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सियासत

अर्जेंटीना बनाम भारत : सत्ता और पूंजी की प्रेमगाथा, आबाद से बर्बाद देश बनता अपना इंडिया!

यशवन्त सिंह-

एक समय था जब अर्जेंटीना दुनिया के सबसे अमीर देशों में शुमार था। 1900 से लेकर 1930 तक की अवधि में उसकी प्रति व्यक्ति आय जर्मनी, फ्रांस और इटली से अधिक थी। खेती उपजाऊ थी, गोश्त और अनाज का निर्यात दुनिया भर में होता था, और उद्योग तेज़ी से पनप रहे थे। लेकिन फिर अर्जेंटीना ने वह गलती की जो अक्सर उभरते राष्ट्र करते हैं — उसने लोकतंत्र को कॉर्पोरेट लॉबी के हाथों गिरवी रख दिया। सरकारें उद्योगपतियों की सेविका बन गईं और उद्योगपति नीति नियंता। फिर वही हुआ जो ऐसे गठजोड़ में होता है—प्रतिस्पर्धा मरी, नवाचार रुका, और देश ठहरने लगा।

अब भारत की ओर आइए। क्या हम वही राह तो नहीं पकड़ चुके हैं? क्या हम भी चमकदार आंकड़ों के पीछे गहराता अंधकार नहीं छिपा रहे?

2014 के बाद भारत में सत्ता और पूंजी के बीच जो नया विवाह हुआ, उसने लोकतंत्र की आत्मा को बाजार में बेचने जैसा काम किया। एक खास कॉरपोरेट घराना — अडानी समूह — हर क्षेत्र में सरकार की खुली बाँहों से आगे बढ़ता रहा। कोयला खदानें, हवाई अड्डे, बंदरगाह, रक्षा, डेटा सेंटर, कृषि लॉजिस्टिक्स… ऐसा कोई क्षेत्र नहीं बचा जहाँ उसे प्राथमिकता न मिली हो।

RTI कार्यकर्ताओं ने जब इस केंद्रित संसाधन आवंटन पर सवाल उठाए, तो या तो उनके आवेदन अनदेखे किए गए या उन्हें धमकाया गया। 2005 से लागू RTI कानून की बुनियादी आत्मा को एक-एक कर निष्क्रिय कर दिया गया। रिपोर्ट्स के अनुसार, 2024 तक 50 से ज़्यादा RTI कार्यकर्ताओं की हत्या हो चुकी है और सैकड़ों हमले हो चुके हैं। जब आँकड़ों तक पहुँच ही नहीं, तो सरकार के निर्णयों को कौन चुनौती देगा?

LIC और SBI जैसे सार्वजनिक संस्थानों में आम जनता के करोड़ों रुपए एक ही कॉर्पोरेट ग्रुप में लगाए गए — बिना पारदर्शी सार्वजनिक सहमति के। Hindenburg Research ने जब अडानी समूह पर स्टॉक हेराफेरी और अकाउंटिंग फ्रॉड के आरोप लगाए, तो सरकार ने जांच की बजाय “राष्ट्रद्रोह” का पर्दा लहराया। आज भारत में सवाल उठाना अपराध बन चुका है और पूंजीपतियों की सेवा ही देशभक्ति।

बात यहीं खत्म नहीं होती। अमेरिका की अदालतों में अडानी समूह के खिलाफ रिश्वतखोरी के गंभीर आरोप सामने आए हैं। 2024 के अंत में अमेरिकी न्याय विभाग (DOJ) और सिक्योरिटी एंड एक्सचेंज कमीशन (SEC) द्वारा दायर मामलों में दावा किया गया कि सरकारी ठेके लेने के लिए विदेशों में करोड़ों डॉलर की घूस दी गई। अब ये आरोप भारत की छवि को अंतरराष्ट्रीय मंच पर धूमिल कर रहे हैं।

अर्जेंटीना की तरह भारत में भी “विकास” का सारा फायदा कुछ ही हाथों में सिमटता जा रहा है। MSME सेक्टर, जो देश में 90% से अधिक रोजगार पैदा करता है, उसके लिए न तो टैक्स रियायत है, न सस्ती ज़मीन, न सरकारी खरीद में हिस्सेदारी। लेकिन बड़े उद्योगपतियों को एक के बाद एक कानूनों में ढील दी जा रही है। कृषि कानूनों में अडानी समूह की मांग पर Essential Commodities Act को कमजोर किया गया ताकि वे भंडारण कर सकें। जब किसानों ने इसका विरोध किया तो उन्हें ‘आंदोलनजीवी’ और ‘देशद्रोही’ करार दिया गया।

