महिला दिवस के मौके पर अष्टभुजा शुक्ल जी की ये कविता सुनें

Yashwant Singh : महिला दिवस नजदीक है… ‘यह नाटक नहीं चलेगा’- यह वो कविता है जो पुरुष प्रधान इस समाज के ताने-बाने को ललकारती है. इसे रचा और सुनाया जाने-माने वरिष्ठ कवि अष्टभुजा शुक्ल जी ने. कविता पाठ उनने डुमरियागंज में पूर्वांचल साहित्य महोत्सव के दरम्यान किया. कविता की कुछ लाइनें नीचे दे रहा हूं… लेकिन असली आनंद अष्टभुजा जी के मुंह से सुनने में आएगा.

वीडियो तैयार किया भाई Harpal ने. उनको धन्यवाद. आयोजक Qadir भाई को बधाई. कविता पाठ का वीडियो नीचे है… कविता की कुछ लाइनें यूं हैं….

….

और नहीं अब सहने वाली
हमसे जन्मा पुरुष वर्ग
हमको ही देता गाली

बन कर नदी बहीं हम
सूर्य न देखीं घाम न जानीं
काली रात सहीं हम
हमसे जो कुछ कहा पुरुष ने
अब तक वही कहीं हम

हम माया
तो वे मायावी
कौन दूध का धोया

उनका अपना बचा हुआ सब
हमने सब कुछ खोया

मंच उन्हें
नेपथ्य हमें

यह नाटक नहीं चलेगा….

पूरी कविता इसके रचयिता अष्टभुजा शुक्ल जी के मुंह से सुनने के लिए वीडियो को देखें… वीडियो में आखिरी कुछ मिनट तक आयोजन से जुड़ी विभिन्न वो तस्वीरें हैं जो तत्काल मुझे दाएं बाएं यहां वहां से मिल पाईं.

भड़ास एडिटर यशवंत की एफबी वॉल से.

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