सलिल सरोज की रचना पढ़ें- ”क़त्ल हुआ और यह शहर सोता रहा…”

क़त्ल हुआ और यह शहर सोता रहा
अपनी बेबसी पर दिन-रात रोता रहा ।।1।। Continue reading

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दुनिया को मैं चश्मे के नंबरों से मापता हूं…

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार राज कुमार सिंह की दो कविताएं ‘इंडिया इनसाइड’ मैग्जीन की साहित्य वार्षिकी-2018 में प्रकाशित हुई हैं. एक पत्रकार जो हर पल समाज, समय और सत्ता पर नज़र रखता है, उन्हें वह खबरों के जरिए तो उकेरता लिखता ही है, जो कुछ छूट जाता है, बच जाता है, अंतस में, उसे वह कविता में ढाल देता है. Continue reading

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पहले तो तू मेरी आँखों का पानी भी पढ़ लेता था….

-सलिल सरोज-

क्या हुआ ऐसा कि इस कदर बदल गया है तू
पहले तू मेरी आँखों का पानी भी पढ़ लेता था Continue reading

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वरिष्ठ पत्रकार अजीत अंजुम की लिखी कविता सोशल मीडिया पर हो रही है वायरल, आप भी पढ़ें

कविता मैंने कभी लिखी नहीं . पता नहीं कुछ मिनटों पहले मन की बेचैनियों से कुछ लाइनें निकली हैं .. ये जीवन की पहली अ-कविता है जो चंद क्षणों में मन से मोबाइल पर उतर कर यूँ आकार लेती गई…. Continue reading

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बेहतर समाज के स्वप्न रचती सुभाष राय की कविताएं

सुभाष राय की कविताएं सच और सलीब दोनों की सही-सही पहचान करती हैं ।पोस्ट ट्रुथ के इस दौर में जहाँ सच और झूठ को अलगाना एक बड़ी चुनौती बन गया है, कवि की दृष्टि, सरोकार, वैचारिक दृढता और उनका पत्रकारीय व्यक्तित्व मिलजुल कर उस मनोगतिकी का निर्माण करते हैं जो झूठ पर चढ़ी सच सी लगती परतों को उघार देने में सक्षम है। Continue reading

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महिला दिवस के मौके पर अष्टभुजा शुक्ल जी की ये कविता सुनें

Yashwant Singh : महिला दिवस नजदीक है… ‘यह नाटक नहीं चलेगा’- यह वो कविता है जो पुरुष प्रधान इस समाज के ताने-बाने को ललकारती है. इसे रचा और सुनाया जाने-माने वरिष्ठ कवि अष्टभुजा शुक्ल जी ने. कविता पाठ उनने डुमरियागंज में पूर्वांचल साहित्य महोत्सव के दरम्यान किया. कविता की कुछ लाइनें नीचे दे रहा हूं… लेकिन असली आनंद अष्टभुजा जी के मुंह से सुनने में आएगा.

वीडियो तैयार किया भाई Harpal ने. उनको धन्यवाद. आयोजक Qadir भाई को बधाई. कविता पाठ का वीडियो नीचे है… कविता की कुछ लाइनें यूं हैं….

….

और नहीं अब सहने वाली
हमसे जन्मा पुरुष वर्ग
हमको ही देता गाली

बन कर नदी बहीं हम
सूर्य न देखीं घाम न जानीं
काली रात सहीं हम
हमसे जो कुछ कहा पुरुष ने
अब तक वही कहीं हम

हम माया
तो वे मायावी
कौन दूध का धोया

उनका अपना बचा हुआ सब
हमने सब कुछ खोया

मंच उन्हें
नेपथ्य हमें

यह नाटक नहीं चलेगा….

पूरी कविता इसके रचयिता अष्टभुजा शुक्ल जी के मुंह से सुनने के लिए वीडियो को देखें… वीडियो में आखिरी कुछ मिनट तक आयोजन से जुड़ी विभिन्न वो तस्वीरें हैं जो तत्काल मुझे दाएं बाएं यहां वहां से मिल पाईं.

भड़ास एडिटर यशवंत की एफबी वॉल से.

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भगवान स्वरूप कटियार के कविता संग्रह “अपने-अपने उपनिवेश” का लोकार्पण

करुणा, प्रेम को वापस लाते हैं भगवान स्वरूप कटियार, नरेश सक्सेना की अध्यक्षता में मायामृग और मदन कश्यप का काव्यपाठ

लखनऊ। प्रेम नफरत के विरुद्ध युद्ध है। भगवान स्वरूप कटियार अंधे प्रेम के नहीं आंख वाले प्रेम के कवि हैं। उनकी कविताओं के संदर्भ कविता के अन्दर नहीं बाहर है। उनकी कविताओं में जो प्रेम है वह निश्छल प्रेम है। यह मनुष्यता के प्रति प्रेम है। यहां जटिल मनोभावों की सरल अभिव्यक्ति है। जटिलताओं को सरल शब्दों में कहा गया है। जब कटियार जी कहते हैं कि दोस्ती से बड़ी विचारधारा नहीं होती तो वे उस विचारधारा को ही प्रतिष्ठित करते हैं जो बेहतर इंसानी दुनिया को बनाने की है। सबके अपने-अपने उपनिवेश हैं। हम जहां निवेश करते हैं, वहीं उपनिवेश बना लेते हैं। कटियार जी जैसा कवि बार-बार सचेत करता है। हमें देखना होगा कि हमारे भीतर तो कोई उपनिवेश नहीं खड़ा हो रहा है। अगर खड़ा हो रहा है तो उसे ढहाना होगा।

भगवान स्वरूप कटियार के नये और पांचवें कविता संकलन ‘अपने-अपने उपनिवेश’ का लोकार्पण जन संस्कृति मंच की ओर से उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ के निराला सभागार में 10  सितम्बर को हुआ। समारोह की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना ने मार्क्सवादी आलोचकों की इस बात के लिए आलोचना की कि उन्होंने कविता के मात्र कथ्य पर जोर दिया शिल्प को नजरअन्दाज किया, करुणा, भावुकता और प्रेम जैसी चीजों को बाहर का रास्ता दिखाया। भगवान स्वरूप कटियार अपनी कविताओं में इन्हें वापस लाते हैं। उन्होंने मुक्तिबोध के संघर्षमय जीवन की चर्चा करते हुए कहा कि आज कोई कवि वैसा कठिन जीवन जीने को तैयार नहीं। सभी सुखी जीवन चाहते हैं और दुख और संघर्ष की कविता लिखते हैं। ऐसे में एक फांक तो रहेगा ही।

मुख्य अतिथि मदन कश्यप ने कटियार जी की कविताओं पर बोलते हुए कहा कि लम्बी काव्य यात्रा के बाद भी इनकी कविताओं को जो जगह मिलनी  चाहिए वह नहीं मिली। इस पर विचार किया जाना चाहिए। मदन कश्यप ने कटियार जी की रिक्शेवाला, उद्बोधन आदि कई कविताओं की चर्चा की और कहा कि यह घटनाओं को जिए हुए क्षण में बदलती है। रिक्शेवाले के जीवन और उसके अनुभव को अपना जीवनानुभव बनाती है। ऐसा करके कवि द्रष्टा नहीं रह जाता, वह स्रष्टा बन जाता है। जयपुर से आए कवि माया मृग का कहना था कि कविता जितना कहती है, उससे ज्यादा छिपाती है जिसे पाठक अपने कला संस्कार से ग्रहण करता है। कटियार जी की कविता ‘अपने अपने उपनिवेश’ की चर्चा करते हुए कहा कि हमें खंगालने की जरूरत है कि कहीं हमने प्रेम की जगह अपने अन्दर तो उपनिवेश नहीं बना रखा है। हम नदियों से प्रेम करते है, हम पेड़ों से प्रेम करते है, हम स्त्रियों से प्रेम करते है और इन्हें ही अपना निशाना बनाते हैं। उन्होंने कहा कि कटियार जी अंधे प्रेम के कवि नहीं आंख वाले प्रेम के कवि हैं। यहां प्रेम नफरत के विरुद्ध युद्ध है।

दिल्ली से आये आलोचक आशुतोष कुमार ने कहा कि मुक्तिबोध का हिन्दी कविता में एक बड़ा अवदान है कि उन्होंने कविता को उसकी आत्मनिर्भर दुनिया से बाहर किया और वास्तविक दुनिया, जीने-मरने की दुनिया को कविता का विषय बनाया। कटियार जी इसी परंपरा के कवि है। इनकी कविताओं के संदर्भ कविता के अन्दर नहीं बाहर है। इनका सीधा रिश्ता दुनिया से है, उसे सुन्दर बनाने से है। इनकी कविताओं में इंसानी रिश्तो की खोज है। इसके कई रूप यहां मिलते हैं। यहां स्मृतियों को बचाना भी संघर्ष है। कवयित्री और सामाजिक कार्यकर्ता वंदना मिश्र ने कहा कि उनका यह संग्रह अनिल सिन्हा से शुरू होकर रोहित वेमूला तक जाता है, इससे उनका सरोकार सामने आता है। उन्होंने कहा कि वे फ्रेंच और सोवियत कांंतियों को याद करते हैंं, ये उनकी आदर्श हैं। कवि एवं आलोचक चंद्रेश्वर ने कहा कि कटियार जी लंबे समय से रचनारत हैं। वे जीवन में जितने सरल हैं, अपनी कविताओं में भी उतने ही सरल हैं। । कई कविताओं का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कई बार उनकी सूत्रात्मक अभिव्यक्तियां ध्यान खींचती है।

कवि व पत्रकार सुभाष राय ने कहा कि स्मृतियों को खत्म कर देने के दौर में कटियार जी उसे याद करते हैं। संग्रह की पहली कविता ‘एक भोर की याद’ ऐसी ही हैं। इसमें अपनी दादी के साथ संवाद है, उनकी नेक सीखें हैं। कटियार जी के लिए अतीत शिक्षक है। वर्तमान में आगे बढ़ने की ताकत इससे ग्र्रहण करते हैं। परिचर्चा का आरम्भ जन संस्कृति मंच के प्रदेश अध्यक्ष व कवि कौशल किशोर ने किया। उनका कहना था कि कटियार जी की कविताओं के केन्द्र में मनुष्य का सुख-दुख और संघर्ष है। इसका मूल तत्व प्रेम है। इनका कविता संसार प्रेम, जिन्दगी और कविता का त्रिकोण रचता है। यहां कविता और प्रेम इस लड़ाई के हथियार हैं और ये दोनों जिन्दगी के हथियार हैं। कहते हैं कि जिन्दगी को बचाना है तो कविता और प्रेम दोनों  को बचाना होगा।

परिचर्चा के बाद हुई कवि गोष्ठी में मदन कश्यप, नरेश सक्सेना और माया मृग ने अपने कविताएं सुनाई। परिचर्चा व कवि गोष्ठी का सफल संचालन किया कवि और लेखक डॉ संदीप कुमार सिंह ने। उन्होंने सभी वक्ताओं का परिचय भी दिया। कार्यक्रम के आरम्भ में लेखक व पत्रकार अनिल सिन्हा के चित्र पर पुष्पांजलि कर उन्हें याद किया गया। ज्ञात हो कि भगवान स्वरूप कटियार का यह संग्रह उन्हीं को समर्पित किया गया है।

इस अवसर पर बड़ी संख्या में शहर के साहित्यकार, बौद्धिक, सामाजिक कार्यकर्ता व साहित्य सुधि श्रोता उपस्थित थे जिनमें उन्नाव से आए दिनेश प्रियमन, बाराबंकी से विनय दास, कानपुर से अवधेश कुमार सिंह, के अलावा डॉ गिरीशचन्द्र श्रीवास्तव, राकेश, डॉ देवेन्द्र, कात्यायनी, विजय राय, नलिन रंजन सिंह, डॉ अनीता श्रीवास्तव, डॉ निर्मला सिंह, राजेश कुमार, प्रज्ञा पाण्डेय, विजय पुष्पम, दिव्या शुक्ला, वीरेन्द्र सारंग, देवनाथ द्विवेदी, तरुण निशान्त, के के वत्स, बंधु कुशावर्ती, अलका पांडे, आर के सिन्हा, आशीष कुमार सिंह, विमल किशोर, इंदु पाण्डेय आदि प्रमुख थे।

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चर्चित युवा कवि डॉ. अजीत का पहला संग्रह ‘तुम उदास करते हो कवि’ छप कर आया, जरूर पढ़ें

डॉ. अजीत तोमर

किसी भी लिखने वाले के लिए सबसे मुश्किल होता है अपनी किसी चीज़ के बारे में लिखना क्योंकि एक समय के बाद लिखी हुई चीज़ अपनी नहीं रह जाती है. वह पाठकों के जीवन और स्मृतियों का हिस्सा बन जाती है. जिस दुनिया से मैं आता हूँ वहां कला, कल्पना और कविता की गुंजाईश हमेशा से थोड़ी कम रही है. मगर अस्तित्व का अपना एक विचित्र नियोजन होता है और जब आप खुद उस पर भरोसा करने लगते हैं तो वो आपको अक्सर चमत्कृत करता है. औपचारिक रूप से अपने जीवन के एक ऐसे ही चमत्कार को आज आपके साथ सांझा कर रहा हूँ.