क्या ये वही मार्ग नहीं जिस पर चलकर अर्जेंटीना रसातल में गया? वहां भी सरकारें टैक्स, सब्सिडी और ज़मीन का दानपत्र बनाकर अपने पूंजीपति मित्रों को देती रहीं। प्रतियोगिता खत्म हो गई, बाजार का दम घुट गया, और नवाचार रुक गया। फिर वही हुआ जो होना था—देश की आर्थिक संरचना चरमरा गई, महंगाई 3000% से ऊपर गई, बैंक लोगों का पैसा फ्रीज़ करने लगे और IMF के सामने कटोरा लेकर खड़ा रहना पड़ा।

भारत में भी हालात दिन-ब-दिन अर्जेंटीना जैसे बनते जा रहे हैं। महंगाई दर लगातार ऊपर जा रही है, रोजगार के अवसर सिकुड़ते जा रहे हैं, और छोटे उद्योग दम तोड़ रहे हैं। आर्थिक आंकड़े चमकदार हैं क्योंकि ऊपर से चमक दिखाना आसान है, लेकिन ज़मीन पर जनता महंगाई और बेरोज़गारी से त्रस्त है।

अर्जेंटीना आज भी IMF से बेलआउट लेता है — अब तक 22 बार। और भारत? हमने पिछले 10 सालों में कितनी बार RBI से आपातकालीन ट्रांसफर लिया है? विदेशी निवेश घटा है, फॉरेन पोर्टफोलियो इनवेस्टमेंट धीरे-धीरे निकल रहा है, और विदेशी संस्थाएँ भारत की कॉर्पोरेट पारदर्शिता पर सवाल उठाने लगी हैं।

सवाल यह नहीं है कि हम अर्जेंटीना हैं या नहीं। सवाल यह है कि क्या हम उसकी चेतावनी सुनना चाहते हैं?

भारत को अगर सचमुच ‘विश्वगुरु’ बनना है तो सरकार को सिर्फ चुनावी प्रचार नहीं, नीति में निष्पक्षता दिखानी होगी। नीति सबके लिए समान होनी चाहिए, न कि चुनिंदा “मित्रों” के लिए। पूंजी का केंद्रीकरण रोकना होगा, MSMEs और इनोवेशन को बढ़ावा देना होगा, RTI को फिर से धारदार बनाना होगा, और जनता को जवाबदेही का अधिकार देना होगा।

वरना GDP के चमकते आंकड़ों के नीचे गहराता सामाजिक और आर्थिक अंधकार हमें भी वहीं ले जाएगा, जहाँ अर्जेंटीना आज खड़ा है — संसाधनों से भरपूर, लेकिन आत्मा से खोखला।

भारत को अभी भी चेतने का वक्त है। देर हो जाए, तो सिर्फ इतिहास दोहराया नहीं जाता — भुगतना भी पड़ता है।


आइए अब अर्जेंटीना की पूरी कहानी पढ़िए, वरिष्ठ पत्रकार मनोज अभिज्ञान के माध्यम से-

कभी अर्जेंटीना भी था महाशक्ति बनने का दावेदार, सपनों से भरा, संसाधनों से समृद्ध। लेकिन वक्त के साथ उसकी सरकारें चंद धनिकों की रखैल बनती गईं। और फिर शुरू हुआ पतन, जहाँ दौलत सिमटी, प्रतिस्पर्धा मरी, और इनोवेशन थम गया।

19वीं सदी का अंत और 20वीं सदी की शुरुआत में दुनिया में सिर्फ कुछ ही देश थे जो महाशक्ति बनने की दौड़ में थे। अमेरिका, ब्रिटेन और… अर्जेंटीना।
हां, वही अर्जेंटीना, जिसे आज हम आर्थिक संकट, मुद्रास्फीति, कर्ज और अस्थिर राजनीति से जोड़कर देखते हैं। मगर एक समय था, जब दुनिया के सबसे अमीर देशों में अर्जेंटीना का नाम लिया जाता था।

उसका भूगोल अनमोल था। अनाज ख़ूब उगते थे, घी-दूध बहता था, गोश्त के निर्यात से दुनिया का पेट भरता था। उसके पास वह सब कुछ था जो अमेरिका को सुपरपावर बना रहा था। मगर फिर ऐसा क्या हुआ कि अर्जेंटीना धसकता चला गया?

