शीतल पी सिंह-
सुरजीत भल्ला कोई सामान्य राजनीतिक टिप्पणीकार नहीं हैं। वे भारत के जाने-माने अर्थशास्त्री रहे हैं, भारत सरकार के आर्थिक सलाहकार रहे हैं और IMF में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। लंबे समय तक उन्हें आर्थिक उदारीकरण तथा निवेश समर्थक सोच का समर्थक माना जाता रहा है। मोदीजी और बीजेपी के भी प्रशंसक होने की उनकी ख्याति है।
यही वजह है कि जब वही व्यक्ति यह लिखता है कि “BJP चुनाव जीत रही है लेकिन अर्थव्यवस्था हार रही है”, तो उस टिप्पणी को गंभीरता से सुनना चाहिए।
भल्ला अपने लेख में कहते हैं कि भारत आज भी तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था कहलाता है, लेकिन तस्वीर उतनी चमकदार नहीं है जितनी प्रचार में दिखाई जाती है। प्रति व्यक्ति आय की रफ्तार कमजोर है, रुपया लगातार दबाव में है, निजी निवेश उम्मीद के मुताबिक बढ़ नहीं रहा और विदेशी निवेशकों का भरोसा डगमगा गया है।
उनका सबसे बड़ा आरोप यह है कि सरकार गहरे आर्थिक सुधारों की जगह “बैंड-एड” यानी अस्थायी उपायों पर निर्भर हो गई है। निवेश का माहौल आसान और भरोसेमंद बनाने के बजाय नीतिगत अनिश्चितता बढ़ी है। विदेशी निवेशकों के लिए कानूनी और नीतिगत बाधाएँ बढ़ाई गईं, जिससे भारत की विश्वसनीयता प्रभावित हुई।
भल्ला का निष्कर्ष साफ है — चुनावी जीतें आर्थिक सफलता की गारंटी नहीं होतीं। लोकतंत्र में राजनीतिक लोकप्रियता लंबे समय तक तभी टिकती है जब उसके पीछे मजबूत अर्थव्यवस्था, स्थिर नीतियाँ, रोजगार और निवेश का भरोसा हो। केवल प्रचार, इवेंट और चुनावी मशीनरी किसी देश को स्थायी आर्थिक शक्ति नहीं बना सकते। दुनिया भारत को देख रही है, लेकिन अब सवाल यह है कि क्या भारत अपनी राजनीतिक ताकत को आर्थिक मजबूती में बदल पाएगा?
तब सवाल उठता है कि अर्थव्यवस्था के मामले में इतना ख़राब प्रदर्शन करने के बावजूद चुनाव कैसे जीत जाते हैं? जवाब ज्ञानेश कुमार से पूछिएगा। 12 साल की कहानी उस फ्रॉड की है जिसे चुनाव की जीत के नाम पर ढंका जाता रहा है। धर्म की राजनीति की आँधी पैदा कर उस फ्रॉड को छिपाने की कहानी है। अब उनसे भी नहीं हो पा रहा है जो 12 साल से इस कहानी में चार चाँद लगा रहे थे। इतने बड़े पैमाने पर इस देश के साथ कभी धोखा नहीं हुआ। जनता के पास अब रील में डांस करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है।
-रवीश कुमार
अमिताभ श्रीवास्तव-
देश के वर्तमान आर्थिक हालात और नरेंद्र मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों पर आर्थिक विशेषज्ञ सुरजीत भल्ला का यह आलोचनात्मक लेख पढ़ना चाहिए। सुरजीत भल्ला कोई सरकार विरोधी विशेषज्ञ नहीं हैं इसलिए यह विश्लेषण और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।अंधभक्त किस्म के लोगों, जिनमें पत्रकारों की भी अच्छी-ख़ासी तादाद है, को छोड़कर बीजेपी समर्थक समझदार लोग भी इसमें ज़ाहिर की गई चिंताओं को समझेंगे और उनसे सहमत होंगे।

अगर लेख के शीर्षक का हिंदी में अनुवाद करें तो सुरजीत भल्ला कह रहे हैं कि बीजेपी चुनाव जीत रही है, लेकिन अर्थव्यवस्था हार रही है।
यह एक विरोधाभास लगता है लेकिन कड़वा सच है। बुनियादी तौर पर इस लेख में सुरजीत भल्ला हाल के विधानसभा चुनाव नतीजों, खासकर पश्चिम बंगाल में बीजेपी की ऐतिहासिक जीत के बाद के माहौल में , जब भारत का रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले सेंचुरी लगाने के करीब पहुंच चुका है, आर्थिक हालात का विश्लेषण करते हुए कह रहे हैं कि सरकार चुनावी राजनीति में तो बहुत मजबूत हो गई है, लेकिन अर्थव्यवस्था उतनी मजबूत नहीं बन पा रही।
आर्थिक शब्दावली से अनजान लोगों के लिए इस लेख का सारांश यह है कि राजनीतिक स्थिरता अपने आप आर्थिक समृद्धि की गारंटी नहीं होती; उसके लिए भरोसेमंद नीतियाँ, निवेश और रोजगार आधारित विकास जरूरी है।
सुरजीत भल्ला के मुताबिक, पश्चिम बंगाल में बीजेपी की ऐतिहासिक जीत उसके राजनीतिक प्रदर्शन के शिखर का एक क्षण है। यह 2029 में भी नरेंद्र मोदी के लिए एक बड़ी उपलब्धि और समर्थन का संकेत बन सकता है। पश्चिम बंगाल में बीजेपी जिस चुनावी ऊँचाई तक पहुँच गई है, उससे आगे जाना शायद मुश्किल हो। लेकिन इस प्रचंड जीत के साथ ही बीजेपी की आर्थिक नीतियों ने देश की अर्थव्यवस्था को ऐसे निचले स्तर पर पहुँचा दिया है जहाँ गिरावट की कोई गारंटी नहीं कि अब या तब रुक जाएगी। सवाल यह है कि क्या ये दोनों बातें-राजनीतिक सफलता और आर्थिक कमजोरी-आपस में जुड़ी हुई हैं या यह महज एक इत्तेफाक है?
मोदी सरकार, उसके सहयोगी दल, पार्टी प्रवक्ता और हमारे मीडिया का एक बड़ा हिस्सा दिन-रात भारत को दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था बताते हैं लेकिन असली तस्वीर कुछ और है।
भारत की जीडीपी वृद्धि दर लगभग 6% है, जो पिछले 35 सालों के औसत के आसपास है। लेकिन समस्या यह है कि भारत सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था होने के बावजूद प्रति व्यक्ति आय वृद्धि में काफी पीछे है। 2014 के बाद बीजेपी शासन के दौरान भारत की प्रति व्यक्ति जीडीपी वृद्धि की रैंकिंग दुनिया में 9वीं रही, जबकि डॉलर के हिसाब से प्रति व्यक्ति आय वृद्धि में भारत 16वें स्थान पर रहा।
इसके विपरीत, बांग्लादेश प्रति व्यक्ति आय वृद्धि में पहले स्थान पर रहा, जहाँ औसत वृद्धि दर 8.3% रही। इथियोपिया दूसरे स्थान पर रहा। भारत 4.7% की दर के साथ 16वें स्थान पर रहा।
चुनाव जीतना और अर्थव्यवस्था मजबूत होना अलग बातें हैं।
कोई सरकार लगातार चुनाव जीत सकती है क्योंकि
जनता की निगाह में उसका नेतृत्व लोकप्रिय है और उसके मुकाबले में विपक्ष कमजोर है। इसके अलावा , बीजेपी को कट्टर हिंदुत्व की सांप्रदायिक राजनीति, राष्ट्रवाद और पहचान की राजनीति का फायदा मिल रहा है। इसके अलावा पैसों से या अन्य तरीकों से वोटर को लाभ पहुंचाने वाली कल्याणकारी योजनाएँ भी बीजेपी की केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को फायदा दे रही हैं।
लेकिन अर्थव्यवस्था मजबूत होने के लिए रोजगार, प्रति व्यक्ति आय में बढ़ोतरी, मजबूत रुपया, बढ़ता विदेशी निवेश, स्थिर आर्थिक नीतियां ज़रूरी हैं। यहां सरकार का प्रदर्शन बहुत खराब है। विपक्ष अगर इस पर आवाज़ उठाता है तो मीडिया में उसका मखौल उड़ाया जाता है। लेकिन हालात अब सबके सामने हैं।