कविता लिखना मेरे लिए खुद से बातचीत करने का एक सलीका भरा रहा है मगर कभी सोचा नहीं था कि मैं कविता लिखते-लिखते इतनी दूर अकेला चला आऊँगा कि मेरी परछाई भी दुनिया भर के कवियों के अस्तित्व की एक लिपि के जैसी नजर आने लगेगी. सच कहूं तो थोड़ा डरा हुआ हूँ क्योंकि जब आप अपने लिखे हुए का एक दस्तावेजीकरण करते है तो साथ में एक उम्मीद और एक जिम्मेदारी का भी दस्तावेजीकरण करते हैं. मेरे दोस्त ही मेरे पाठक हैं और मेरे पाठक ही मेरे दोस्त हैं. मैं इसे 21 वीं सदी के किसी सफल बिजनेस मॉडल के रूप में नहीं देखता हूँ. मैं इसे उम्मीद और सहभागिता के स्नेह और आशा के एक जीवंत मॉडल के रूप में देखता हूँ.

यह दोस्तों के भरोसे और सतत आग्रह का ही परिणाम है कि मेरा कविताओं का पहला संकलन ‘तुम उदास करते हो कवि’ प्रकाशित होकर बाज़ार में आ गया है. ये बाज़ार शब्द अपने आप में बेहद डराता भी है क्योंकि यहाँ सफलता का आकलन बिक्री से भी होता है मगर मेरे लिए सफलता का आकलन आपके प्रेम से है. मैं चाहता हूँ कि मेरे जैसे लोग कविता लिखते रहें और वो पाठकों तक पहुँचती रहे.  इसके लिए जरूरी है प्रकाशक का कविता में निवेश का भरोसा कायम रहे और मेरे जैसे लोग अपनी बेहतर कोशिशें आप तक पहुंचाते रहें.

मुझे उम्मीद ही नहीं पूरा भरोसा है कि हम मिल-जुलकर इस जिम्मेदारी को उसके मुकाम तक जरुर लेकर जाएंगे. ‘तुम उदास करते हो कवि’ किताब अगर आपके पास रहेगी तो आप उदासी में मुस्कुरा सकेंगे बतौर कवि बस मैं इतनी ही प्रत्याभूति दे सकता हूँ. नीचे अमेजन का लिंक दे रहा हूँ यहाँ से आप किताब ऑर्डर करके मंगा सकते है. चूंकि सभी दोस्त जानते है कि फेसबुक पर मेरा लिखा हुआ ‘ओनली फॉर फ्रेंड्स’ रहता है इसलिए किताब की बात को अब आगे पहुंचाना अब आपके जिम्मे छोड़ता हूँ. आपके जरिए अधिकतम लोगों तक मेरी कविताएँ पहुंचे, ये एक छोटी सी आशा मेरी भी है.

अमेजन का लिंक: https://www.amazon.in/Tum-Udas-Karte-Ho-Kavi

फ्लिपकार्ट का लिंक: https://www.flipkart.com/tum-udas-karte-ho-kavi

सस्नेह

डॉ. अजित तोमर

https://www.facebook.com/nomadicajeet


पिता पर लिखी गई डा. अजीत तोमर की चार कविताएं पढ़ने के लिए नीचे दिए शीर्षक पर क्लिक करें :

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जिंदगी बनाम कमीशन : गोरखपुर की घटना पर एक कविता

गोरखपुर के सरकारी अस्पताल में आक्सीजन की कमी से 60 बच्चों की मौत से शोकग्रस्त मन कल (12 अगस्त) सो न सका उन मासूम बच्चों की आवाज मेरे कानों गूंजती रही, एक कविता शहीद बच्चों को श्रद्धाजंलि…

जिंदगी बनाम कमीशन

तुम आए थे
धरती के उस कोने में
इंसानियत को जिंदा रखने
तुम में ही कोई बनता नेता सुभाष गांधी-
पर तुम जान गए थे
पूरी उम्र लडना है
भ्रष्ट सफेदपोश, खाकी से
तुम लड रहे थे नन्ही जान
इस बडी दुनिया के हैवानों से
बेशरम हुक्मरानों से।

कल रात सपनों में तुम आए
कह रहे थे तुम सब
हम बच्चे आए थे तुम्हारी दुनिया में ।
देने खूब खुशियां
पर लालची तेरा मन
तेरे जैसे बहुत मन
हवा का भी सौदागर
बन गए कमीशनबाज
और तेरा हुक्मरान
नहीें है  नहीें है इंसान।
इतना कहकर तुम सब चले गए
नई दुनिया की खोज मेें।

तुम्हारे जाने के बाद
कुछ नही बदल रहा
कमीशन सत्ता भ्रष्टाचार।
उन बेशर्म आंखों में आंसू नहीें,
जो भाषणों में सपने बेचा करते थे
मन की बातें करनेवालों का मन पसीजा क्यों नहीें।
ये हुक्मरान जा झांक देख  अपने बच्चों की आंखों में
उन बच्चों की शहादत दिखेगी।
हे! कमीशनखोर दैत्य
तू कई रूप में है
तू नेता, तू डाक्टर, तू भ्रष्ट सरकारी।
मत  छूना हत्यारे अपने पापी हाथों से
मेरे देश का तिरंगा।

अभिषेक कांत पाण्डेय भड्डरी
8577964903
abhishekkantpandey@gmail.com

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प्रताप सोमवंशी के सौ शेर : एक पत्रकार का शायर बन जाना…

अम्मा भी अखबार के जैसी रोज सुबह
पन्ना-पन्ना घर भर में बंट जाती हैं

ये दो लाइनें किसी का भी मन बरबस अपनी ओर खींचने को काफी हैं। कितनी गहराई है इन दो लाइनों में। कोई गंभीर पत्रकार जब शायर या गज़लकार के रूप में सामने आता है तो कुछ ऐसे ही गजब ढाता है। गजल, शायरी में अपनी अलग किस्म की पहचान रखने वाले प्रताप सोमवंशी के सौ शेर प्रकाशित हुए हैं।

हिन्दुस्तानी साहित्य की पत्रिका ‘गुफ्तगू’ ने इसे प्रकाशित किया है। एक से बढ़कर एक उम्दा शेर। खासियत यह कि इसे पढ़ते हुए ज्यों-ज्यों आगे बढ़ते हैं, ऐसा लगता है कि पहले वाले से ये शेर ज्यादा बेहतर है… रचनाओं का बेहतर खजाना। शुरू में ही पहला शेर अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज कराता है। अब इसके आगे का शेर-

लायक कुछ नालायक बच्चे होते हैं
शेर कहां सारे ही अच्छे होते हैं।

केवल लिखना भर ही नहीं, लिखने के बाद, अगर खुद पढ़ते हुए रचनाकार को वो कमतर लगे तो कम-बेसी का अहसास तो होने लगता ही है। शायद रचनाकार को भी इसका आभास होने लगता है- ‘लायक कुछ नालायक बच्चे होते हैं…’। ईमानदारी के साथ, बेधड़क सच को स्वीकारने में भी वे पीछे नहीं हटते। सजग रचनाकार की ये पहचान भी होती है। रचना की तुलना अपने बच्चों के होने जैसा करना, रचना की गंभीरता को दर्शाता है। अलग-अलग मायने में उकेरे गए शब्द-चित्र जो शेरों-शायरी की इस तरह की भी शक्ल अख्तियार कर लिए हैं।

दो दशक से ज्यादा पत्रकारीय अनुभवों से रूबरू होना, उसे सहेजना, शब्दों का खिलंदड़पन, ये सब प्रतापजी की आदत में शुमार है। इनको करीब से जानने वाले ये मानते हैं कि पैनी दृष्टि, संदर्भित विषयों की अच्छी पकड़, शब्दों और भावों की बेहतरीन प्रस्तुतियों के लिए प्रताप भाई पहले से ही ‘ख्यात-कुख्यात’ रहे हैं। जनसत्ता से लेकर कई बड़े अखबारों में प्रभावी और यादगार रिपोर्टिंग करने वाले प्रताप सोमवंशी की मजबूत पकड़ गजल-शायरी लेखन के क्षेत्र में भी उतनी ही मजबूत है।

सद्यः प्रकाशित इनके सौ शेर पढ़ते समय ये बात फिर से एक बार साबित हो जाती है। लेखकीय अनुभवों का एक बड़ा खजाना मौजूद है प्रताप सोमवंशी के पास। अलग-अलग विषय, अलग-अलग बिंब, प्रतीक, शब्द-शिल्प देखने के बाद मजबूत पकड़ होने वाले दावे को और ज्यादा बल मिलता है। शेर संग्रह में जीवन की विसंगतियों, उतार चढ़ाव, सामाजिक विद्रूपता का सुंदर उदाहरण मिलता है, साथ ही सच के एकदम नजदीक ही दिखता है। देखिये इन शेरों को आप भी मान जाओगे।

राम तुम्हारे युग का रावण अच्छा था
दस के दस चेहरे सब बाहर रखता था

झूठ पकड़ना कितना मुश्किल होता है
सच भी जब साजिश में शामिल होता है

लक्ष्मण रेखा भी आखिर क्या कर लेगी
सारे रावण घर के अंदर निकलेंगे

गमछे बिछा के सो गयी घर की जरूरतें
जागी तो साथ हो गयीं घर की जरूरतें

इससे जियादा मां को चाहिए भी क्या
बच्चों के दरमियान मुहब्बत बची रहे  

गालियों की तरह ही लगती है
ये जो नकली-सी मुस्कराहट है

कवि-शायर को अक्सर खुद से भी लड़ना पड़ता है। कई मौके ऐसे भी आते हैं, जब वैचारिक द्वंद्वों की मुठभेड़ किसी सर्जिकल स्ट्राइक से कम नहीं साबित होती। कुछ उदाहरण साफतौर पर मिलते हैं-

खुद को कितनी देर मनाना पड़ता है
लफ्जों को जब रंग लगाना पड़ता है

बेबसी हो मुफलिसी हो या दूसरी मजबूरियां
रोकती हैं ये सभी अक्सर मगर बोलूंगा मैं

रात और नींद रोज लड़ते रहे
और ख्वाबों ने खुदकुशी कर ली

तुममें सुनने का सब्र जब न रहा
मैंने बातों में ही कमी कर ली

आ जाएगा आसानी से अब मुझको संभलना
आदत तेरी मेरे लिए ठोकर की तरह है

प्रताप सोमवंशी के सौ शेर में ज्यादातर भोगे हुए यथार्थ और सच के एकदम करीब दिखते हैं-

आ जाए कौन कब कहां कैसी खबर के साथ
अपने ही घर में बैठा हुआ हूं मैं डर के साथ

सूरज की रोशनी में यह बातें याद रखना
डेहरी से जब बढ़ोगे परछाइयां भी होंगी

रेस में होंगी सड़क पर जिंदगी की गाड़ियां
एक अस्सी तो होगी एक की रफ्तार सौ

एक बूढ़ा जो दुखों का पूरा दस्तावेज है
वो बहाने, वायदे, धोखा लिए मिलता है रोज

नीचे के लिखे ये शेर भी देखिये जो मौजूदा सामाजिक विद्रूपताओं का बेहतरीन उदाहरण तो मिलता है साथ ही व्यवस्था पर ये तंज भी कसता है-

उनकी झोली में भलाई के हैं किस्से कितने
बात करते हैं मिसालों से घिरे रहते हैं

साहब जी ने ऐब तलाशे
हमने जब अधिकार तलाशा 

उस दिन हम अपने आप पे काबू न रख सके
जिस दिन लिपट के रो गईं घर की जरूरतें

मीठे लोगों से मिलकर हमने जाना
तीखे कड़वे अक्सर सच्चे होते हैं

रोटी की खातिर उसका जुनूं दब के मर गया
बचपन में ही डुबो गयीं घर की जरूरतें

एक भारत वो है जो भूख से मरता है रोज
एक वो भी है जहां पर रेस्तरां खुलता है रोज

मेरे दौर को कुछ यूं लिक्खा जाएगा
राजा का किरदार बहुत ही बौना था

सुना है तेरे नगर में
जो सच्चा है वही घबरा रहा है

कुल मिलाकर प्रताप सोमवंशी के ये सौ शेर संग्रह न सिर्फ अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज कराते हैं, बल्कि अलग अलग मुकम्मल घटनाओं की उलाहनाभरी तहरीर होने का आभास भी कराते हैं। बेहतर…उम्दा… आमीन!

