ज्ञानेश्वर वात्स्यायन-
मन करे, तो मेरे इस पोस्ट को अगले विधान सभा चुनाव तक के लिए सेव कर लीजिए. पूरी समझदारी से कह रहा हूं, जैसे यह 1990 में ही तय हो गया था कि कोई भूमिहार-ब्राह्मण बिहार का मुख्य मंत्री नहीं बन सकता, वैसे ही 2025 के बिहार चुनाव के नतीजे ने यह भी स्थापित कर दिया कि अब कोई #यादव भी वोट से मुख्य मंत्री नहीं बन सकता. हां, 2025-2030 के जनादेश वाले इस कार्यकाल के बीच में बगैर जनता के वोट के कोई प्रयोग हो जाए, तो वह अलग बात होगी. फिर, उसके नेतृत्व को नए तरीके से देखना होगा.
अब बिहार का मुख्य मंत्री जनता के वोट से गैर यादव पिछड़ा, अति पिछड़ा या दलित ही बनेगा. इसमें भी अहंकारी नहीं संस्कारी की संभावनाएं अधिक होगी.
मेरी बात अब भी समझ में आपको न आई हो, तो ऐसे समझिए पहले जैसे भूमिहार-ब्राह्मण-राजपूत के खिलाफ तमाम दूसरे गोलबंद हो जाते थे, अब उससे अधिक कठोरता से #Yadav के खिलाफ अन्य सभी पिछड़े, अति पिछड़े और दलित समाज के लोग इकट्ठा हो जाते हैं.
इसके बाद भी नहीं समझे, तो पटना के बख्तियारपुर विधान सभा चुनाव का नतीजा समझिए. बख्तियारपुर में नीतीश कुमार भले पले-बढ़े हों, लेकिन था यह यादवों का गढ़. यादव के खिलाफ राजपूत जब लड़े, हारे. तब #BJP ने यादव बनाम यादव को लड़ाना शुरु किया, बीच में एक सफलता मिली थी, लेकिन आगे फिर फुस्स. कब्जा राजद का ही बना.
2025 में भी सभी बख्तियारपुर में यादव बनाम यादव ही देख रहे थे. पर, भोजपुर- शाहाबाद- मगध- पटना के सबसे कठिन दुर्ग को साधने की जिम्मेवारी भाजपा ने कोई 8 महीना पहले पार्टी के नेशनल सेक्रेट्री ऋतुराज सिन्हा को दी थी. इस इलाके की वजह से ही 2020 में तेजस्वी यादव मुख्य मंत्री की कुर्सी तक पहुंच गए थे, लेकिन मिथिला ने दूर कर दिया था.
जिम्मेवारी के बाद ऋतुराज सिन्हा ने प्रत्येक विधान सभा का माइक्रो मैनेजमेंट किया. NDA में सीट शेयरिंग में बख्तियारपुर की सीट LJPR को दी गई. उम्मीदवार बने अरुण कुमार साह, ऋतुराज सिन्हा के खास. एलान के वक़्त तो 1 घंटे पता ही न चला कि ये अरुण कौन हैं. यादवों के बख्तियारपुर में वैश्य – बनिया नहीं चलेगा, यह मान कर बख्तियारपुर में NDA की हार तय मानी गई. मैंने भी माना.
लेकिन, जब नतीजे आए, तो बख्तियारपुर में NDA के अरुण कुमार साह जीत गए, राजद के MLA अनिरुद्ध यादव ठीक-ठाक मतों से हार गए. यह जीत ऋतुराज सिन्हा की रणनीति, मोदी संग नीतीश कुमार के चेहरे और चिराग पासवान के संयुक्त समीकरण की थी. लेकिन, ये हुआ कैसे, इसे समझ लेंगे, तो मान लेंगे कि अब बिहार में कोई यादव मुख्य मंत्री नहीं बन सकता.
हुआ ऐसे कि बख्तियारपुर को जैसे ही मौका मिला, यादव के खिलाफ तमाम जातियां गोलबंद हो गई. यादव छोड़ सभी पिछड़े, अति पिछड़े और दलित और सवर्ण एक साथ आ गए. पूरा बिहार भी इसी ट्रेंड को आगे बढ़ा रहा है. अरुण साह की जाति ऐसी, जिससे कोई डर नहीं. मुझे लगता है, अब तो आप वह समझ ही गए होंगे, जो बताने के लिए हमने ये पोस्ट लिखा. चलते-चलते और बता दें, आगे के चुनावों में #RJD के यादव विधायकों की संख्या और घटेगी, जबकि NDA में यादव बढ़ सकते हैं. मतलब ये कि NDA के यादव कैंडिडेट तेजस्वी यादव के यादव उम्मीदवारों को और अधिक हराएंगे.
