Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

बिहार

साम- दाम- दंड- भेद और बीजेपी : 200 पार का आंकड़ा अप्रत्याशित है, अमित शाह ख़ुद ही 160 पार की बात कर रहे थे!

अजीत अंजुम-

बिहार में चुनाव की तारीखों की घोषणा के दिन भी 21 लाख महिलाओं के खाते के दस – दस हज़ार ट्रांसफर हुए . उसके बाद भी लगातार होते रहे. यक़ीनन ये सब महिलाओं के एकमुश्त वोट को अपने पाले में लाने के लिए किया गया . ये वोट पाने का हथकंडा था .ये बहुत बड़ा फैक्टर भी साबित हुआ. मैंने एक बार नहीं कई बार अपने वीडियो में उल्लेख किया है . ‘SIR ‘ के पीछे का खेल , उनके मंसूबों और उनकी मिलीभगत पर मैंने दर्जनों बार बात की है .

FIR झेल चुका हूं . हाईकोर्ट में वकील को अपनी जेब से पचास हज़ार की फीस एडवांस देकर FIR रद्द करने की याचिका लगाई है . अभी फीस का कुछ हिस्सा देना बाकी है . चार्जशीट हुई तो मुकदमें के चक्कर में कई कोर्ट भी जाना पड़ेगा. बावजूद इसके मैं पीछे नहीं हटा. बेगूसराय में FIR के बाद भी लगातार रिपोर्टिंग करता रहा. साबित करता रहा कि ‘SIR’ में भयंकर गड़बड़ियां हैं और मंसूबे संदिग्ध हैं . ऐसे लोगों से मिला , जो ‘SIR’ में मुर्दा होकर भी जिंदा थे .

ग़लत तरीके से नाम कटने पर कई स्टोरी की . सुप्रीम कोर्ट के दखल और विपक्ष के आंदोलन की वजह से आधार को बारहवें दस्तावेज के तौर पर चुनाव आयोग को स्वीकार करना पड़ा. उसके बाद भी ‘SIR’ में काफी विसंगतियां हैं . कई सवाल हैं . बीजेपी हर तरह के हथकंडे का इस्तेमाल करती है . जमकर पैसे और संसाधन झोंकती है .मोदी और शाह की सत्ता के सामने पूरा सिस्टम लिए समर्पित है . चुनाव आयोग प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से उनके लिए हमेशा मददगार होता है .

बिहार में 200 पार का आंकड़ा बिल्कुल अप्रत्याशित है . वो भी तब , जब अमित शाह ख़ुद ही 160 पार की बात कर रहे थे . ये अचंभा कैसे हुआ ? इसे डिकोड करने की जरूरत है .अगर कुछ एक्सपोज करने लायक है तो एक्सपोज करने की भी जरूरत है लेकिन…

इन सब के अलावा भी कुछ बातें हैं , जिन्हें नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता. दिक्कत ये है कि कोई पक्ष सच सुनना नहीं चाहता. जिसे देखो वहीं सर्टिफिकेट बांट रहा है . बांटते रहो .


विजय सिंह ठकुराय-

आजकल देश में “लोकतंत्र का जोकतंत्र” नाम की फ़िल्म चल रही है, हर भारतवासी इस नाटकीय कथा को चुपचाप देखने के लिए विवश है।

इस फ़िल्म के पहले दृश्य में बिहार चुनाव से पूर्व SIR कर 75 लाख लोगों को टारगेट कर उनके वोट काट दिए जाते हैं। फ़िल्म आगे बढ़ती है, चुनाव संपन्न होता है, अभूतपूर्व रूप से 10% मतदान बढ़ जाता है। अब ये लहर चली तो क्यों चली – इसकी भूमिका पहले ही बना दी गयी थी। महिलाओं को दस हजार की चुनावी घूस दी गयी। तत्पश्चात चुनाव की संध्या में पूरे देश में आतंकी जामुन के फल की तरह बरसने लगते हैं। मोदी शक्तिमान के अवतार के रूप में स्थापित होते हैं, जनता इंटेलिजेंस फेलियर को सरकार की सफलता मान कर जान बचाने के लिए कृतज्ञता ज्ञापित करती है। आरोप नहीं लग रहा हूँ, बस ताज्जुब प्रकट कर रहा हूँ कि इनकी कुंडली में हर बार वह योग उसी समय घटित हो ही जाता है, जो इन्हें अगला चुनाव जिता सके।