शिवा शंकर पांडेय 

वरिष्ठ पत्रकार, इलाहाबाद

मोबाइल- 9565694757

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मजीठिया वीरों को समर्पित बरेली के मजीठिया क्रांतिकारी मनोज शर्मा एडवोकेट की कविता

अब जीत न्याय की होगी…

-मनोज शर्मा एडवोकेट-

आ गया समय निकट अब जीत न्याय की होगी

इतिहास में दर्ज कहानी मजीठिया वीरों की होगी

मुश्किलें सहीं पर अन्याय, अनीति के आगे झुके नहीं

भामाशाहों की घुड़की के आगे कदम कभी रुके नहीं

उनके धैर्य और साहस की गाथा अमर रहेगी

हम न रहेंगे, तुम न रहोगे बस बातें अमर रहेंगी

धूर्त, कायरों को आने वाली नस्लें धिक्कारेंगी

स्वाभिमान बेचने वालों को उनकी संतानें धिक्कारेंगी

अपने हक की आवाज उठाने का जिसमें साहस ना हो

वह कैसा है पत्रकार जिसका आचरण बृहनला जैसा हो

अतीत झांक कर देखो कलम तुम्हारी क्रांति बीज बाेती थी

चाहे जितनी हो तलवार तेज गुट्ठल होकर रह जाती थी

वही कलम आज कुछ पैसों की खातिर दासी लगती है

पत्रकारिता तो अब लाला बनियों की थाती लगती है

हमने अपना श्रम बेचा है जमीर का तो सौदा किया नहीं

खबरदार सदा मौन रहने का व्रत तो है हमने लिया नहीं

न्यायालय की नाफरमानी की सजा भुगतने को तैयार रहो

शोषण करने वालों काल कोठरी में रहने को तैयार रहो

देखेंगे धन बल, सत्ताबल कितना काम तुम्हारे आता है

कौन है वह माई का लाल जो तुम्हें बचाने आता है

-मनोज शर्मा, एडवोकेट

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माया बुआ भी सोचतै रहिगै बबुआ के संग होरी खेलब…

आवा हो भइया होली मनाई

अब तो गावन कै लड़िका भी पप्पू टीपू जानि गएन,
‘यूपी को ये साथ पसन्द है’ ऐह जुम्ला का वो नकार दहेन,
माया बुआ भी सोचतै रहिगै बबुआ के संग होरी खेलब,
पर ‘मुल्ला यम ‘ कै साइकिलिया का लउड़ै हवा निकार देहेन,
बूढ़ी हाथी बैठ गई और साइकिल भी पंचर होइ गै,
जिद्दी दूनौ लड़िकै मिलिके माया मुलायम कै रंग अड़ाय गै,
राजनीति छोड़ा हो ननकऊ आवा हम सब गुलाल लगाई,
फगुनाहट कै गउनई गाय के आवा हो भइया होली मनाई,

भउजी कब से कहत रहीं कि आवा हो देवर होली खेली,
साल भरे के रखे रंगन कै तोहरे ऊपर खूब ढ़केली,
होली अऊतै अपने काका खटिया से तुरन्तै उठि गएन,
फगुनाहट कै गीत गाइकै सबका वो खूब मगन केहेन,
मोदी मोदी कै एकै धुन अब लउड़न में सवार अहै,
खूब खरीदेन केसरिया रंग सराबोर वो देखात अहै,
दिल कै दर्द भुलावा भइया आवा हम सब गले मिल जाई,
प्यार के रंग से रंगि के भइया आवा हो भइया होली मनाई,

साल भरे से लखतै रहिगै उनका रंग लगाउब ऐह बार,
नैना नैना चार करब और उनका बनाउब आपन ऐह बार,
फागुन कै गउनई सुनिके वो अपने आप निकरि आई,
देखतै देखत एक पलन मै वो हमका आपन बनाय गई,
अब तो घर से निकरा भइया आवा रंग गुलाल उड़ाई ,
मथुरा के पानी में रंगिके बनारसी लाल गुलाल लगाई,
मन का मैल छुडावा भइया आवा अब रंगीन बनाई,
अवधी रंग में रंगि जा भइया आवा हम सब होली मनाई…..!

अन्तू, प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश की निवासिनी शालिनी तिवारी स्वतंत्र लेखिका हैं। पानी, प्रकृति एवं समसामयिक मसलों पर स्वतंत्र लेखन के साथ साथ वर्षो से मूल्यपरक शिक्षा हेतु विशेष अभियान का संचालन भी करती है। सम्पर्क- shalinitiwari1129@gmail.com

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पिता के मर जाने पर मनुष्य के अंदर का पिता डर जाता है…

पिता पर डॉ. अजित तोमर की चार कविताएं

1.

पिता की मृत्यु पर
जब खुल कर नही रोया मैं
और एकांत में दहाड़ कर कहा मौत से
अभी देर से आना था तुम्हें
उस वक्त मिला
पिता की आत्मा को मोक्ष।

***

पिता की अलग दुनिया थी
मेरी अलग
दोनों दुनिया में न कोई साम्य था
न कोई प्रतिस्पर्धा
जब पिता नही रहे
दोनों दुनिया के बोझ तले दब गया मैं
मेरी आवाज़ कहीं नही पहुँचती थी
मुझ तक भी नही।

***

कोई भी गलत काम करने से पहले
ईश्वर का मुझे लगता था बहुत भय
पिता की मौत के बाद
ईश्वर का भय हुआ समाप्त
और पिता का भय बढ़ गया
इस तरह ईश्वर अनुपस्थित हुआ मेरे जीवन से
पिता के जाने के बाद।

***

पिता के मर जाने पर
मनुष्य के अंदर का पिता डर जाता है
वो जीना चाहता है देर तक
अपने बच्चों के लिए
भले जीते जी वो कुछ न कर पाए
मगर
मर कर नही बढ़ाना चाहता
अपने बच्चों की मुश्किलें।

2.

एक मेरे पिता थे
जो यदा-कदा कहतें थे
तुम्हारे बस का नही ये काम

एक वो है
जिनका पिता मैं हूँ
उनकी अपेक्षाओं पर जब होता हूँ खारिज़
ठीक यही बात कहतें वो
आपके बस का नहीं ये काम

दो पीढ़ियों के बीच
इतना मजबूर हमेशा रहा हूँ मैं
ये कोई ग्लैमराइज्ड करने की बात नही
ना अपनी काहिली छिपाने की
एक अदद कोशिश इसे समझा जाए

बात बस इतनी सी है
मैं चूकता रहा हूँ हमेशा बेहतर और श्रेष्ठतम् से
नही कर पाता
कुछ छोटे छोटे मगर बुनियादी काम
और मनुष्य होने के नातें
ये एक बड़ी असफलता है मेरी
यह भी करता हूँ स्वीकार

अपने पिता और पुत्रों के मध्य
संधिस्थल पर बैठा प्रार्थनारत हूँ न जाने कब से
घुटनों के बल बैठे बैठे मेरी कमर दुखने लगी है
मेरा कद  रह गया है आधा

इसलिए नही देख पाता
अपने आसपास बिखरी
छोटी-बड़ी खुशियों को

मेरे वजूद का यही एक ज्ञात सच है
जो बता सकता हूँ मैं
अपने पूरे आत्मविश्वास के साथ।

3.

संयोग से उस दौर में
मेरा जन्म हुआ
जहां पिता पुत्र के अंतर्द्वन्द बेहद गहरे थे
समाज तब करवट ले रहा था
मेरे से पूर्ववर्ती पीढ़ी
विचार और संवेदना के स्तर पर नही थी
इस किस्म की विद्रोही

हम नालायक थे
वो रही थी अपेक्षाकृत आज्ञाकारी

मेरा विद्रोह किसी क्रांति के निमित्त न था
ये काफी हद तक भावनात्मक रहा
कुछ कुछ वैसा ही
जैसा सबको रहती है शिकायत कि
पिता उन्हें ठीक से समझ नही पाए
मगर
एक ईमानदार सवाल यह भी है
क्या हम ठीक से समझ पाए पिता को

ऐसा क्यों हुआ हमारा अस्तित्व ही
चुनौति बन गया उनके लिए
हमारे मुद्दें भिन्न थे तर्क भिन्न थे
एकदम अलग थी दुनिया
मगर अक्सर बहस क्यों रही एकतरफा

पिता के साथ क्यों नही विकसित हो पाया
हमारा लोकतांत्रिक रिश्ता
दोनों के हिस्से में आती रही हमेशा
थोड़ी जिद थोड़ी परेशानी

एक चूके हुए समय में
पिता पुत्र का साथ होना था बेहद जटिल
आदर की कल्पनाओं के साथ बनता रहा
असहमतियों का पहाड़

पिता कुछ इस तरह उपस्थित रहें हमारे जीवन में
जैसे कुँए में रस्सी
हम पिता की अपेक्षाओं से नही
खुद के असंतुलन से होते रहे सहज
नही समझ पाए
प्यार का होता है एक गैर बौद्घिक संस्करण भी

पिता के जीते जी
हमारे कन्धे जुते रहें खुद के यथार्थ को जोतने में
हमें उम्मीद थी कि हम पैदा करेंगे कुछ नया
जिसे देख विस्मय से चुप हो जाएंगे पिता

और जब एकदिन पिता चुप हो गए हमेशा के लिए

हमनें पाया सारी ज़मीन बंजर थी
जिसे जोत रहे थे हम बेतुके उत्साह के साथ

हम उस दौर के पुत्र है
जो अपने पिता के पिता बननें की फिराक में थे
मगर साबित हुए
खुद एक औसत पिता

दरअसल, पिता होना इतना आसान नही था
ये बात तब समझ में आई
जब पिता नही थे,पिता की कुछ स्मृतियाँ थी
जो रोज़ हंसती थी हमारे एकांत पर
जो रोज़ रोती थी हमारी मजबूरियों पर

पिता मजबूरी के प्रतीक नही थे
हमनें उनको बनाया ऐसा
भले ही हमारा मन्तव्य उनको छोटा करना नही था
मगर सच तो ये भी है
तमाम समझदारी के दावों के बीच
हम नही नाप पाए अपने ही पिता का कद।

4.

कभी कभी खीझकर
पिताजी मुझे कहते थे
सियासती
खासकर जब मैं तटस्थ हो जाता
या फिर उनका पक्ष नही लेता था
उनके एकाधिकार को चुनौति देने वाली व्यूह रचना का
वो मुझे मानते थे सूत्रधार
उन्हें लगता मैं अपने भाईयों को संगठित कर
उनके विरोध की नीति का केंद्र हूँ
गर्मा गरम बातचीत में उन्हें लगता
मिलकर उनको घेर रहा हूँ
उनको जीवन और निर्णयों को अप्रासंगिक बताने के लिए
सबको करता हूँ दीक्षित
बावजूद ऐसे गुस्से भरे आरोपों के
एक मैं ही था
जिसकी बात मानते थे वो
क्यों, ये आजतक नही जान पाया
मैंने देखा उनको धीरे धीरे ढल जाना
बिना किसी मजबूरी के
तमाम असहमतियों के बावजूद
पिता बचे मेरे जीवन में बेहद आदर के साथ
कुछ क्षमा प्रार्थनाओं की शक्ल में
और मैं पता नही किस रूप में बचा
उनके चले जाने के बाद
तमाम सियासत के बावजूद मैं हार गया एक दिन
तमाम विरोध के बावजूद वो जीत गए उस दिन
हमेशा की तरह।

© डॉ.अजित

वेस्ट यूपी के जिला शामली निवासी कवि डा. अजित तोमर ब्लॉगर भी हैं. सोशल मीडिया पर सक्रिय लेखन करते हैं. डॉ. अजित फिलवक्त हिंदी एवं पत्रकारिता विभाग, गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय, हरिद्वार में अध्यापन कर रहे हैं. उनसे आनलाइन संपर्क dr.ajeet82@gmail.com के जरिए किया जा सकता है. उनका पूरा पोस्टल एड्रेस इस प्रकार है-  डॉ. अजित सिंह तोमर, ग्राम+पोस्ट: हथछोया, जनपद: शामली , पिन: 247778, उत्तर प्रदेश, मोबाईल: 09997019933

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अपने मित्र Amitabh Thakur की ये फोटो मुझे बहुत पसंद है…

अपने मित्र Amitabh Thakur की ये फोटो मुझे बहुत पसंद है..

