अमर उजाला अल्मोड़ा के चीफ ब्यूरो दीप जोशी नहीं रहे

अमर उजाला अल्मोड़ा के चीफ ब्यूरो, रंगकर्मी तथा समाजसेवी दीप जोशी का अचानक देहांत हो गया. श्री जोशी पिछले कुछ समय से बीमार थे. दिल्ली में उनका उपचार चल रहा था. रंगकर्मी, समाज सेवी, संवेदनशील पत्रकार श्री जोशी करीब २५ साल से अल्मोड़ा में सेवा कार्य में लगे थे.

पढ़िए अविकल थपलियाल, निशीथ जोशी और विनोद कापड़ी की श्रद्धांजलियां-

Avikal Thapliyal-

पिछले कुछ दिनों से बीमार चल रहे अल्मोड़ा के पत्रकार साथी दीप जोशी नहीं रहे।दीप जोशी ने सोमवार को दिल्ली के अस्पताल में अंतिम सांस ली। फेफड़ों के संक्रमण से जूझ रहे थे। नेशनल हार्ट इंस्टिट्यूट में दीप जोशी एडमिट थे। बेहतर पत्रकार होने के साथ दीप जोशी सामाजिक व सांस्कृतिक कार्यों में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेते रहे। दीप जोशी अमर उजाला के साथ कई साल जुड़े रहे।उनके निधन पर पत्रकार संगठनों,राजनीतिज्ञ व सामाजिक क्षेत्र दे जुड़े लोगों ने गहरा दुख व्यक्त किया है।

दीप जोशी से मेरा लगभग 20 साल पुराना सम्बन्ध रहा। हिंदुस्तान लखनऊ से देहरादून आने के बाद अल्मोड़ा में अमर उजाला देख रहे दीप जोशी से लगातार बात होती रही। अल्मोड़ा में ही हिंदुस्तान देख रहे बड़े भाई गोविंद कपट्टियाल के जरिये ही दीप जोशी जी से सम्पर्क हुआ। मैंने उन्हें बेहद सरल,हँसमुख,दयालु प्रकृत्ति का पाया।

दीप जोशी

2001 में पत्रकार साथियों ने देहरादून में मीडिया एक्शन ग्रुप की नींव डाली थी। अल्मोड़ा की जिम्मेदारी दीप जोशी को ही सौंपी गई। इस संगठन की सबसे ज्यादा गतिविधि अल्मोड़ा में ही देखी गयी।

2008 में देहरादून में हिंदुस्तान की लॉन्चिंग के समय दीप जोशी भाई को ब्यूरो टीम के लिए चुन लिया गया था। उन्हें देहरादून रहकर रिपोर्टिंग करनी थी। सब कुछ फाइनल हो गया था। लेकिन सम्भवतः अल्मोड़ा प्रेम की वजह से वो देहरादून आने की हिम्मत नही जुटा सके। मुझसे बार बार सॉरी कहते रहे। मैं भी उनके मनोभाव व बेबसी समझ रहा था।

बेशक, दीप भाई देहरादून नहीं आ सके लेकिन उनके साथ सम्बन्ध बने रहे। 2016 के शुरुआती महीने में राज्य वित्तीय आयोग की अल्मोड़ा में हुई बैठक के बाद शाम को कारखाना बाजार में साथ साथ चाय पी और गपशप की। बाजार के होटल में चाय की चुस्कियों के बीच नगर पालिका अध्यक्ष प्रकाश जोशी जी का भी साथ मिला। काफी देर तक बाजार में टहलते रहे।

दीप भाई बार बार अल्मोड़ा में कुछ दिन और रुकने का अनुरोध करते रहे। दीप जोशी अल्मोड़ा में पत्रकारिता, सांस्कृतिक व सामाजिक सक्रियता के पर्याय थे। उनके परिजनों को शक्ति दे। भावभीनी श्रद्धांजलि, ॐ शांति, सादर नमन….

Nisheeth Joshi-

स्मृति शेष। श्रद्धांजलि दीप जोशी।।। ॐ शांति, शांति, शांति।।। ॐ

आज सुबह से सोशल मीडिया पर पढ़ रहा हूं अपना दीप जोशी चला गया। अमर उजाला के अभिषेक सिंह की पहली पोस्ट थी जिससे यह जानकारी मिली। सोच रहे हूं क्या दीप इस तरह जा सकता है। फिर पोस्ट दर पोस्ट यकीन करना ही पड़ता है कि दीप जोशी नामक जिस शरीर को अनंत अविनाशी आत्मा ने चोले के रूप में ओढ़ा था उसका त्याग कर दिया। पर दीप जिंदा हैं हमारी स्मृतियों में। हमारे हृदय में।

जब 2009 में अमर उजाला देहरादून का संपादक बना था, तब उससे पहली मुलाकात हुई थी। फिर फोन का सिलसला जारी रहा। वे अपनी व्यक्तिगत जीवन की समस्याओं को भी मुझसे साझा कर लेते थे। कभी अल्मोड़ा या हल्द्वानी में कोई काम या समाचार के बारे में जानकारी हासिल करनी होती थी तो दीप उन विश्वसनीय लोगों में थे जिनसे हम बात कर लेते थे। हम।अमर उजाला में रहे हों या कहीं और उनसे भी प्रेम और सम्मान मिला। दीप आप सदा सदा हमारे जीवन के एक सुखद हिस्से के रूप में जीवंत रहोगे। मदन जैडा वह पहले व्यक्ति थे जिनकी पोस्ट से आपके अस्पताल में होने की जानकारी मिली थी। उस समय हम कोरोना वायरस से पॉजिटिव हो कर आइसोलेशन में थे। अब ठीक हुवे तो आपके संबंध में यह मनहूस सूचना मिली।।

ईश्वर महान गुरुजनों से प्रार्थना है कि आपकी आत्मा को अपने हृदय में स्थान दें और जीवन मरण के चक्र से मुक्ति। आपके परिवार, मित्रों और शुभचिंतकों को इस आघात से उबरने की शक्ति भी।

Vinod Kapri-

अल्मोड़ा की आत्मा आज भी प्रकाशमान है

वो क्रिसमस की रात थी। इसी साल की क्रिसमस की रात , जब मैं अपने दोस्त जॉन के घर जा रहा था। कार अभी डीएनडी पर पहुँची ही थी कि फ़ोन बजा।

“दीप जोशी कॉलिंग” लिखा आ रहा था।दीप : मेरा अल्मोड़े वाला दोस्त। दीप : दिल्ली, नोएडा, मुंबई से पहाड़ को देखने की मेरी एकमात्र खिड़की। दीप : उत्तराखंड में मेरी हर छोटी बड़ी समस्या का समाधान। फ़ोन उठाया तो दूसरी तरफ़ दीप नहीं था।एक महिला की घबराई हुई आवाज़ थी।

“ विनोद दा बोल रहे हैं क्या ? विनोद कापड़ी ? “

“ जी बताइए, विनोद बोल रहा हूँ “

“ विनोद दा , मैं हेमा बोल रही हूँ। दीप की पत्नी “

फ़ोन पर इससे पहले कभी दीप की पत्नी से बात नहीं हुई थी , इसलिए अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं था कि कुछ तो गड़बड़ है। कार की रफ़्तार अपने आप कम हो गई। फ़ोन स्पीकर फ़ोन पर ले लिया।