बहुत सोच-समझ के ये बात कह रहा हूं. प्रशांत किशोर का सूपड़ा साफ हुआ है, लेकिन प्रासंगिकता बहुत नहीं. अभी मुझे नहीं पता कि इस करारी हार के बाद वे बिहार में टिके रहेंगे या नहीं ? लेकिन टिके रह गए, तो सत्ता के सामने जनता के भरोसे से मजबूत विपक्ष बनने का अवसर है. विपक्ष केवल विधान सभा के भीतर ही नहीं होता.
तेजस्वी यादव बिहार का भरोसा नहीं जीत सकते. राजद को 2010 में ही बिहार ने खत्म कर दिया था, कसूरवार तो नीतीश कुमार हैं, जिन्होंने 2015 में फिर जिंदा कर दिया. अब यह भी संभव नहीं है.
ऐसे में, प्रशांत किशोर को बिहार की आवाज बनने का वक़्त है. हां, डगर कठिन है. प्रशांत को अपने स्वभाव में परिवर्तन लाना होगा. गुस्सा कम करना होगा. अधिक भविष्यवाणी नहीं करनी होगी. ध्यान रखना चाहिए, प्रशांत हारे जरुर हैं, लेकिन बिहार की बातें जिस तरीके से उन्होंने उठाई है, इसके लिए न उन्हें किसी ने गाली दी और न नफरत किया.
बिहार में प्रशांत को थोड़ा पोलिटिकल समझौतावादी भी होना होगा. नीतीश भी अकेले 1995 में कैसे हारे थे, याद है न. फिर जब BJP से मिले, तो लालू-राबड़ी की सत्ता को खत्म कर पाए. कांग्रेस अब अपने पैरों पर खड़े होने की कोशिश करेगी, इसके लिए अभी से योगा शुरु करेगी. तेजस्वी यादव जीत नहीं दिला सकते, अब यह प्रमाणित तथ्य है. राजेश राम और शकील अहमद खान को कैसे राजद वालों ने लक्ष्य निर्धारित कर हराया, यह तो बिलकुल ही छुपा नहीं है.
ऐसे में, कांग्रेस भी कठिन रास्ते पर अकेले चलने को बढ़ेगी. और फिर, प्रशांत किशोर को सभी दरवाजे कभी बंद नहीं रखने होंगे. आगे की राजनीति दलित-अतिपिछड़े की है, यह प्रशांत भी समझते हैं. अच्छी बात है कि वे बिहार सुधारने के लिए स्वयं ही मुख्य मंत्री बनने की बात की जिद नहीं करते हैं. अभी के लिए इतना ही.
मेरा और #LiveCities का बहिष्कार करने वाली पार्टी को बिहार की जनता ने निपटा दिया है. बहुत-बहुत धन्यवाद बिहार. मेरे अनुमान और जनता की नब्ज पढ़ने में की गई मेहनत का मजाक उड़ाने वाले भी औंधे मुंह गिरे हैं. इसमें कई मेरे अपने पेशे के दूसरे भी हैं, जो रोज कांटे की लड़ाई और महागठबंधन की जीत बता रहे थे.
आज सुबह जब घर से कार्यालय के लिए निकला था, तो मन सशंकित था, लेकिन विश्वास पूर्ण था अपने गणित पर. यह भी तय कर रखा था कि यदि अनुमान का अंतिम फलाफल 95 प्रतिशत से कम रहा, तो आगे पोलिटिकल रिपोर्टिंग और एनालिसिस छोड़ देंगे. पहले की तरह सिर्फ क्राइम रिपोर्टिंग करेंगे. लेकिन, आप सबों ने ऐसा नहीं होने दिया. आगे भी सच बताने की जिद है, बताते भी रहेंगे, चाहे जिसको अच्छा-बुरा लगे. अंत में, मेरे उन गुरुओं का वंदन, जिन्होंने सच पढ़ने का तरीका हमें बताया है.
BiharElection2025 के औपचारिक प्रारंभ से पहले ही मुझे RJD के ट्रोलर्स से मां-बहन-बेटी की जितनी गालियां दिलाई जाने लगी, खबर है कि तेजस्वी यादव पहले इसके लिए तैयार नहीं थे. लेकिन #सं , #सु और #श धारी लोगों ने इतना कान भरा कि सहमति मिल गई. इसमें #सं, जो दूसरे प्रदेश के हैं, #सु सोनपुर के हैं और #श का वास्ता नालंदा से है. अब इन सबों का हाल क्या हुआ है, मुझे कुछ बताना शेष नहीं बचा है. बिहार ने ही समझा दिया है.