अतिरिक्त मतदान की भूमिका सेट होते-होते इंटरवल से ठीक पूर्व चुनाव होते हैं, 80 लाख वोट बढ़ते हैं और सारे के सारे जा कर एनडीए को वोट कर आते हैं। एनडीए को भारी बहुमत मिलता है। ऐसे स्ट्राइक रेट के साथ, जिस पर स्वयं सत्ता के समर्थक को भरोसा न हो।

क्लाइमेक्स हैप्पी एंडिंग लेकर आता है। सारे उद्देश्य सफल हुए। अखंड “पलटूराम” जी के फिर से पलट कर पीएम की कुर्सी की टांग तोड़ने की सम्भावनाएँ रद्द हुईं। शेष कार्य पालतू मीडिया ने शुरू कर दिया है – विपक्ष नकारा है, राहुल गांधी गदहा है, वोटचोरी के आरोप में दम नहीं है, मोदी जनता के दिलों में है। उन्हें एक व्यक्ति की क्रेडिबिलिटी खत्म करनी थी, उसमें वे सफल हुए।

फ़िल्म के सीक्वल “बिहार फाइल्स” में आप देखेंगे कि बिहार में कैसे वोट चोरी हुई। दस हजार की योजना अथवा सरकार की जीत के तमाम अन्य कारण थोथे साबित होंगे। फर्जी आईडी पर थोक के भाव वोट डाले जाने और गलत तरीके से वोट काटे जाने के सबूत आपको फिर दिए जाएंगे। आप फर्जी एडिशन/डिलिशन पर सवाल पूछियेगा, डिजिटल वोटर लिस्ट माँगियेगा, वीडियो फुटेज माँगियेगा – EC आपको फिर माँ-बहनों की दुहाई देकर थेथरई बतिया देगा।

हां तो मितरों, चुनाव अप्रासंगिक हो चुके हैं, लोकतंत्र का अपहरण हो चुका है। देशवासी चुपचाप विवशता से “लोकतंत्र का जोकतंत्र” नामक इस रद्दी फ़िल्म को बर्दाश्त करने के लिए अभिशप्त हैं।

खैर फ़िल्म पसंद आये या न आये, इस फ़िल्म के डायरेक्टर हमारे “ज्ञानू जी” उर्फ़ ज्ञानेश कुमार जी साहेब की नज़रों में ज़िंदाबाद हो गए!

सत्ता पक्ष का हर समर्थक मन ही मन यह जानता है कि उनके देवता जिस प्रकार जीत रहे हैं, वह धांधली के बिना संभव नहीं। चुनाव आयोग और सरकार की खुली मिली-भगत दिखने के बावजूद भक्त मन ही मन हर्षित है। कहता है – मान लिया कि बेईमानी से ही जीतते हैं। उखाड़ लो, जो बस का हो।

ऐसा कहते समय भक्त भूल जाता है कि केंद्रीय चुनावों में आज भी भाजपा बमुश्किलन 35% मत पाती है, एनडीए को जोड़ लिया जाए तो लगभग 40 प्रतिशत। अर्थात, भाजपा की अपराजेयता के मूल में सबसे बड़ा कारण विपक्ष की फूट है।

वर्तमान चुनावों के खेल ने विपक्ष को स्पष्ट संदेश दे दिया है कि इन हालातों में चुनाव का कोई अर्थ नहीं है। जैसे-जैसे समय बीत रहा है, लोकतांत्रिक संस्थाओं पर सत्ता का शिकंजा कसता जा रहा है। आसन्न खतरे को भांप जिस दिन विपक्ष एकजुट हो गया, उस दिन कितनी भी वोटचोरी काम न आएगी। और जिस दिन ये पदच्युत हो गए, विपक्ष सत्ता में आया, उसके बाद सत्ता में बने रहने के लिए विपक्ष वह सब हथकंडे अपनाएगा, जो आज भाजपा अपना रही है। तब किस मुंह से विरोध कीजियेगा? राजनीति में त्याज्य नियमों को आप वैधानिक जामा पहना चुके हैं तो अगला खिलाड़ी भी उन्ही नियमों से खेलेगा। यही मेरे लिए एकमात्र चिंता का विषय है।

