहल उन्होंने ही पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से की थी। वे अपने गुर्जर समाज की पहचान और राजनीतिक संपर्कों का लाभ लेने से भी नहीं चूकते। कभी वे भाजपा के केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव को अपना कॉलेज कार्यकारिणी सहयोगी बताते हैं, तो कभी सचिन पायलट से नज़दीकी का बखान करते हुए खुद को “दोनों दलों के बीच का पुल” कहते हैं।
असल में, राजेंद्र गुंजल की यही दोहरी राजनीति और आत्मप्रशंसा की आदत क्लब में लगातार विवादों की जड़ रही। वहाँ पत्रकारिता की चर्चा कम और व्यक्तिगत बढ़ाई ज़्यादा सुनाई देती रही।
अजयमेरु प्रेस क्लब के इस महासंग्राम ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि अंततः जीत उसी की होती है जो सच्चाई, संयम और समर्पण के साथ खड़ा रहता है। कलम की ताकत को दबाने की कोशिश चाहे कितनी भी क्यों न हो, लेकिन सच्चे पत्रकार की स्याही कभी सूखती नहीं — और इस बार भी उसने इतिहास रच दिया।
–आनंद कुमार शर्मा, पूर्व महासचिव
अजयमेरु प्रेस क्लब, अजमेर