जानते हैं क्यों?

इसमें मुझे नए दौर का एक ऐसा डिजिटल हीरो दिखता है

जो अपने चश्मे में पूरा ब्रह्मांड समेटे है

जिससे वह सब कुछ देख सुन समझ लेता है

जो सत्ताएं उससे छिपाना चाहती हैं…

इकहरी हड्डी का यह छोटा सा दुबला पतला वरिष्ठ आईपीएस अफसर

बिना बुलेट प्रूफ जैकेट पहने

बिना सुरक्षा गार्ड लिए

बिना सरकारी दंड की परवाह किए

निकल लेता है उस ओर जिधर अन्याय होने की गुहार मचती है…

बिना परवाह किए नौकरी की….

यूपी पुलिस में आईजी होते हुए भी यह आदमी

अचानक वहां के लिए भी चल पड़ता है

एकलौता न्याय पीठ बन के

जहां सत्ताएं पूरे सिस्टम और सारे स्तंभों को साधते हुए

दमनचक्र करने कराने के बाद

चुप्पी साधने के लिए मुंहबोली रकम देकर

पूरे तंत्रों-सभी स्तंभों को चुप करा देती हैं…

कुछ लोग कहते हैं कि जनता का शहंशाह है ये

कई कहते हैं कि इसके लिए बहुत सारे दुआ देते हैं…

पर पता नहीं मुझे क्यों लगता है कि

सारी काबिलियत इस चमकीले चश्मे की है…

मुझे तो ये चश्मा लेना है जी….

ये आदमी अपनी आलोचनाओं

अपनी दुर्गतियों

अपनी मन:स्थितियों को काबू में कर

अपने रास्ते पर चलते जाने का

अदभुत ताकत पा चुका है….

जाने मुझे क्यों लगता है

इसको सारी उर्जा इसी चमकीले अदभुत चश्मे से मिलती है

इसी से यह सब कुछ सही सही देख सुन पहचान पाता है….

मुझे ये चश्मा चाहिए भाई….

कोई कहता है ये आदमी भाजपाई है

कोई कहता है बसपाई

कोई कहता है ये पूर्व सपााई है

तो कोई कोई कहता है कि ये तो पूरा का पूरा चिरकुटाई है…

ये हर आरोप को सैल्यूट प्रणाम जयहिंद करता है ….

ठठा कर हहा कर लंबा लंबा मौजियल हंसी हंसता है

फिर आगे बढ़ता चला जाता है उस राह जिसे मन ही मन तय किया…

अकूत सत्ताधारी अन्याय पर कलम और शब्द की लट्ठ बजाने अकेले

उसकी आंच उसकी उर्जा से हर कोई नतमस्तक, हाथ जोड़े या हथप्रभ

मुझे लगता है यह सब ये रोशनीदार डिजिटल चश्मा कराता है…

मुझे ये चश्मा चाहिए भाई…

ये जो इक बस अदना सा आदमी है

जो अकूत हिम्मत ताकत और सच साथ रखता है

जो अपना जीवन सिस्टम से लड़ भिड़ कर

इसे घुटनो पर लाकर थोड़ी डेमोक्रेसी,

थोड़ी ट्रांसपैरेंसी, थोड़ा जनहित सिखाना चाहता है

लगे लगे दो दो हाथ करके हम सबको

थोड़ी जादू की झप्पी देना चाहता है…

उससे मुझे कहना है कि….

बॉस, ये चश्मा मुझे दे दो न.

और, हां… ये चश्मा लेकर मत चले जाना कभी

उस अंधेरे की तरफ जहां मुंह पर कपड़ा बांध

कोई तालिबानी चला आए तुम्हारा चश्मा छीनने

आसाराम के मानसिक रोगी शिष्य माफिक

स्वर्ग जाने की खातिर जिसने न्यायप्रियों को सुला दिया

हां, जाना तो बता देना इस चश्मे का राज

ताकि तुम कभी अकेले लड़ो तो हम तुम्हारे क्लोन चश्मे से

देश दिशा समय स्थान चीन्ह कर चले आएं फौरन…

लेकिन प्लीज ये सब तो बाते हैं, कल्पनाएं हैं

पजेसिव टाइप का इकतरफा प्यार है…

बस मैं तो ये कहने के लिए ये सब लिख रहा हूं कि…

यार, मुझे ये चश्मा दे दो प्लीज

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से. इस पोस्ट पर आईं कुछ प्रमुख प्रतिक्रियाएं इस प्रकार हैं…

Sanjaya Kumar Singh खासियत चश्मे की नहीं – वो जहां खड़े हैं और जिसने तस्वीर उतारी है उसकी है जिससे चश्मा इतना गंभीर लग रहा है। मैंने एक बार ताजमहल के सामने खड़ी अपनी बेटी के चश्मे में ताजमहल लाने की कोशिश की थी। कई बार में सफलता मिली। यहां तो ताजमहल नहीं पूरा ब्रम्हांड दिख रहा है। कुछ संयोग तो है!!
संजय शर्मा ”ये चश्मा मुझे दे दो ठाकुर!” वाह बहुत खूब !
Narendra M Chaturvedi भाई ये दोस्ती निभा रहे हो…या….दुश्मनी….कर्ण का कवच उतरवा लेने के पीछे एक संयंत्र था….बिना चश्मा फिर ये कैसे शेरो की तरह जायेगे….यसवंत भाई आप द्रोणाचार्य न बनो….सन्देश रूपी कृष्ण बनकर अर्जुन की तरह अमिताभ जी को मार्ग बताइये….वैसे वो खुदही बुध्दि गणेश है….?
Virendra Pandey निःसंदेह चौंकाने वाली हरकत उनका शगल काफी पहले से रहा। यहाँ एसपी बस्ती तैनात रहने के दौरान करीब सवा वर्ष बीट रिपोर्टर की हैसियत से साथ काम करने का अवसर हमें भी मिल चूका है। अचानक कार से उतर कर हम सब में किसी साथी की बाइक पर बैठकर घटना स्थल पर पहुँचाने, रोटरी जैसे अनेक प्रतिष्ठित संस्थान में बतौर मुख्य अतिथि हवाई चप्पल पहनकर पहुँच जाने, जिसके कार्यक्रम जाएँ,उसी की बखिया उधेड़ना उनको काफी पसंद था। आदि-आदि….! मगर बंदा सच्चा और दिलेर है, इसमें कोई शक नहीं ।
Vinay Maurya Sinner लाजवाब बेमिसाल …..भईया तू चश्मा लेला… हमके अमिताभ भईया क लड़ाकू जिगर चाही….
Yashwant Singh हा हा हा …. लव यू विनय भइया… यार…तोहार यही देसी और सच्चा अंदाज त हमके पसंद आवे ला….
Vinay Maurya Sinner दुई ट्रक धनबाद भईया …..हमहू तोहसे बहुत पयार करीला भईया …हमके तोहरे पर बहुत गर्व रहला भईया …..माई कसम भईया
Pawan Upadhyay इतना टूटा हूँ कि छूने से बिखर जाऊंगा …..अब अगर और दुआ दोगे, तो मर जाऊँगा !
Amitabh Thakur यशवंत बाबू,
एक एक शब्द
जो आपने
लिखा यहाँ
अपने बड़े भाई के लिए
करता आनंदित
देती उर्जा
बढ़ाता उत्साह
लेकिन इनसे कहीं अधिक
बताता आपका व्यक्तित्व
यशवंत का वह व्यक्तित्व
जो विरले है
और विशिष्ट भी
खुरदरा भी स्नेह-सिंचित भी
रफ एंड टफ
मोम के माफिक भी
परिवर्तन की चाह
परिवर्तन का संवाहक
घटनाक्रम से निर्लिप्त भी
स्वयं में मस्त
स्वयं से सिक्त भी
जब-जब आपको देखता हूँ
अच्छा लगता है
बहुत अच्छा लगता है
यह जान कर
ऐसे अलमस्त, बुद्धिमान,
निडर, दबंग, तीक्ष्ण बुद्धि
पागल मौजूद हैं
हमारे बीच
आज भी, इस समय भी
Arvind Tripathi यशवन्त को दिए आपके प्रतिउत्तर ने मुझे आनन्दित कर गया।
Yashwant Singh अरे सर हम आपका चश्मवा मांग रहे हैं और आप मीठी मीठी बात कहके हमको फुसला रहे हैं smile emoticon
Rajiv Verma No doubt, yashwant ji Aap to bas hila diye, Mtble pagdandi ko Thame hue ek achha chitran….
Gourav Sharma बहुत अच्छी कविता।।
Ashish Singh Waise, aapka chasma bhi kuch kam nahi hai..
Singhasan Chauhan आज देश को ऐसे ही अफसरों की जरुरत है
Sarvendra Vikram मिस्टर इंडिया वाला चश्मा हैं,
Arshad Ali Khan ham salaam karte hain esi shakhsiyat ko . jai hind
Veer Yadav भीड़ से अलग चलने वाले हमेशा हीरो ही होते हैं
Kamta Prasad लेखन की यह कौन सी शैली है यह तो पता नहीं पर प्रस्तुति समझ में आने लायक और अबूझ नहीं है। साधुवाद।
Pradumn Kaushik सलाम
Varsha Srivastava जबरजस्त.

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रमाशंकर यादव उर्फ विद्रोही जी की एक कविता ‘पुरखे’

पुरखे

नदी किनारे, सागर तीरे,
पर्वत-पर्वत घाटी-घाटी,
बना बावला सूंघ रहा हूं,
मैं अपने पुरखों की माटी।

सिंधु, जहां सैंधव टापों के,
गहरे बहुत निशान बने थे,
हाय खुरों से कौन कटा था,
बाबा मेरे किसान बने थे।

ग्रीक बसाया, मिस्र बसाया,
दिया मर्तबा इटली को,
मगध बसा था लौह के ऊपर,
मरे पुरनिया खानों में।

कहां हड़प्पा, कहां सवाना,
कहां वोल्गा, मिसीसिपी,
मरी टेम्स में डूब औरतें,
भूखी, प्यासी, लदी-फदी।

वहां कापुआ के महलों के,
नीचे खून गुलामों के,
बहती है एक धार लहू की,
अरबी तेल खदानों में।

कज्जाकों की बहुत लड़कियां,
भाग गयी मंगोलों पर,
डूबा चाइना यांगटिसी में,
लटका हुआ दिवालों से।

पत्थर ढोता रहा पीठ पर,
तिब्बत दलाई लामा का,
वियतनाम में रेड इंडियन,
बम बंधवाएं पेटों पे।

विश्वपयुद्ध आस्ट्रिया का कुत्ता,
जाकर मरा सर्बिया में,
याद है बसना उन सर्बों का
डेन्यूब नदी के तीरे पर,
रही रौंदती रोमन फौजें
सदियों जिनके सीनों को।

डूबी आबादी शहंशाह के एक
ताज के मोती में,
किस्से कहती रही पुरखिनें,
अनुपम राजकुमारी की।

धंसी लश्क रें, गाएं, भैंसें,
भेड़ बकरियां दलदल में,
कौन लिखेगा इब्नबतूता
या फिरदौसी गजलों में।

खून न सूखा कशाघात का,
घाव न पूजा कोरों का,
अरे वाह रे ब्यूसीफेलस,
चेतक बेदुल घोड़ो का।

जुल्म न होता, जलन न होती,
जोत न जगती, क्रांति न होती,
बिना क्रांति के खुले खजाना,
कहीं कभी भी शांति न होती।

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”कविता: 16 मई के बाद” का दूसरा चरण: लुधियाना, कानपुर और बिहार-झारखंड

अभिषेक श्रीवास्तव : देश में सत्‍ता परिवर्तन की पहली सालगिरह के मौके पर बीती 17 मई को हमने राष्‍ट्रीय स्‍तर का एक आयोजन दिल्‍ली में करवाने में कामयाबी हासिल की है। इस बीच दो महीनों के दौरान कुछ तो मौसम और कुछ तकनीकी दिक्‍कतों के चलते ”कविता: 16 मई के बाद” के आयोजन नहीं हो सके, लेकिन हमें बताते हुए खुशी हो रही है कि जनता को कविता से जोड़ने की यह मुहिम एक बार फिर अपने पूरे उत्‍साह और ऊर्जा के साथ शुरू होने जा रही है।