बहरहाल, आज आप मुझे लाखों गाली दे सकते हैं, अपने देवता की अनैतिकता का समर्थन न करने के लिये “देशद्रोही” का तमगा भी खुशी से दे सकते हैं। पर मैं जानता हूँ कि एक दिन आएगा, जब आपकी लगाई आग की तपिश आपको ही झुलसायेगी। सत्ता के बुलडोजर का रुख एक दिन आपकी ओर होगा। तब सांस लेने में तकलीफ होगी, हृदय भय से व्याकुल। तब आपको एहसास होगा कि आपके सर पर ऐसे सर्वशक्तिमान बैठे हैं, जिन्हें अपदस्थ करने का लोकतांत्रिक अधिकार गंवा देने की अनुभूति क्या होती है।

बहरहाल, ये दौर हो या आने वाले दौर, मैं तो आपसे बस इतना ही वादा कर सकता हूँ कि सामने मोदी हों, या राहुल, या कोई और – बात अगर अन्याय और गलत की होगी तो आपके कंधे पर रखा गया पहला हाथ झकझकिया का ही होगा।

सत्ता में निष्ठा का निवेश कर पराई सफलता में गर्वबोध हासिल करना निर्बलों, असहायों और कमजोरों की निशानी है। सरकार ये हो, अथवा बदल जाए – हम आपको हमेशा विपक्ष में ही मिलेंगे।


सुशोभित-

2024 के लोकसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी की लोकप्रियता में भारी गिरावट दर्ज की गई थी। उसने 441 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन 240 ही जीत पाई। यानी वह 201 सीटों पर चुनाव हारी थी! ये छोटी-मोटी हार नहीं थी।

भारतीय जनता पार्टी बहुमत से 32 सीट पीछे छूट गई और नीतीश-नायडू की बैसाखी पर निर्भर हुई। यूपी और महाराष्ट्र में उसे बड़ा झटका लगा। यूपी में वो 75 में से 33, महाराष्ट्र में 28 में से 9 ही सीटें जीत पाई। वह अयोध्या में भी हार गई, जहाँ पर उसने चुनाव से ठीक पूर्व तुरत-फुरत में राम मंदिर का लोकार्पण करवाया था, ताकि उसका चुनावी फ़ायदा ले सके। शंकराचार्यों के बजाय प्रधानमंत्री स्वयं प्राण-प्रतिष्ठा करने अवतरित हुए।

ये संयोग नहीं है कि एक दशक में भारतीय जनता पार्टी का सबसे कमज़ोर प्रदर्शन और कांग्रेस पार्टी का सबसे मज़बूत प्रदर्शन 2024 के इसी चुनाव में दर्ज हुआ था। एक ने ज़मीन गँवाई, दूसरी ने बनाई।

लेकिन उसके बाद क्या हुआ कि भारतीय जनता पार्टी ने डेढ़ वर्ष के अंतराल में हरियाणा, महाराष्ट्र, दिल्ली और बिहार के विधानसभा चुनावों में बड़ी जीतें दर्ज कर लीं? इन डेढ़ वर्षों में इस पार्टी ने ऐसा कुछ नहीं किया, जिससे मतदाताओं का मानस बदलने का संकेत मिलता हो। बेरोज़गारी वैसी ही है। विदेश नीति में अमेरिका के आकार का गड्ढा हो गया है। विकास दर कुलाँचे नहीं भर रही है। क़ानून-व्यवस्था चाक-चौबंद नहीं हुई है। सामाजिक-व्यवस्था में सौमनस्य नहीं आ गया है। आतंकी हमले तो उलटे बढ़े हैं। किसानों की आत्महत्याओं में कोई कमी नहीं आई है। युवा पीढ़ी फ्रस्ट्रेट है, ब्रेन-रॉट से जूझ रही है।