“ जी बोलिए “

“ मैं ये कह रही थी ना कि इनकी तबियत बहुत ख़राब है। हम लोग इनको दिल्ली ला रहे हैं।हल्द्वानी में अचेतावस्था में जाने से पहले “ये” कह रहे थे कि अगर दिल्ली ले जाओ तो विनोद कापड़ी को ज़रूर फ़ोन करना। वो सब देख लेगा। “
ये सब सुनते ही हाथ काँपने लगे।हेमा से बात करते हुए समझ में आया कि दीप को पहले बुख़ार था। अल्मोड़ा में तीन चार दिन तक बुख़ार समझ कर ही इलाज चलता रहा।फिर उसे हल्द्वानी लाया गया। पता चला कि उसे Typhus की वजह से लीवर में इंफ़ेक्शन है , जो अब बढ़ता जा रहा है और शरीर के बाक़ी हिस्सों पर भी असर करने लगा है। हल्द्वानी के डॉक्टरों ने दिल्ली ले जाने की सलाह दी है और फ़िलहाल वो उसे दीप के मित्र और National heart institute के सीईओ डॉ ओपी यादव के पास ले जा रहे हैं। लेकिन चूँकि दीप ने कहा था कि “दिल्ली ले जाओ तो विनोद को ज़रूर बताना “ तो मुझे लगा कि मेरा फर्ज बनता है कि मैं भी इस बीमारी के बेहतर इलाज के बारे में पता करूँ।एक दो फ़ोन से पता चल गया कि दिल्ली में लीवर से संबंधित किसी भी बीमारी के सर्वश्रेष्ठ इलाज के लिए ILBS Institute of liver and biliary sciences है , जो कि दिल्ली सरकार के अधीन आता है। तुरंत मित्र और आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह को फ़ोन लगा कर स्टैंड बाई पर रख दिया और कहा कि आपकी ज़रूरत पड़ सकती है। परिवार को डॉ यादव से लगातार अच्छे इलाज का भरोसा मिल रहा था , लिहाज़ा दीप को National heart institute ले जाया गया , जहां दीप ठीक भी होने लगा।

तीन चार दिन के इलाज के बाद दीप बात भी करने लगा था।ऐसा भी लगने लगा कि दीप को वॉर्ड में शिफ़्ट किया जा सकता है। फिर पता नहीं अचानक क्या हुआ कि दीप की तबियत बिगड़ने लगी। दीप का dialysis शुरू हुआ। platelets गिरने लगे।दीप का 20 साल का बेटा विक्रांत जब भी फ़ोन करता , मेरे एक फ़ोन पर छोटे भाई जैसा आप विधायक दिलीप पांडे एक घंटे के नोटिस पर platelets और खून का इंतज़ाम कर देते। पर यहाँ चिंता की एक बात थी – platelets और खून की माँग का ये सिलसिला रूक ही नहीं रहा था। 12 दिन में कम से कम नौ बार platelets चढ़ा दिए गए और सुधार कुछ नहीं। धीरे धीरे शरीर के बाक़ी अंगों ने भी काम करना बंद कर दिया। विक्रांत ने पिता के स्वस्थ होने की कामना के साथ व्रत रखना शुरू कर दिया। जब मुझे पता चला कि वो तीन दिन से व्रत पर है , तो मैंने उसे बहुत डाँटा।उसे समझाया कि 24 घंटे पिता के पास अस्पताल में रहने वाला बच्चा ही बीमार पड़ गया तो कौन देखेगा ? माँ को कौन सँभालेगा ? हालात विषम होते जा रहे थे लेकिन मुझे लगातार भरोसा रहा कि दीप को कुछ नहीं होगा।

अरे अभी वो पचास का भी नहीं हुआ है। अरे उसने मेरे साथ ही तो अमर उजाला में करियर शुरू किया था।

अरे ये कोई उम्र है कुछ होने की ?