इस मुहिम को अक्‍टूबर में साल भर पूरा हो जाएगा। उससे पहले आगामी महीनों में हमने कई कविता आयोजनों का खाका तैयार किया है। इस कड़ी में पहला आयोजन पंजाब के लुधियाना में रविवार 26 जुलाई को रखा गया है जहां हिंदी और पंजाबी के कई कवियों का कविता पाठ होगा। इसके अलावा उत्‍तर प्रदेश, बिहार और झारखंड में अगस्‍त और सितंबर के महीने में व्‍यापक कार्यक्रम प्रस्‍तावित हैं जिनकी परिणति अक्‍टूबर में दिल्‍ली में एक राश्‍ट्रीय आयोजन में होनी है जब ”कविता- 16 मई के बाद” का पहला साल पूरा होने पर इसे और औपचारिक शक्‍ल दी जाएगी व उन प्रस्‍तावों को लागू किया जाएगा  जो वरिष्‍ठ कवियों और लेखकों ने 17 मई के आयोजन में रखे थे।

आगामी कार्यक्रमों की एक प्रस्‍तावित सूची:

लुधियाना : 26 जुलाई, रविवार

कानपुर: 24 अगस्‍त, सोमवार

पटना, गया, भागलपुर, रांची, जमशेदपुर, दुमका, इत्‍यादि:  अगस्‍त-सितंबर, 2015 

लुधियाना और कानपुर के कार्यक्रम तय हैं। बिहार और झारखंड के कार्यक्रमों को अंतिम रूप देने के बाद सूचना सार्वजनिक की जाएगी।

आप सभी से अनुरोध है कि जनता की कविता को जनता तक पहुंचाने की इस मुहिम में नए उत्‍साह के साथ जुड़ें।

अभिषेक श्रीवास्तव के एफबी वाल से 

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आलोक धन्वा की सुप्रसिद्ध कविता पढ़िए… ”भागी हुई लड़कियां”

भागी हुई लड़कियां
-आलोक धन्वा-

एक

घर की जंजीरें
कितना ज्यादा दिखाई पड़ती हैं
जब घर से कोई लड़की भागती है

क्या उस रात की याद आ रही है
जो पुरानी फिल्मों में बार-बार आती थी
जब भी कोई लड़की घर से भगती थी?
बारिश से घिरे वे पत्थर के लैम्पपोस्ट
महज आंखों की बेचैनी दिखाने भर उनकी रोशनी?

और वे तमाम गाने रजतपरदों पर दीवानगी के
आज अपने ही घर में सच निकले!

क्या तुम यह सोचते थे
कि वे गाने महज अभिनेता-अभिनेत्रियों के लिए
रचे गए?
और वह खतरनाक अभिनय
लैला के ध्वंस का
जो मंच से अटूट उठता हुआ
दर्शकों की निजी जिन्दगियों में फैल जाता था?

दो

तुम तो पढ कर सुनाओगे नहीं
कभी वह खत
जिसे भागने से पहले
वह अपनी मेज पर रख गई
तुम तो छुपाओगे पूरे जमाने से
उसका संवाद
चुराओगे उसका शीशा उसका पारा
उसका आबनूस
उसकी सात पालों वाली नाव
लेकिन कैसे चुराओगे
एक भागी हुई लड़की की उम्र
जो अभी काफी बची हो सकती है
उसके दुपट्टे के झुटपुटे में?

उसकी बची-खुची चीजों को
जला डालोगे?
उसकी अनुपस्थिति को भी जला डालोगे?
जो गूंज रही है उसकी उपस्थिति से
बहुत अधिक
सन्तूर की तरह
केश में

तीन

उसे मिटाओगे
एक भागी हुई लड़की को मिटाओगे
उसके ही घर की हवा से
उसे वहां से भी मिटाओगे
उसका जो बचपन है तुम्हारे भीतर
वहां से भी
मैं जानता हूं
कुलीनता की हिंसा !

लेकिन उसके भागने की बात
याद से नहीं जाएगी
पुरानी पवनचिक्कयों की तरह

वह कोई पहली लड़की नहीं है
जो भागी है
और न वह अन्तिम लड़की होगी
अभी और भी लड़के होंगे
और भी लड़कियां होंगी
जो भागेंगे मार्च के महीने में

लड़की भागती है
जैसे फूलों गुम होती हुई
तारों में गुम होती हुई
तैराकी की पोशाक में दौड़ती हुई
खचाखच भरे जगरमगर स्टेडियम में

चार

अगर एक लड़की भागती है
तो यह हमेशा जरूरी नहीं है
कि कोई लड़का भी भागा होगा

कई दूसरे जीवन प्रसंग हैं
जिनके साथ वह जा सकती है
कुछ भी कर सकती है
महज जन्म देना ही स्त्री होना नहीं है

तुम्हारे उस टैंक जैसे बंद और मजबूत
घर से बाहर
लड़कियां काफी बदल चुकी हैं
मैं तुम्हें यह इजाजत नहीं दूंगा
कि तुम उसकी सम्भावना की भी तस्करी करो

वह कहीं भी हो सकती है
गिर सकती है
बिखर सकती है
लेकिन वह खुद शामिल होगी सब में
गलतियां भी खुद ही करेगी
सब कुछ देखेगी शुरू से अंत तक
अपना अंत भी देखती हुई जाएगी
किसी दूसरे की मृत्यु नहीं मरेगी

पांच

लड़की भागती है
जैसे सफेद घोड़े पर सवार
लालच और जुए के आरपार
जर्जर दूल्हों से
कितनी धूल उठती है

तुम
जो
पत्नियों को अलग रखते हो
वेश्याओं से
और प्रेमिकाओं को अलग रखते हो
पत्नियों से
कितना आतंकित होते हो
जब स्त्री बेखौफ भटकती है
ढूंढती हुई अपना व्यक्तित्व
एक ही साथ वेश्याओं और पत्नियों
और प्रमिकाओं में!

अब तो वह कहीं भी हो सकती है
उन आगामी देशों में
जहां प्रणय एक काम होगा पूरा का पूरा

छह

कितनी-कितनी लड़कियां
भागती हैं मन ही मन
अपने रतजगे अपनी डायरी में
सचमुच की भागी लड़कियों से
उनकी आबादी बहुत बड़ी है

क्या तुम्हारे लिए कोई लड़की भागी?

क्या तुम्हारी रातों में
एक भी लाल मोरम वाली सड़क नहीं?

क्या तुम्हें दाम्पत्य दे दिया गया?
क्या तुम उसे उठा लाए
अपनी हैसियत अपनी ताकत से?
तुम उठा लाए एक ही बार में
एक स्त्री की तमाम रातें
उसके निधन के बाद की भी रातें !

तुम नहीं रोए पृथ्वी पर एक बार भी
किसी स्त्री के सीने से लगकर

सिर्फ आज की रात रुक जाओ
तुमसे नहीं कहा किसी स्त्री ने
सिर्फ आज की रात रुक जाओ
कितनी-कितनी बार कहा कितनी स्त्रियों ने दुनिया भर में
समुद्र के तमाम दरवाजों तक दौड़ती हुई आयीं वे

सिर्फ आज की रात रुक जाओ
और दुनिया जब तक रहेगी
सिर्फ आज की रात भी रहेगी

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कॉरपोरेट हमले के खिलाफ एकजुट हुए लेखक, संस्‍कृतिकर्मी और पत्रकार

नई दिल्‍ली : नरेंद्र मोदी के नेतृत्‍व में पिछले साल केंद्र की सत्‍ता में आयी एनडीए सरकार को साल भर पूरा होते-होते साहित्यिक-सांस्‍कृतिक क्षेत्र भी अब उसके विरोध में एकजुट होने लगा है। बीते रविवार इसकी एक ऐतिहासिक बानगी दिल्‍ली में देखने को मिली जब दस हिंदीभाषी राज्‍यों से आए लेखकों, संस्‍कृतिकर्मियों, कवियों और पत्रकारों ने एक स्‍वर में कॉरपोरेटीकरण व सांप्रदायिक फासीवाद की राजनीति के खिलाफ अपनी आवाज़ बुलंद की और अपने-अपने इलाकों में भाजपा-आरएसएस द्वारा फैलायी जा रही अपसंस्‍कृति के खिलाफ मुहिम चलाने का संकल्‍प लिया। यहां स्थित इंडियन सोशल इंस्टिट्यूट में ”16 मई के बाद की बदली परिस्थिति और सांस्‍कृतिक चुनौतियां” विषय से तीन सत्रों की एक राष्‍ट्रीय संगोष्‍ठी का आयोजन किया गया जिसके मुख्‍य अतिथि बंबई से आए मकबूल फिल्‍मकार सागर सरहदी थे।  

पहले सत्र की शुरुआत करते हुए स्‍त्री अधिकार कार्यकर्ता कविता कृष्‍णन ने हिंदू परिवार के मिथक पर सवाल उठाया और यह बताने की कोशिश की कि कैसे श्रम कानूनों के संदर्भ में औद्योगिक कार्यस्‍थलों पर भी मौजूदा सरकार इस ढांचे को लागू करना चाह रही है। तमिलनाडु के कपड़ा उद्योग के उदाहरण से उन्‍होंने समझाया कि कैसे कार्यस्‍थलों पर हिंदू परिवार के पितृसत्‍तात्‍मक ढांचे को ‘परिवार’ के नाम पर लागू किया जा रहा है। मोदी सरकार द्वारा आंबेडकर के नाम पर किए जा रहे सामाजिक समरसता यज्ञ को घर वापसी का दूसरा संस्‍करण करार देते हुए उन्‍होंने हिंदू परिवार के मिथक को तोड़ने की जरूरत पर बल दिया। लेखकों-संस्‍कृतिकर्मियों के लिए मिथकों को तोड़ने की ज़रूरत का महत्‍व दक्षिण एशियाई स्‍तर पर समझाते हुए वरिष्‍ठ पत्रकार सुभाष गाताड़े ने साफ शब्‍दों में कहा कि इस धारणा को अब तोड़ना होगा कि हमारा समाज बहुत सहिष्‍णु है, बल्कि वास्‍तव में यह समाज बहुत हिंसक है। गाताड़े ने सांप्रदायिकता की बहस में महाराष्‍ट्र की विशेष स्थिति और 1848 में फुले के नेतृत्‍व में हुई क्रांति को समझने की अपील की। झारखण्‍ड से आए उपन्‍यासकार रणेन्‍द्र ने इस बात पर अफ़सोस जताया कि प्रगतिशील जमातों ने संस्‍कृति के मिथकीय आयाम को छोड़ दिया जिसका नतीजा यह हुआ कि दक्षिणपंथियों ने बड़ी आसानी से संस्‍कृति को धर्म में घुसा दिया और संस्‍कृति के पूरे मायने को ही वि‍कृत कर डाला। इसी संदर्भ में कवि नीलाभ ‘अश्‍क’ ने सांस्‍कृतिक हस्‍तक्षेप या संस्‍कृति में हस्‍तक्षेप का सवाल उठाते हुए बेर्तोल्‍ट ब्रेख्‍त की ‘सच कहने की पांच दिक्‍कतों’ का उल्‍लेख किया। रेयाज़-उल-हक़ ने भी ब्रेख्‍त की इस कविता का दूसरे सत्र में पाठ किया। 

माओवादी होने के आरोप में दो साल जेल में रह चुकी संस्‍कृतिकर्मी सीमा आज़ाद ने सांस्‍कृतिक हमले के मनोवैज्ञानिक पक्ष को उठाया और ‘सेंचुरी ऑफ दि सेल्‍फ’ नामक फिल्‍म के हवाले से बताया कि कैसे राज्‍यसत्‍ता हमारे दिमागों पर कब्‍ज़ा करती है। उन्‍होंने सांस्‍कृतिक एकाधिकार के खतरे का भी जिक्र किया। इस हमले को कुछ ताज़ा घटनाओं और खबरों के माध्‍यम से समझाने का काम पत्रकार अरविंद शेष ने किया, तो राजनीतिक कार्यकर्ता अर्जुन प्रसाद सिंह ने आज के दौर में सांस्‍कृतिक सेना का गठन करने की जरूरत को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्‍य में समझाया। अर्जुन प्रसाद ने कहा कि सबसे पहले मजदूर वर्ग के भीतर सांस्‍कृतिक स्‍तर पर काम किए जाने की ज़रूरत है। फिर दूसरा स्‍तर किसानों का है, छात्रों और मध्‍यवर्ग का है। इसके बाद जरूरी हो तो छोटे देसी कारोबारियों के बीच भी काम किया जा सकता है। 