आप कह सकते हैं कि मतदाता राज्य के चुनावों में अलग तरह से वोट देते हैं और केंद्र के चुनाव में अलग तरह से- लेकिन महज़ डेढ़ वर्ष के अंतराल में एक अलोकप्रिय हो रही पार्टी को लगातार इतने बड़े बहुमत मिलना और निरंतर लय में आ रही एक पार्टी और उसके नेता का करारी हार का सामना करना गले नहीं उतरता है।

क्या कारण था कि 2024 में देश की जनता ने भारतीय जनता पार्टी को दण्डित किया और क्या वजह है कि 2025 का नवम्बर आते-आते यही जनता इस पार्टी पर इतनी मेहरबान हो गई?

अधिनायकवादी ताक़तों की एक ख़ूबी होती है। जब तक लोकतांत्रिक प्रणाली काम देती है, वो उसका भरपूर दोहन करती हैं। जैसे ही लोकतांत्रिक प्रणाली डगमगाती है, वो दूसरे तौर-तरीक़े आज़माने से नहीं हिचकिचातीं। भारतीय जनता पार्टी ने 2014 और 2019 में लोकतांत्रिक बहुमत का सुख भोगा। ऐसे में ये सम्भव ही नहीं था कि 2024 में उसके हाथ से वह बहुमत खिसकते ही वह अपनी कार्यप्रणाली, रीति-नीति, चाल-चरित्र में क्रांतिकारी बदलाव नहीं लाती। सत्ता में बने रहने का जैसा डेस्पेरेशन इस पार्टी में है, वैसा किसी और में नहीं। हर क़ीमत पर सत्ता- ये उसका मूल-मंत्र है।

फिर बिहार कोई साधारण राज्य नहीं है। इस राज्य के मुख्यमंत्री के समर्थन से ही केंद्र में अल्पमत की सरकार टिकी है। भारतीय जनता पार्टी बिहार को अपने हाथ से जाने नहीं दे सकती थी। और जब भारतीय जनता पार्टी यह तय करती है कि चाहे जो हो जाए, चाहे जो करना पड़े, हम इस राज्य को हाथ से जाने नहीं देंगे तो वही होता है, जो हुआ है।

यह कोई दावा नहीं है लेकिन अपने मन-बहलाव के लिए ही पलभर को कल्पना करें कि हाकिम ने इशारा किया हो और मशीनरी सक्रिय हो गई हो। न केवल सक्रिय, कुछ ज़्यादा ही सक्रिय हो गई हो! और तब, हाकिम ने उसकी स्वामीभक्ति से रीझने के बावजूद, तनिक झेंपभरी मुस्कान से उससे कहा हो- “कुछ करने को कहा था, इतना कर देने को थोड़े ना कहा था!”

Pahad Ki Dada: Hill Mail Uttarakhand
CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
1 Comment

1 Comment

  1. Avnish

    November 16, 2025 at 3:56 pm

    ANJUMAN AND PRASUNA, dono ke ….. me aag lagi hui hai. Jo cong ke 99 ko safal aur 10 sal ke shashan ke bad BJP ke aaye 242 ko fail bata raha ho…sarm aati hai aisi journalism par. AAJ Kaisi andhbhakti congress ki kar rahe ye chaplush patrakar. Ravish ka to bolati band ho gayi hai.. in chaplusho ko Bihar ke womens ka jonoon, Bihar ke naujawanon ka bharosha…kutch nahi dikh raha. Ye andhbhakt apana TRP, Apana Relation, Apna wafadari, apna followers and apana roji roti dekhate hai sirf. Nothing to see and not ready to see. Anjuman ke knowledge par sharm aati hai..jisko ground ka a b c d PATA NAHI WO BHI PATRAKAR HAI aur ek youtuber hai..vah…Inko mere pas bejo…mai inko BIHAR ghuma kar lekar aata hu…garib bastiyon se bhi.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन