10वां साल : आजमगढ़ में 26 मई से 31 मई तक ‘अवाम का सिनेमा’

इसे संयोग नहीं कहा जा सकता कि जिस दिन इस देश की जनविरोधी सत्‍ता अपनी जीत की पहली सालगिरह का जश्‍न मना रही होगी, ठीक उसी दिन मेहनतकश अवाम भी अपने संघर्षों के एक अध्‍याय का दस साल पूरा कर रही होगी, वो भी उस सरज़मीं पर जिसे बीते एक दशक में सबसे ज्‍यादा बदनाम करने की साजि़शें रची गयी थीं। मंगलवार 26 मई को ‘अवाम का सिनेमा’ अपने आयोजन के दस साल होने पर उत्‍तर प्रदेश के आज़मगढ़ में हफ्ते भर का एक भव्‍य समारोह करने जा रहा है। इस समारोह में किसान होंगे, मजदूर होंगे, जनता की संस्‍कृति होगी, काकोरी के शहीदों की याद होगी, भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन की विरासत होगी, कबीर होंगे, जनसंघर्षों की एकजुटता होगी और सबसे बढ़कर वे फिल्‍में होंगी जिन्‍होंने कदम-दर-कदम अपनी रचनात्‍मकता से सत्‍ता के ज़हर को हलका करने का काम किया है।

शहर के छह अलग-अलग कॉलेजों में होने जा रहे इस समारोह को महज एक फिल्‍म समारोह की दसवीं सालगिरह कहना जनता की लड़ाई को कम आंक कर देखने जैसा होगा। ‘अवाम का सिनेमा’ जिन कठिनाइयों और चुनौतियों को पार करते हुए आम लोगों के सहारे अपने सफ़र में इस पड़ाव तक पहुंचा है, वह मामूली बात नहीं है। सुदूर पूर्वांचल के कस्‍बों से लेकर करगिल तक जनता की कहानियों का प्रदर्शन जनता के ही सहयोग से करवाने का यह सिलसिला आज इतना बड़ा हो चुका है कि इसे देश भर से सहयोग मिल रहा है। इतिहासकार लालबहादुर वर्मा, संस्‍कृतिकर्मी विकास नारायण राय, शहीद-ए-वतन अशफाक उल्ला खां के पौत्र जनाब अशफाक उल्ला खां, समाजवादी चिन्‍तक विजय नारायण, डॉ. कुबेर मिश्र, महन्‍त विचार दास साहेब, प्रो. पी.एन. सिंह समेत तमाम साथियों और वरिष्‍ठों के ताने-बने से बुनी यह संघर्ष और सौहार्द की ऐसी चादर है जो ‘अच्‍छे दिनों’ के नाम पर दिल्‍ली से बहायी जा रही ज़हरीली हवाओं को रोकने के लिए जनता के पाल का काम करेगी।

जिस तरीके से बीते एक साल में नरेंद्र मोदी की फासिस्‍ट सरकार जनता के बीच बदनाम हुई है और उसने अपना इकबाल खोया है, यह अव्‍वल तो जनता की अपनी समझदारी में हमारा भरोसा जगाता है और दूसरे, जनता के सघर्षों को और तेज करने की हमें प्रेरणा देता है। ‘अवाम का सिनेमा’ की अहमियत इसी मोर्चे पर समझ में आती है। पहले दिन आज़मगढ़ के शिब्‍ली नेशनल कॉलेज के रामप्रसाद बिस्मिल सभागार में काकोरी के क्रांतिवीर की जेल डायरी और दुर्लभ दस्‍तावेजों की प्रदर्शनी से उद्घाटन के बाद ”क्रांतिकारी आंदोलन की विरासत और हमारा प्रतिरोध” विषय पर कुछ अहम संबोधन होंगे जिसके बाद फिल्‍मों का प्रदर्शन देर रात 11 बजे तक किया जाता रहेगा। यह सिलसिला अगले दिन क्रांतिकारी पीर अली सभागार में जारी रहेगा जहां नेपाली दस्‍तावेजी फिल्‍मों पर केंद्रित सत्र में नेपाल से आए फिल्‍मकार सभा को संबोधित करेंगे। तीसरा दिन मालटारी के मथुरा राय महिला महाविद्यालय में किसानों के सवाल पर केंद्रित होगा तो चौथा दिन शिव मंदिर धर्मशाला में ”बाज़ार, लोकतंत्र और सांप्रदायिकता” को समर्पित होगा। पांचवें दिन बीबीपुर के जूनियर हाईस्‍कूल में जनसंघर्षों की वैचारिक एकजुटता पर सत्र होगा तो आखिरी दिन कबीर के नाम रहेगा जिसमें मगहर मठ के महन्‍त विचार दास साहेब का व्‍याख्‍यान होगा। हर दिन के सत्र के बाद फिल्‍में दिखायी जाएंगी।