अर्जेंटीना की सबसे बड़ी त्रासदी यह नहीं थी कि उसके पास संसाधन नहीं थे। त्रासदी यह थी कि जो संसाधन थे, वे कुछ अमीर घरानों और उद्योगपतियों के पास केंद्रित हो गए—सरकार की मेहरबानी से। राजनीति और उद्योग का गठबंधन बना, जिसे आज क्रोनी कैपिटलिज़्म कहा जाता है। सत्ता में बैठी सरकारें टैक्स, सब्सिडी, ज़मीन, लाइसेंस और कानूनों के ज़रिए खास उद्योगपतियों को आगे बढ़ाती गईं। नतीजा ये हुआ कि धन चंद हाथों में इकट्ठा होता गया। जिनके पास पैसा था, उनके सामने कोई चुनौती नहीं बची। और जब चुनौती नहीं होती, तो इनोवेशन क्यों होगा?

बाज़ार की सबसे बड़ी खूबी है प्रतिस्पर्धा। यही वो चीज़ है जो हर किसी को बेहतर बनने के लिए मजबूर करती है। लेकिन जब सरकारें कुछ गिने-चुने लोगों को प्रोटेक्शन देना शुरू कर देती हैं, कभी टैक्स में छूट देकर, कभी नियमों को लचीला बनाकर, कभी सरकारी खरीद उन्हीं से करके तो बाकी खिलाड़ी खत्म हो जाते हैं। अब वो जो बचे हैं, उन्हें न तकनीक सुधारनी है, न दाम घटाने हैं, न गुणवत्ता बढ़ानी है। उनका बाज़ार पक्का है। और धीरे-धीरे पूरा देश उस रेंगते हुए कॉरपोरेट दलदल में फंसने लगता है जहाँ विकास सिर्फ आंकड़ों में होता है, ज़मीन पर नहीं।

1. 1900 में अर्जेंटीना विश्व की शीर्ष 10 अर्थव्यवस्थाओं में था। GDP per capita के मामले में अर्जेंटीना वर्ष 1895 से 1929 के बीच दुनिया के 10 सबसे अमीर देशों में शामिल था। 1913 में, अर्जेंटीना का प्रति व्यक्ति आय जर्मनी, फ्रांस, इटली और जापान से अधिक था।
Source: Maddison Historical GDP Database

2. 1950 के बाद से गिरावट शुरू हुई। 1946–55 और फिर 1973–74 में Juan Perón जैसे नेता सत्ता में आए, जिन्होंने उद्योगपतियों से गठबंधन करके अर्थव्यवस्था को असंतुलित किया। उन्होंने चुनिंदा पूंजीपतियों को संरक्षण दिया, जो उनके राजनीतिक समर्थन में थे। उन्होंने श्रमिकों को राज्य के अधीन कर दिया। ट्रेड यूनियनें स्वतंत्र नहीं रहीं, बल्कि सरकार के निर्देश पर चलने लगीं। कॉरपोरेटिस्ट मॉडल था, जिसमें राज्य श्रमिकों और पूंजीपतियों के बीच मध्यस्थ बनकर स्वयं सर्वेसर्वा बन जाता है। यही मॉडल फासीवादी इटली और नाज़ी जर्मनी में भी देखने को मिला था। Perón ने इटली के तानाशाह मुसोलिनी से सार्वजनिक रूप से प्रभावित होने की बात कही थी। उन्होंने सेना के माध्यम से शासन चलाया और विरोधियों को जेल में डाला, प्रेस पर अंकुश लगाया और लोकतंत्र को केवल नाम भर रखा 1970 के दशक में Perón ने वामपंथियों को देशद्रोही कहा और Triple A (Argentine Anti-Communist Alliance) जैसे संगठन से उनकी हत्या करवाई।