फिर एक दिन शायद 8 जनवरी थी , जब हेमा का फ़ोन आया और उन्होंने कहा कि भाईसाहब यहाँ तो डॉक्टरों ने जवाब दे दिया है , कह रहे हैं कि 99.99% अब उम्मीद नहीं है। ये एक बड़ा झटका था। पर मुझे लगा कि .1% चांस तो अभी भी बाक़ी है। मुझे लगा कि ये चांस लिया ही जाना चाहिए। हेमा को कहा तो एक पल के लिए उन्होंने भी हिम्मत दिखाई।मैंने फिर से संजय सिंह से बात की। संजय ने टेलीकॉन्फ़्रेंस के ज़रिए ILBS के डॉक्टर से मेरी बात करवा दी।ख़तरा वो भी समझ रहे थे और ख़तरा परिवार के लोग भी जान रहे थे। ख़तरा था – इतने विषम हालात में शिफ़्टिंग के दौरान ही कुछ ना हो जाए ? दो दिन पहले ही जब मैं अस्पताल में परिवार से मिला तो ये तय किया गया कि .1% ठीक होने का चांस National heart institute में ही लिया जाए और एक दिन बाद कल विक्रांत का फ़ोन आया कि चाचू मैं आपको case summary भेज रहा हूँ।अगर ILBS के डॉक्टर बोलते हैं कि ज़रा भी चांस है तो हम शिफ़्ट कराते हैं। संजय सिंह को फिर संपर्क किया गया। पर इससे पहले कि case summary पर डॉक्टरों की कोई टिप्पणी आती , आधी रात को फिर से फ़ोन बजने लगा – “ दीप जोशी कॉलिंग “ । घड़ी पर समय देखा। रात के एक बज रहे थे। फ़ोन उठाने से पहले ही समझ आ गया था कि ये दीप के मोबाइल से आख़िरी कॉल है। डर के मारे फ़ोन ही नहीं उठाया। दो मिनट बाद एक अनजान नंबर से कॉल आया। सच से कितनी देर भागा जा सकता था ? फ़ोन उठाया तो दूसरी तरफ़ से आवाज़ आई –
“ विनोद दा , ललित जोशी बोल रहा हूँ … दीप नहीं रहा “

जवाब क्या दिया जा सकता था ? चुपचाप फ़ोन काट दिया। सुनते ही अचानक लगा कि कुमाऊँ की पहाड़ियों में बहुत तेज गड़गड़ाहट के साथ बारिश हो रही है और बड़े बड़े पहाड़ भरभरा कर गिरते जा रहे हैं और उन्हीं पहाड़ों के बीच दीप के साथ मेरा भी नामोनिशान मिटता जा रहा है क्योंकि मेरे लिए पहाड़ का मतलब बेरीनाग में मेरे गाँव के अलावा अल्मोड़ा में मेरा दोस्त दीप भी था।

“ यार दीप !! अल्मोड़े में शिखर में कमरा करा दे यार , रात को दारू पीते है “

“ सुन दीप , इस बार कसार देवी चलेंगे यार और तेरे साथ कुमाऊँनी गीतों की महफ़िल जमाएँगे “

“ यार दीप , अल्मोड़े में आजकल जाम बहुत रहता है। मैं अंदर नहीं आऊँगा। खीम सिंह मोहन सिंह के यहाँ से चार किलो बाल मिठाई ले कर बाइपास आ जा यार “

अब ये सब मैं पूरे अल्मोड़े में किसी से नहीं कह पाऊँगा।मेरे लिए अल्मोड़ा का मतलब सिर्फ़ दीप था और दीप के लिए अल्मोड़ा का मतलब जीवन था।

अमर उजाला में रहते हुए दीप को कई बार अच्छे ऑफ़र आए पर वो वहीं रहा। यहाँ तक कि अमर उजाला ने उसका प्रमोशन करके तबादला कर दिया।तब भी दीप ने प्रमोशन नहीं लिया और अल्मोड़ा ही रहा।

अमर उजाला छोड़कर जब मैं टेलीविजन में आया और अच्छा करने लगा तो मैंने ना जाने कितनी बार दीप से कहा होगा कि यार दीप अल्मोड़ा छोड़ , दिल्ली आ जा लेकिन वो हमेशा यही कहता रहा कि अल्मोड़ा छोड़ूँगा तो मैं मर जाऊँगा यार।
कौन जानता था कि अल्मोड़ा छोड़ कर दीप सच में मर जाएगा..

क्या पता वो इस बीमारी में भी अल्मोड़ा ही रहता तो शायद बच जाता !! पर एक बात मुझे पक्के तौर पर पता है कि दीप का शरीर अब भले ही कभी अल्मोड़ा नहीं लौटे पर उसकी आत्मा हमेशा अल्मोड़ा में ही रहेगी।

ध्यान से देखिए .. अल्मोड़ा की आत्मा का प्रकाश आज भी कितना सुनहरा है और कितना खिलखिला रहा है ..

एकदम दीप के चेहरे जैसा ..

  • भड़ास तक अपनी बात पहुंचाएं- bhadas4media@gmail.com

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