मध्‍य प्रदेश से आए कहानीकार सत्‍यनारायण पटेल, लखनऊ से आए कवि कौशल किशोर और इलाहाबाद से आयीं कवियत्री संध्‍या नवोदिता ने प्रगतिशील जमातों के भीतर सांस्‍कृतिक एकता की समस्‍याओं और सांस्‍कृतिक चुनौतियों पर अपनी बात रखी। इस संदर्भ में शिक्षक अपूर्वानंद ने नरेंद्र मोदी की कामयाबी के पीछे उनकी सरल भाषा का हवाला देते हुए लेखकों से भाषा की जटिलता व पेचीदगी को बचाए रखने का आह्वान किया और मित्रता का दायरा बढ़ाने की बात कही। उन्‍होंने कहा कि जनता के पास जाने और संघर्ष की दुहाई देने के क्रम में कवि कहीं सरलीकरण में न फंस जाए, इसका ध्‍यान रखने की ज़रूरत है। कवि असद ज़ैदी ने पहले सत्र के समापन पर अध्‍यक्षीय वक्‍तव्‍य में भाषा और सरलीकरण के सवाल को प्राध्‍यापकीय चिंता ठहराते हुए कहा कि हमारे भीतर अतिसाहित्यिकता समा गयी है क्‍योंकि मामला सिर्फ अभिव्‍यक्ति या शैली का नहीं है, बल्कि एक लेखक के नागरिक होने का भी है। महाराष्‍ट्र में भगवा गिरोहों द्वारा की गयी नरेंद्र दाभोलकर और गोविंद पानसरे की हत्‍या का संदर्भ देते हुए उन्‍होंने एक ‘हत्‍यारे’ के हाथों लेखक भालचंद नेमाड़े के ज्ञानपीठ पुरस्‍कार लेने पर अफसोस जताया और कहा कि नेमाड़े ने ”सत्‍ता के सामने सच कहने” (स्‍पीकिंग ट्रुथ टु पावर) का एक मौका गंवा दिया। असद ज़ैदी ने इस अभियान को कविता के दायरे से बाहर निकालकर समूचे संस्‍कृतिकर्म तक विस्‍तारित करने और इसे एक नया नाम देने का प्रस्‍ताव रखा। 

कार्यक्रम का आधार वक्‍तव्‍य पढ़ते हुए अभियान के राष्‍ट्रीय संयोजक कवि रंजीत वर्मा ने सत्र के आरंभ में ज्ञानपीठ पुरस्‍कारों के संदर्भ में सवाल उठाया, ”पिछले दिनों हिंदी के वयोवृद्ध आलोचक नामवर सिंह को ज्ञानपीठ सम्मान समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ हंसते-बतियाते पाया गया। किस बात पर वे हंस रहे थे? क्या उन्होंने प्रधानमंत्री से पूछा कि आपके आने के बाद देश की एक बड़ी आबादी असहज हो गई है, किसान बड़ी संख्या में आत्महत्याएं करने लगे हैं और आप हैं कि ऐसे नाजुक समय में उन्हें ढांढस बंधाने की जगह उनकी जमीन छीनने में लगे हैं? उन्हें कहना चाहिए था कि लोगों को सच बोलने से रोका जा रहा है और फिर भी जो बोलने का हिम्मत दिखा रहे हैं आपके लोग उनकी हत्याएं तक कर दे रहे हैं? इसके बावजूद आपकी चुप्पी क्यों नहीं टूट रही है जबकि आप सबसे ज्यादा बोलने वाले प्रधानमंत्री माने जाते हैं?” वयोवृद्ध राजनीतिक कार्यर्ता शिवमंगल सिद्धांतकर ने योग और आइटी जैसे दो विरोधी सिरों को मिलाने का हवाला देते हुए मोदी को आड़े लिया और सरकार की श्रम नीतियों पर सवाल उठाए।  

कार्यक्रम का दूसरा सत्र अलग-अलग हिंदीभाषी राज्‍यों की ज़मीनी स्थिति और हस्‍तक्षेप की संभावनाओं पर था। इसमें उत्‍तर प्रदेश से कौशल किशोर, उत्‍तराखंड से पंकज, बिहार और पश्चिम बंगाल से अर्जुन प्रसाद सिंह व मृत्‍युंजय प्रभाकर, झारखंड से रणेन्‍द्र, मध्‍य प्रदेश से सत्‍यनारायण पटेल, छत्‍तीसगढ़ से सियाराम शर्मा, राजस्‍थान से संदीप मील, महाराष्‍ट्र से एडवोकेट बबिता केशरवानी और दिल्‍ली से अभिषेक श्रीवास्‍तव ने प्रतिनिधित्‍व किया। संदीप मील कार्यक्रम में उपस्थित नहीं थे, उनका वक्‍तव्‍य अभिषेक श्रीवास्‍तव ने पढ़कर सुनाया। अध्‍यक्षीय वक्‍तव्‍य में आनंद स्‍वरूप वर्मा ने अफ्रीका के देशों में संस्‍कृतिकर्म और लेखन के राजनीतिक महत्‍व के उदाहरण गिनाते हुए बताया कि कैसे दुनिया भर में लेखकों और संस्‍कृतिकर्मियों ने फासीवाद के खिलाफ कुर्बानियां दी हैं, लेकिन हिंदी में याद करने पर भी एक ऐसा लेखक नहीं दिखायी देता जिसका नाम लिया जा सके। चीनी लेखक लू शुन की एक कहानी के हवाले से उन्‍होंने हिंदी के लेखकों की तुलना उस कलाकार से की जो ड्रैगन की तस्‍वीरें तो बहुत अच्‍छी बनाता था, लेकिन उसके दरवाज़े पर जब ड्रैगन मिलने आया तो उसे देखकर वह बेहोश हो गया। अपने अध्‍यक्षीय वक्‍तव्‍य में कवि मंगलेश डबराल ने प्रतिवाद किया कि फिलहाल देश में कोई क्रांति की स्थिति ही नहीं है, इसलिए यह कहने का कोई मतलब नहीं बनता कि निर्णायक स्थिति में लेखक क्‍या करेगा और क्‍या नहीं। 

तीसरे सत्र में देश भर से आए करीब दो दर्जन कवियों का कविता पाठ और गीत हुए जिसका संचालन पाणिनि आनंद ने किया। अंग्रेजी के वरिष्‍ठ पत्रकार जावेद नक़वी, जिन्‍हें पहले सत्र में वक्‍तव्‍य रखना था, उन्‍होंने इस सत्र में दो कविताएं पढ़ीं। पंकज श्रीवास्‍तव, आदियोग, बलवंत यादव, उषा-राजेश और रिवॉल्‍यूशनरी कल्‍चरल फ्रंट के गीतों से सजे इस सत्र का समापन मंगलेश डबराल के कविता पाठ से हुआ। जेएनयू से आए कवि रमाशंकर यादव ‘विद्रोही’ अपने परिचित अंदाज़ में एक कविता पढ़ी, तो अन्‍य कवियों में कौशल किशोर, संध्‍या नवोदिता, सीमा आज़ाद (यूपी), उन्‍मुक्‍त (छत्‍तीसगढ़), निखिल आनंद गिरि, सपना चमडि़या (दिल्‍ली), देवेंद्र रिणवा (इंदौर), महादेव टोप्‍पो (झारखण्‍ड) और विनोद शंकर (बनारस) शामिल रहे।   

ध्‍यान रहे कि पिछले साल 16 मई को लोकसभा चुनाव का नतीजा आने के बाद दिल्‍ली में ”कविता: 16 मई के बाद” नाम से एक प्रक्रिया शुरू हुई थी जिसके अंतर्गत देश भर में बीते आठ महीनों के दौरान नौ जगहों पर प्रतिरोध का काव्‍य पाठ हो चुका है। दिल्‍ली से चलकर लखनऊ, इलाहाबाद, बनारस, पटना, रांची, चंडीगढ़ और झारखण्‍ड के गांवों में पहुंची इस कविता-यात्रा ने कई ऐसे कवियों को साथ लाने में कामयाबी हासिल की है जो अपनी रचनाओं के माध्‍यम से नए निज़ाम को चुनौती दे रहे हैं। इसी कड़ी में जनादेश का एक साल पूरा होने पर यह आयोजन किया गया था। शुरुआती दो सत्रों की अध्‍यक्षता वरिष्‍ठ पत्रकार आनंद स्‍वरूप वर्मा, कवि मंगलेश डबराल और असद ज़ैदी ने की और संचालन क्रमश: अभिषेक श्रीवास्‍तव व रंजीत वर्मा ने किया। अध्‍यक्ष मंडल में कहानीकार पंकज बिष्‍ट का भी नाम था, लेकिन वे नहीं आ सके। कविता सत्र की अध्‍यक्षता कवि वीरेन डंगवाल को करनी थी जिनके नहीं आ पाने के कारण यह जिम्‍मेदारी कवि नीलाभ ‘अश्‍क’ ने आंशिक रूप से निभायी। 

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किसान की खुदकुशी पर पाणिनी आनंद की कविता…

Panini Anand : यह नीरो की राजधानी है. एक नहीं, कई नीरो. सबके सब साक्षी हैं, देख रहे हैं, सबके घरों में पुलाव पक रहा है. सत्ता की महक में मौत कहाँ दिखती है. पर मरता हर कोई है. नीरो भी मरा था, ये भूलना नहीं चाहिए.

खून रोती आंखों वाली माँ,
बेवा, बच्चे और खेत,
सबके सब तड़पकर जान दे देंगे
फिर भी नहीं बदलेगी नीयत
इन भूखी आदमखोर नीतियों के दौर में
कैसे बचेगा कोई,
किसान
जब नियति का फैसला
बाज़ार के सेठ को गिरवी दे दिया गया हो
और चाय बेचनेवाले की सरकार
ज़हर और फंदे बेचने लगे

मौत किसे नहीं आती
कौन बचा है
पर कोई सोचता है,
कि मौत के सिवाय अब कोई रास्ता नहीं
और कोई सोचता है
वो मरेगा नहीं.
लोगों को लगातार मार रहे लोग
अपने को अमर क्यों समझते हैं
अपने मरने से पहले
दूसरों को मारना
बार-बार मारना
लगातार मारना
मरने पर मजबूर करना
किसी की उम्र नहीं बढ़ाता
न ही खेतों में सहवास से,
अच्छी होती है फसल
न गंगा नहाने से,
धुलते हैं पाप
न जीतने से,
सही साबित होता है युद्ध

हत्यारा सिर्फ हत्यारा होता है
भेष बदलने से
वो नीला सियार लग सकता है
साहूकार लग सकता है
कलाकार लग सकता है
बार-बार ऐसा सब लग सकता है
लेकिन हत्यारा, हत्यारा होता है
चाहे किसान का हो,
किसी मरीज़ का,
किसी ग़रीब का,
किसी हुनर का, पहचान का
कृति का, प्रकृति का
हत्या किसी को नहीं देती यौवन
न शांति, न अभ्युदय
मौत फिर भी आती है
मरना फिर भी होता है

खौलकर उठती मरोड़,
सूखती जीभ, बंधे गले,
और रह-रहकर चौंकते हाथों में
जो विचार
अंतिम अरदास हैं
वो चाहते हैं
कि
भाप हो जाएं
ऐसे नायक, सेवक
प्रतिनिधि
जिनके रहते आत्महत्या करे अन्नदाता
शीशे की तरह टूटकर बिखर जाएं
ऐसी आंखें
जो देखती रहीं मौत को लाइव
सूख जाएं दरख्त
कागज़ों की तरह फट जाएं राजधानी की वे सड़कें
जहाँ मरने के लिए मजबूर होकर आए एक किसान
किसान मरा करे,
देश तमाशा देखता रहे,
ऐसे लाक्षागृह की सत्ता
लहू के प्यासी नीतियां
और लड़खड़ाते गणतंत्र में
आग लगे.
मुर्दा हो चुकी कौमें
हत्यारी सरकारें
और देवालयों के ईष्ट
सबका क्षय हो.
प्रलय हो.

हा रे
हा

पाणिनि आनंद
22 अप्रैल, 2015. नई दिल्ली (एक किसान की राजधानी में आत्महत्या की साक्षी तारीख)

पाणिनी आनंद कवि, एक्टिविस्ट और पत्रकार हैं. उनका यह लिखा उनके फेसबुक वॉल से लिया गया है.