3. फिर आया Hyperinflation और भ्रष्टाचार का दौर। 1989 तक आते आते महंगाई दर 3000% से अधिक हो गई थी। 1980 के दशक को अर्जेंटीना के इतिहास में La Década Perdida यानी खोया हुआ दशक कहा जाता है, जब विकास पूरी तरह रुक गया।
Source: IMF and World Bank reports

4. 2001 में अर्जेंटीना पूरी तरह दिवालिया हो गया। देश के विदेशी कर्ज़ का आकार इतना बढ़ गया कि उसे चुकाना नामुमकिन हो गया। सरकार ने बैंकों से लोगों की जमा राशि निकालने पर रोक लगा दी (Corralito)। 60% से अधिक लोग गरीबी रेखा के नीचे आ गए।

5. टॉप 20 अमीर घराने, लेकिन कोई तकनीकी क्रांति नहीं। देश के संसाधन, विशेष रूप से कृषि भूमि और निर्यात उद्योग, 20 से कम कारोबारी समूहों के नियंत्रण में आ गए। इनमें से अधिकांश कंपनियों ने Innovation में निवेश नहीं किया—क्योंकि उनके सामने कोई Competition ही नहीं था।

6. क्रोनी कैपिटलिज्म और राजनीतिक सांठगांठ खूब चला। कई बार सरकार ने नीतियाँ इस तरह बनाईं कि चुनिंदा कारोबारियों को फायदा पहुँचे, जैसे— कर्ज माफ़ी और सब्सिडी आदि। इससे बाकी कारोबारी वर्ग हतोत्साहित हुआ और एकाधिकार (monopoly) बढ़ा।

7. आज भी अर्जेंटीना IMF से बार-बार बेलआउट मांगता है। अर्जेंटीना ने 22 बार IMF से आर्थिक सहायता ली है (2022 तक)। हर बार कर्ज लेकर देश को उबारने की कोशिश की गई, लेकिन संरचनात्मक सुधार नहीं हुए।

इन तथ्यों से यह स्पष्ट होता है कि जब सरकारें बाजार में निष्पक्ष रेफरी बनने की बजाय किसी एक टीम की कोच बन जाती हैं, तो देश का पतन तय है—चाहे उसके पास कितने ही प्राकृतिक संसाधन क्यों न हों।

अर्जेंटीना हम सबको चेतावनी देता है। अर्जेंटीना की कहानी हमारे लिए सिर्फ ऐतिहासिक अध्याय नहीं है, बल्कि यह चेतावनी है कि अगर सरकारें अपनी भूमिका निष्पक्ष रेफरी की बजाय किसी टीम के मैनेजर की तरह निभाने लगें, तो पूरा खेल बिगड़ जाता है। जब सरकारें सिर्फ चंद पूंजीपतियों की रखैल बन जाती हैं, तो वे कानून, नीति, और बजट सब कुछ उन्हीं के हक में बनाने लगती हैं। ऐसे में जो मेहनती लोग हैं, जो नवाचार करना चाहते हैं, जो नई सोच लाना चाहते हैं, वे हार मानकर किनारे हो जाते हैं। फिर धीरे-धीरे देश के भीतर से सड़न शुरू होती है। भले ही ऊपर से चमकती GDP दिखे, लेकिन नीचे आम जनता बेरोज़गारी, महंगाई और भ्रष्ट तंत्र की मार झेलती है।

तो रास्ता क्या है? सरकार को पुनः जनहितकारी संस्थान बनना होगा, कॉर्पोरेट का एजेंट नहीं। प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देना होगा, न कि मार देना। नीति सबके लिए समान होनी चाहिए, ना कि संबंधों पर आधारित। और सबसे जरूरी, पूंजी का केंद्रीकरण रोकना होगा, क्योंकि जब सारी दौलत कुछ हाथों में सिमट जाती है, तो लोकतंत्र दिखावा रह जाता है, इनोवेशन खत्म हो जाता है।

अर्जेंटीना कभी एक सपना था, आज सबक है। अगर हम नहीं चेते, तो हमारे भी सारे संसाधन, मजदूर से लेकर ज़मीन तक, कुछ पूंजीपतियों की मिल्कियत बन जाएंगे। और जब इनका कोई प्रतिस्पर्धी नहीं बचेगा तो देश ठहर जाएगा।

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