जो फिल्‍में दिखायी जानी हैं, उनमें कुछेक अहम फिल्‍में हैं इंकलाब, संविधान, रोटी, लोहा गरम है, जमीर के बंदी, द मैन हू मूव्ड द माउनटेन, खड्डा, फ्रीडम, पानी पे लिखा, हार्वेस्ट आफ ग्रीफ, माई बाडी माई वेपन, गांव छोड़ब नाहीं, एक उड़ान, हथौड़े वाला, चरणदास चोर, इत्‍यादि। अवाम का सिनेमा अपने दसवें साल में भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन के योद्धाओं का संदेश जन-जन तक पहुंचाने के लिए देश के कोने-कोने में इस साल संवाद श्रृंखला भी आयोजित कर रहा है। इस बारे में ‘अवाम का सिनेमा’ के संस्‍थापक शाह आलम कहते हैं, ”हमें एक जरूरी इतिहासबोध से दूर रखा गया है। इसका हमें अफ़सोस भी है और मन में एक तरह आक्रोश भी पनप रहा है। साझा मुक्ति संग्राम की क्रांतिकारी चेतना का स्मरण सिर्फ अतीत को खंगालना भर नहीं है, बल्कि उस आंदोलन की रोशनी में अपने समय और समाज की विसंगतियो के साथ उन जरूरी सवालों से भी रूबरू होना है, जो आज वर्तमान में सबसे ज्यादा तीखे और प्रासंगिक होकर हमारे सामने खड़े हो रहे हैं|”

शाह का कहना है कि ”हमने सत्ता के जाने-बूझे विस्मरण को धक्का देने का सोचा है। जिस तरह क्रांतिनायकों को इतिहास के कूड़ेदान में धकेलने की साजिश की जा रही है, हमने इसी को बदलने की ठानी है। गांव से लेकर कस्बों तक कई जाने-अनजाने वीरों की शहादत को याद करना, दरअसल खुद के अस्तित्व को भी समझने की प्रक्रिया है। इसी में साझी विरासत और साझे प्रतिरोध की संस्कृति को भी जानना निहित है।”

गौरतलब है कि ‘प्रतिरोध की संस्कृति’ – ‘अवाम का सिनेमा’ का गठन 28 जनवरी 2006 को अयोध्या में हुआ था। चंबल का बीहड़ हो या राजस्थान का थार मरुस्थल या फिर करगिल ही;  अवाम का सिनेमा बेहद प्रभावशाली तरीके से लोगों के बीच प्रतिरोध की संस्कृति को पुरजोर तरीके से जिंदा रखने में अपनी भूमिका निभाता रहा। अवाम का सिनेमा राजनीति, समाज, आर्थिकी – सबकी सच्चाइयों को सामने लाने की कोशिश में लगातार लगा हुआ है। इसका सफल आयोजन बिना किसी एनजीओ, ट्रस्ट, कॉरपोरेट और सरकार की स्पांसरशिप के बगैर अब तक होता आया है।



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