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न्यायपूर्ण आक्रामकता की कविता है ‘राष्ट्रपति भवन में सूअर’ : वीरेन डंगवाल

नई दिल्ली : अजय सिंह की कविताएं भारतीय लोकतंत्र की विफलता को पूरी शिद्दत से प्रतिबिंबित करती हैं। उनकी कविताओं का मूल स्वर स्त्री, अल्पसंख्यक और दलित है। सांप्रदायिकता से तीव्र घृणा उनकी कविताओं में मुखर होती है। अजय सिंह की कविताओं में दुख है लेकिन बेचारगी नहीं। जूझने की कविता है अजय की कविता। यह बातें शनिवार को वरिष्ठ कवि, पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक अजय सिंह के पहले कविता संग्रह ‘राष्ट्रपति भवन में सूअर’ पर चर्चा के दौरान सामने आईं। गुलमोहर किताब द्वारा दिल्ली के हिंदी भवन में आयोजित इस कार्यक्रम में कवि, लेखक, पत्रकार, आलोचक, चित्रकार, प्राध्यापक व तमाम विधाओं के वरिष्ठ लोगों ने शिरकत की।

 

वरिष्ठ कवि वीरेन डंगवाल ने कहा अजय सिंह की कविताएं न्यायपूर्ण आक्रामकता की है। विचार के स्तर पर वे बेहद महत्वपूर्ण हैं और एक बायोस्कोपिक वितान रचती हैं। ये कविताएं मौजूदा दौर का अहम दस्तावेज है। अजय हमारे दौर के अहम कवि है। विचार के स्तर पर, वामपंथ के आग्रह के स्तर पर, समाज में परिवर्तन के स्तर पर इनकी रचनाएं सुंदर है। फिल्मी गीतों के प्रयोग सहित कई नए प्रयोग कविताओं में हैं, जिनपर गंभीर चर्चा होनी चाहिए। कवि को संग्रह के लिए बधाई देते हुए वीरेन डंगवाल ने कहा कि यह संग्रह कई ध्यान आकर्षित करेगा। यह भर्त्सना का भी पात्र बनेगा, लेकिन यह कई बहुत जरूरी सवालों को भी रेखांकित करने का काम करेगा। उन्होंने कहा कि अजय की कविताएं अच्छी और सच्ची रचनाशीलता का द्योतक हैं, जो विचारधारा के महत्व को स्थापित करती हैं।

वरिष्ठ कवि मंगलेश डबराल ने कहा कि अजय की कविताओं में छलांग लगाने की अद्भुत क्षमता है। ये दस्तावेजी कविताएं है। इनका कैचमेंट एरिया बहुत बड़ा है। विस्मरण के दौर में ये भूलने के खिलाफ खड़ी हैं। ये स्मृति को बचाने का काम करती हैं। इन कविताओं को उन्होंने दस्तावेजीकरण की कविताएं बताया। इनमें नेली का नरसंहार से लेकर चंद्रारूपसपुर, बथानी टोला… जैसे अनगिनत नृशंस हिंसाओं का संदर्भ आता है जिनके कारण हमारा जीवन बहुत तबाह हुआ है, उनका विस्तृत उल्लेख है। उन पर कवि शमशेर के अमन के राग का गहरा असर है और यह आज के दौर में जरूरी है। मंगलेश डबराल ने कहा कि अजय की कविताओं में प्रेम से तुरंत राजनीति और राजनीति से प्रेम, बच्ची से राजनीति, राजनीति से परिवार के बीच जो छलांग लगती है, वह जबर्दस्त है। कविता का उड़ान देना अहम है। उन्होंने खुसरो घर लौटना चाहे और झिलमिलाती हैं अंनत वासनाएं शीर्षक कविताओं को बेहतर कविताएं बताते हुए कहा कि उन्हें अजय सिंह की प्रेम कविताओं से थोड़ी दिक्कत है। उन्होंने कहा अजय सिंह की कविताओं में क्रोध बहुत है, जहां इसका द्वंद्वात्मक इस्तेमाल है, वहां बेहतर लगता है और जहां नहीं वहां भारी हो जाता है।

चर्चा की शुरुआत करते हुए आलोचक वैभव सिंह ने अजय सिंह की एक कविता को उद्धृत किया और कहा कि ये ‘पवित्र आवारागर्दी’ से निकली कविताएं हैं। ये प्रतिरोध और छापामार अंदाज की कविताएं हैं। इन कविताओं में कहीं से भी दया व हताशा नहीं, ये जूझने की आंदोलन की कविताएं हैं। ये मुट्ठी ताने कविताएं हैं। एक रेडिकल मार्क्सवादी की तरह यार-दोस्तों को याद करने का ज़ज्बा कॉमरेड अंजता लोहित की स्मृति में लिखी गई कविता में दिखाई देता है। यह वाम आंदोलन की परंपरा की याद दिलाता है। इसके साथ स्त्री-पुरुष के संबंधों को बिल्कुल नए ढंग से, नई नींव के साथ रखा गया है। कविताओं में औरत स्वायत्त है, वह पेसिव नहीं है। शीर्षक कविता ‘राष्ट्रपति भवन में सूअर’का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि इस कविता में राष्ट्रपति भवन सत्ता प्रतिष्ठान के एक रूपक के रूप में आया है जिसके माध्यम से अजय सिंह भारतीय लोकतंत्र की विफलता की कहानी कहते हैं। इस कविता में ब्यौरे बहुत ज्यादा है, जिसे शिल्प नहीं झेल पाता।

वरिष्ठ कथाकार और समयांतर पत्रिका के संपादक पंकज बिष्ट ने कहा कि अजय घर-परिवार से शुरू करके देश-दुनिया को इसमें समेट लेते हैं। उन्होंने कहा कि कविताओं में बिंब आए हैं, वह कवि की सचेत वैचारिकी का परिचायक है। कोई भी चीज बेवजह नहीं है।

युवा आलोचक आशुतोष कुमार ने ‘राष्ट्रपति भवन में सूअर’ कविता के बारे में कहा कि यह इस बात को बताती है कि भारतीय लोकतंत्र में किन लोगों को होना शामिल होना था जिन्हें शामिल नहीं किया गया। अजय की कविता हर तरह के रिश्ते को रेखांकित करती हैं चाहे वे स्त्री के पुरुष के साथ हों, सत्ता प्रतिष्ठान के अपने नागरिकों के साथ या समाज के अपने कलाकारों के साथ। ये अकविता की कविताएं नहीं हैं। अकविता एक पर्सनल व्यक्तिवाद की जमीन होती है, लेकिन अजय सिंह की कविता में ऐसा नहीं है। कवि का सब कुछ नाम व पहचान के साथ कविता में मौजूद है, वह डायरेक्ट है, कोई मुलम्मा नहीं चढ़ाता। सब कुछ साफ है। कविता में प्रेम प्रचुर है। एक पुरुष जो कामना में डूबा हुआ है। एरोटिक प्रेम है, स्त्री को डिटेल में चित्रण। ऐसा पुरुष जो ऐसी स्त्री से प्रेम करता है जो स्वतंत्र हो, किसी भी झांसे में न आए। झिलमिलाती हैं अनंत वासनाएं कविता में दौड़ते हुए वंसत को सुनने की टापें सुदंर बिंब है।

लेखक शीबा असल फहमी ने अजय सिंह की कविताओं को हिंदुस्तान में मानवाधिकार उल्लंघन की फैक्टशीट कहा। उन्होंने कहा कि यह बहुत कठिन समय है और एक कवि के लिए तो बहुत ही ज्यादा। उन्होंने कहा कि कवि हमें एक दृष्टि देता है कि किस तरह से लड़ा जा सकता है।

वरिष्ठ कवि और प्रकाशक असद जैदी ने कहा कि अजय सिंह की कविताएं समकालीन यथार्थ की है। हमारे समय का प्रेम, गुस्सा, निराशा, घृणा- यह इनमें झलकता है। उन्होंने याद दिलाया कि अजय सिंह अपने साथियों के बीच एक सचेतक के रूप में रहे हैं और यही उनकी कविताओं की मूल भावना है। राष्ट्रपति भवन में सूअर कविता में वह इमोशन की रेंज से गुजरते हैं, समकालीन यथार्थ से गुजरते हैं। ब्यौरे और विवरण के बीच के संबंध को समझने की जरूरत है। उन्होंने भी कहा कि इन कविताएं में डाक्यूमेंटेशन की भावना जबर्दस्त है। अब झंडा, नारा जैसे शब्द कविता-कहानी से सेंसर हो गए हैं, ऐसा अजय के यहां नहीं है। जब इन्हें कहना होता है लाल सलाम तो वह कहते हैं। आज के दौर में इस रिवायत को जिंदा रखा जरूरी है। उन्होंने इन कविताओं को प्रगतिशील वामपंथी धारा की प्रतिनिधि कविता कहा।

कवि शोभा सिंह ने अजय सिंह की कविताओं को उनका घोषणापत्र बताया। इसमें वह ऐलान करते हैं कि उन्हें किन बातों से नफरत है और किससे प्यार। शोभा सिंह ने कहा कि अजय की कविताएं उनके जीवन की ही तरह अन्याय और जुल्म से टकराने का जोखिम उठाती हैं। उनके मुताबिक कवि का सपना लोकतांत्रिक भारत का सपना है।

समकालीन तीसरी दुनिया के संपादक आनंद स्वरूप वर्मा ने ‘खिलखिल को देखते हुए गुजरात’ कविता का विस्तार से जिक्र करते हुए इसे बेहद महत्वपूर्ण कविता बताया। उन्होंने कहा कि इस कविता में आज के भारत का इतिहास है। इस कविता में जो भावुक अभिव्यक्ति है, वह बहुत महत्वपूर्ण है। यह खिलखिल का जन्म से शुरू होती है, जहां दुनिया को सुंदर बनाने का सपना जन्म लेता है और वहीं सुंदर बनाने का सपना बिगड़ना शुरू हो गया था। गुजरात का जिक्र पूरी उसकी विभीषका के साथ आता है। इस कविता में छोटी बच्ची के जरिए उन्होंने सबको सीख दी है कि गुजरात नरसंहार के दोषियों को कभी नहीं माफ करना चाहिए। सच को सच की तरह कहने का साहस आज के दौर में कम होता जा रहा है, ऐसे में यह संग्रह पूरे जोखिम के साथ यह काम करता है। उन्होंने कहा कि 2002 गुजरात नरसंहार का अजय की कविताओं पर गहरा असर पड़ा है।

कवि इब्बार रबी ने कहा कि अजय सिंह की कविताओं में भावनाओं का ज्वार बहता है। उन्होंने बहुत विस्तार से अजय सिंह की कविताओं की विवेचना करते हुए कहा कि यहां जो व्यक्तिगत है, वही राजनीतिक है। परमाणु विकिरण की विभीषिका को जिस तरह से अजय ने कमल से बरसने वाले पराग से जोड़ा है, वह उनके परिपक्व राजनीतिक कवि का द्योतक है। कविताओं में फिल्मी गानों के इस्तेमाल की इब्बार रब्बी ने प्रशंसा करते हुए कहा कि कवि शून्य में नहीं रच रहा। प्रखर आलोचक संजीव कुमार ने कहा ये कविताएं बहुत डिमांडिंग हैं। ये अंतर-पाठीय है। इन्हें समझने के लिए कई संदर्भों का पता होना चाहिए। इस तरह से ये शिक्षित करती हैं। हिन्दी कविता में पहली बार लोकप्रिय कल्चर के प्रति जबरदस्त आकर्षण दिखा है। संजीव ने कहा कि इन कविताओं की खासियत यह है कि ये जितनी सहजता के साथ लाल किले पर लाल निशान की बात करती है, उतनी ही सहजता से झिलमिलाती अनंत वासनाओं का जिक्र भी करती हैं। राष्ट्रपति भवन में सूअर एक सत्ता के प्रतीक के तौर पर आया है। यह जीवंत मसला है। उन्होंने संग्रह में नुख्तों के सही प्रयोग का जिक्र करते हुए भाषा के प्रति कवि की सजगता का प्रमाण बताया।

फिनलैंड से आए कवि तथा चित्रकार सईद शेख ने कवि अजय सिंह के साथ अपने लगभग 50 साल पुराने रिश्तों का जिक्र करते हुए कहा कि युवाअवस्था में सामंतवाद की गिरफ्त में रहने वाले अजय ने एक बार जब मार्क्सवाद का दामन पकड़ा तो कभी नहीं छोड़ा। वह जीवन के हर क्षेत्र में मार्क्सवाद के प्रवक्ता के तौर पर रहे और कविताओं में भी इसका झंडा बुलंद किए हुए हैं।

वरिष्ठ साहित्यकार असगर वजाहत ने कहा कि यह संग्रह अजय सिंह की विश्वास को बढ़ाने वाली कवायद का हिस्सा है। दुुनिया में बहुत कुछ खराब है, यह हम सब जानते है, लेकिन उसे बदलना कितना जरूरी है, यह बताती हैं ये कविताएं। लेखक हेमलता महिश्वर ने कहा कि इन कविताओं का दलित दृष्टि से पाठ किया जाना चाहिए। राष्ट्रपति भवन में सूअर पहुंचाने की कल्पना ही ब्राह्मणवादी सोच को चुनौती देने वाली है। वरिष्ठ लेखक-कवि शिवमंगल सिद्धांतकर ने कहा कि अजय सिंह ने अलग ढंग का क्राफ्ट रचा है, जिसकी दाद देनी चाहिए। इसमें बाइसकोप की महत्ता है और कवि की दृष्टि भी वैसी ही है। इस दौर में ऐसी कविताओं की बेहद जरूरत है। युवा कवि रजनी अनुरागी ने इन्हें हिम्मत की कविताएं बताया और इसका व्यापक पाठ करने की जरूरत पर बल दिया। इसमें दलित चेतना और स्वतंत्र नारी की जो ध्वनियां हैं, वे काबिलेतारीफ है। लेखक अरविंद कुमार ने कहा कि ये अभिजात्य वर्ग की रचना को चुनौती देती हैं। आज के दौर में साहित्य में जो विचारशून्यता की स्थिति है, उसे अजय सिंह की कविताएं नकारती हैं। इसलिए इनका विरोध ज्यादा होगा क्योंकि ये यथास्थिति के खिलाफ हैं।

कार्यक्रम में वरिष्ठ कवि पंकज सिंह, सांसद के.सी. त्यागी, पत्रकार पंकज श्रीवास्तव, डॉ. केदार कुमार, कवि मुकेश मानस, शायर रहमान मुसव्विर, कवि राज वाल्मिकी, लेखक अवतार सिंह, कवि आकांक्षा पारे काशिव, पत्रकार दिवाकर, कथाकार परवेज अहमद, कवि पत्रकार चंद्रभूषण, कवि आर.चेतन क्रांति, पत्रकार मनीषा भल्ला, सामाजिक कार्यकर्ता बेजवाडा विल्सन, धर्मदर्शन, कवि माधवी श्री, शायर हैदर अली, अधिवक्ता दीपक सिंह, आशीष वर्मा, स्वाति सहित बड़ी संख्या में लोगों मौजूद थे।

कार्यक्रम की शुरुआत में साहित्यकार कैलाश वाजपेयी, लेखक तुलसीराम, विजय मोहन सिंह, रंगकर्मी जितेंद्र रघुवंशी के निधन पर शोक व्यक्त करते हुए दो मिनट का मौन रखा गया। कार्यक्रम का संचालन वरिष्ठ पत्रकार व संस्कृतिकर्मी भाषा ने किया। स्वागत कवि और शायर मुकुल सरल ने किया।

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सरोज सिंह के पहले कविता संग्रह ‘तुम तो आकाश हो’ का लोकार्पण

8 फरवरी 2015 को इंदिरापुरम, ग़ाज़ियाबाद में Saroj Singh की काव्यकृति ‘तुम तो आकाश हो’ का विमोचन हुआ। इस किताब का लोकार्पण हिंदी की मूर्धन्य कथाकार मैत्रेयी पुष्पा, दुनिया इन दिनों के प्रधान संपादक सुधीर सक्सेना, कवि सिद्धेश्वर सिंह, संस्कृत की प्राध्यापिका हीरावती सिंह तथा लेखक और साइक्लिस्ट राकेश कुमार सिंह ने किया।

‘तुम तो आकाश हो’ की कविताओं के आलोक में समकालीन स्त्री लेखन पर टिप्पणी करते हुए मैत्रेयी पुष्पा ने कहा कि इस समय का स्त्री लेखन काफी बेबाक हुआ है। लिखने के ख़तरे कम हुए हैं। फेसबुक जैसे नवमंचों ने इस ख़तरे को और कम तो किया ही है, साथ ही लिखने, छपने औैर पाठक तक पहुँचने की प्रक्रिया आसान भी किया है।

सरोज सिंह ने अपनी कुछ कविताओं के पाठ के साथ-साथ अपने रचनाकर्म की शुरुआत और रचना को गंभीरता से लेने की कहानी को संक्षेप में उपस्थित श्रोताओं के समक्ष रखा। संदीप सिंह ‘साहिल’ ने संग्रह की कुछ रचनाओं का प्रभावी पाठ किया। किताब पर राकेश कुमार सिंह, हीरावती सिंह, सिद्धेश्वर सिंह और सुधीर सक्सेना के अपने विचार रखे। धन्यवाद ज्ञापन सीआईएसएफ के सीनियर कमांडेंट पी.पी. सिंह ने और संचालन कवयित्री इंदु सिंह ने किया।

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कविता पाठ करती दिखीं एंकर तनु शर्मा

Ankit Sharma : बीते दिनों देश के मशहूर चैनल इंडिया टीवी की पत्रकार तनु शर्मा ने आत्महत्या की कोशिश की थी. उन्होंने इंडिया टीवी प्रबंधन के द्वारा हुए मानसिक शोषण के चलते ये कदम उठाया था लेकिन ईश्वर की कृपा से आज भी वो हमारे बीच हैं, सकुशल हैं… हाल ही में उनको टीवी पर नहीं, लेकिन एक वीडियो में देखा, कविता पाठ करते हुए.

मनीष गुप्ता लिखित कविता का शीर्षक है- ”तुम्हारे ना होने का सुख.” वीडियो यूट्यूब पर ‘हिंदी कविता’ नामक चैनल पर अपलोडेड है. इस वीडियो को ज्यादा से ज्यादा शेयर करें ताकि तनु को अच्छा लगे और उनमें नई उर्जा का संचार हो. This video want promotion…  लिंक ये है वीडियो का

https://www.youtube.com/watch?v=MxEvZrI8_Fk

युवा पत्रकार अंकित शर्मा के फेसबुक वॉल से.

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25 नवम्बर नजीर बनारसी की जंयती पर : …हम अपना घर न जलाते तो क्या करते?

हदों-सरहदों की घेराबन्दी से परे कविता होती है, या यूं कहे आपस की दूरियों को पाटने, दिवारों को गिराने का काम कविता ही करती है। शायर नजीर बनारसी अपनी गजलों, कविताओं के जरिए इसी काम को अंजाम देते रहे है। एक मुकम्मल इंसान और इंसानियत को गढ़ने का काम करने वाली नजीर को इस बात से बेहद रंज था कि…

‘‘न जाने इस जमाने के दरिन्दे
कहा से उठा लाए चेहरा आदमी का’’

एक मुकम्मल इंसान को रचने-गढ़ने के लिए की नजीर की कविताएं सफर पर निकलती है, हमे हमारा फर्ज बताती है, ताकीद करते हुए कहती है-

‘‘वहां भी काम आती है मोहब्बत
जहा नहीं होता कोई किसी का’’

मोहब्बत, भाईचारा, देशप्रेम ही नजीर बनारसी की कविताओं की धड़कन हैं। अपनी कहानी अपनी जुबानी में खुद नजीर कहते है, ‘‘मैं जिन्दगी भर शान्ति, अहिंसा, प्रेम, मुहब्बत आपसी मेल मिलाप, इन्सानी दोस्ती आपसी भाईचारा…. राष्ट्रीय एकता का गुन आज ही नहीं 1935 से गाता चला आ रहा हूं। मेरी नज्में हो गजलें, गीत हो या रूबाईया….. बरखा रूत हो या बस्त ऋतु, होली हो या दीवाली, शबेबारात हो या ईद, दशमी हो या मुहर्रम इन सबमें आपको प्रेम, प्यार, मुहब्बत, सेवा भावना, देशभक्ति कारफरमा मिलेगी। मेरी सारी कविताओं की बजती बासुरी पर एक ही राग सुनाई देगा वह है देशराग…..मैंने अपने सारे कलाम में प्रेम प्यार मुहब्बत को प्राथमिकता दी है।

हालात चाहे जैसे भी रहे हो, नजीर ने उसका सामना किया, न खुद बदले और न अपनी शायरी को बदलने दिया कही आग लगी तो नजीर की शायरी बोल उठी-

‘‘अंधेरा आया था, हमसे रोशनी की भीख मांगने
हम अपना घर न जलाते तो क्या करते?’’

25 नवम्बर 1925 में बनारस के पांडे हवेली मदपुरा में जन्में पेशे से हकीम नजीर बनारसी ने अंत तक समाज के नब्ज को ही थामे रखा। ताकीद करते रहे, समझाते रहे, बताते रहे कि ये जो दीवारे हैं लोगों के दरमियां, बांटने-बंटने के जो फसलफे हैं, इस मर्ज का एक ही इलाज है, कि हम इंसान बनें और इंसानियत का पाठ पढ़ें, मुहब्बत का हक अदा करें। कुछ इस अंदाज में उन्होंने इस पाठ को पढ़ाया-

‘‘रहिये अगर वतन में तो इन्सां की शान से
वरना कफन उठाइये, उठिये जहान से’’

नजीर का ये इंसान किसी दायरे में नहीं बंधता। जैसे नजीर ने कभी खुद को किसी दायरे में कैद नहीं किया। गर्व से कहते रहे मैं वो काशी का मुसलमां हूं नजीर, जिसको घेरे में लिये रहते है, बुतखाने कई। काशी यानि बनारस को टूट कर चाहने वाले नजीर के लिए बनारस किसी पारस से कम नहीं था। घाट किनारे मन्दिरों के साये में बैठ कर अक्सर अपनी थकान मिटाने वाले नजीर की कविता में गंगा और उसका किनारा कुछ ऐसे ढला-

‘‘बेदार खुदा कर देता था आंखों में अगर नींद आती थी,
मन्दिर में गजर बज जाता था, मस्जिद में अजां हो जाती थी,
जब चांदनी रातों मं हम-तुम गंगा किनारे होते थे।‘‘

नजीर की शायरी उनकी कविताएं धरोहर है, हम सबके लिए। संर्कीण विचारों की घेराबन्दी में लगातार फंसते जा रहे हम सभी के लिए नजीर की शायरी अंधरे में टार्च की रोशनी की तरह है, अगर हम हिन्दुस्तान को जानना चाहते है, तो हमे नजीर को जानना होगा, समझना होगा कि उम्र की झुर्रियों के बीच इस साधु, सूफी, दरवेष सरीखे शायर ने कैसे हिन्दुस्तान की साझाी रवायतों को जिन्दा रखा। उसे पाला-पोसा, सहेजा। अब बारी हमारी है, कि हम उस साझी विरासत को कैसे और कितना आगे ले जा सकते है। उनके लफजों में…

‘‘जिन्दगी एक कर्ज है, भरना हमारा काम है,
हमको क्या मालूम कैसी सुबह है, शाम है,
सर तुम्हारे दर पे रखना फर्ज था, सर रख दिया,
आबरू रखना न रखना यह तुम्हारा काम है।‘‘

बनारस से युवा और तेजतर्रार पत्रकार भाष्कर गुहा नियोगी की रिपोर्ट. संपर्क: 09415354828

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बनारसी कुल थूकिहन सगरो घुला के मुंह में पान, का ई सुनत बानी अब काशी बन जाई जापान?

आजकल बनारस सुर्खियों में है… बनारस को लेकर रोज कोई न कोई घोषणा सुनने को मिल रही है…. ऐसा होगा बनारस… वैसा होगा बनारस… पर न जाने कैसा होगा बनारस…. सब कुछ भविष्य के गर्भ में है…. पर दीपंकर की कविता में आज के बनारस की तस्वीर है…. दीपंकर भट्टाचार्य कविता लिखते हैं… दीपांकर कविता फैंटसी नहीं रचतीं बल्कि बड़े सीधे और सरल शब्दों में समय के सच को हमारे सामने खड़ा कर देतीं हैं…. दीपांकर के शब्दों का बनारस हमारा-आपका आज का बनारस है जिसे हम जी रहे है… आप भी सुनिए उनकी कविता…

 

अब काशी बन जाई जापान?

–दीपंकर भट्टचार्य–

बनारसी कुल थूकिहन सगरो
घुला के मुंह में पान,
का ई सुनत बानी,
अब काशी बन जाई जापान?
जब देखा तब बिजली रानी,
कहीं घूम के आवत बानी,
मुंह चिढ़ा के चल जाई पानी,
बनल हौ भुतहा घर-दुआर,
उपर से रेगिस्तान,
का इ सुनत बानी,
अब काशी बन जाई जापान?
शहर क आधा रोड खनल हौ,
सगरो कूड़ा भरल-पड़ल हौ,
नरिया के उपर हलुवाई,
छानत हौ पकवान।
का ई सुनत बानी,
अब काशी बन जाई जापन?
गजब हौ भागम-भाग सड़क पर,
कब न दुपहिया मार दे टक्कर,
जरको चुकबा, जइबा उप्पर
जइसे रोड इ नाही, कउनो
रेस क हौ मैदान
का इ सुनत बानी,
अब काशी बन जाई जापान?
लगल हौ सगरो खुमचा-ठेला,
खूब बिकत हौ अंडा-केला,
जम में ला फिन घन्टन झेला,
बिचवें में फॅंस गयल हौ मुर्दा,
पहुंची कब श्मशान?
का इ सुनत बानी,
अब काशी बन जाई जापान?

प्रस्तुति : भाष्कर गुहा नियोगी, बनारस.

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