भारत की कुल जीडीपी बढ़ रही है, लेकिन प्रति व्यक्ति आय उतनी तेजी से नहीं बढ़ रही। यानी देश आंकड़ों में तो अमीर दिख रहा है, लेकिन ज़मीनी स्तर पर हर नागरिक उतना अमीर नहीं हो रहा।
विदेशी निवेश (FDI) महत्वपूर्ण है क्योंकि जब विदेशी कंपनियाँ भारत में निवेश करेंगी तो यहां रोज़गार के मौक़े बढ़ेंगे। यहां भी हालत बहुत खराब है। विदेशी निवेशक सरकार की नीतियों से बहुत आश्वस्त नहीं हैं और लगातार निवेश में कमी दिख रही है। आज निवेशकों को लगता है कि भारत में व्यापारिक माहौल अनिश्चित है। घरेलू कंपनियाँ भी सरकारी नीतियों को लेकर आश्वस्त नहीं हैं।
सुरजीत भल्ला का आरोप है कि भारत ने 2015 के बाद ऐसा माहौल बनाया जिससे विदेशी निवेशक असहज हुए।
अगर विदेशी निवेश कम आए और डॉलर की मांग बढ़े, तो रुपया कमजोर होता है। पिछले एक साल में भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले लगभग 12% गिरा और एशिया की सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली मुद्राओं में शामिल रहा। रुपये के कमजोर होने से आयात महँगा होता है, पेट्रोल-डीजल महँगा होता है,महँगाई बढ़ सकती है। यह हम अपनी आंखों के आगे घटित होते देख रहे हैं।
सरकार अर्थव्यवस्था का ऑपरेशन करने के बजाय फौरी तौर पर मामूली मरहम पट्टी (यानी बैंड- एड ) करके खुश है और उसका प्रचार तंत्र इसे उसकी एक बड़ी उपलब्धि की तरह दिखाता है
सुरजीत भल्ला के इस लेख में चेतावनी है कि अगर सरकार निवेश माहौल बेहतर नहीं बनाती, नीतिगत भरोसा वापस नहीं लाती और बड़े आर्थिक सुधार नहीं करती, तो राजनीतिक प्रभुत्व भी कमजोर पड़ सकता है। चुनावी जीत सरकार को स्थिरता और ताकत तो दे सकती है, लेकिन देश में समृद्धि केवल अच्छी आर्थिक नीतियाँ ही दे सकती हैं।
अंबरीश कुमार-
“भाजपा चुनाव जीत रही है लेकिन अर्थव्यवस्था हार रही है”
सुरजीत भल्ला का इंडियन एक्सप्रेस में लेख का हिंदी
यह लेख द इंडियन एक्सप्रेस में 20 मई 2026 को प्रकाशित हुआ था। इसके लेखक Surjit Bhalla हैं। लेख का मुख्य तर्क यह है कि भारतीय जनता पार्टी लगातार चुनावी सफलताएँ प्राप्त कर रही है, किंतु आर्थिक मोर्चे पर उसकी स्थिति कमजोर होती जा रही है।
लेख का मुख्य तर्क
लेखक का कहना है कि भाजपा की चुनावी रणनीति, संगठनात्मक शक्ति और राजनीतिक संदेश अत्यंत प्रभावशाली बने हुए हैं। इसी कारण वह लगातार विभिन्न राज्यों में चुनाव जीत रही है और अपने सामाजिक तथा भौगोलिक विस्तार को बढ़ा रही है।
किन्तु दूसरी ओर देश की अर्थव्यवस्था अनेक गंभीर समस्याओं से जूझ रही है, जैसे—
- आर्थिक विकास की मंद गति,
- बेरोज़गारी में वृद्धि,
- महँगाई का बढ़ना,
- पेट्रोल और डीज़ल की कीमतों में वृद्धि,
- उपभोक्ता मांग में कमी, तथा आम जनता में आजीविका को लेकर बढ़ती असुरक्षा।
लेखक का तर्क है कि चुनावी विजय कुछ समय के लिए आर्थिक कमजोरियों को छिपा सकती है, परंतु लंबे समय तक केवल राजनीतिक सफलता के आधार पर जनता की आर्थिक कठिनाइयों की अनदेखी नहीं की जा सकती।
पहचान की राजनीति बनाम आर्थिक प्रदर्शन
लेख में यह महत्वपूर्ण प्रश्न उठाया गया है कि क्या आज भारत में मतदाता आर्थिक प्रदर्शन की अपेक्षा पहचान आधारित राजनीति, राष्ट्रवाद, धार्मिक ध्रुवीकरण और कल्याणकारी योजनाओं से अधिक प्रभावित हो रहे हैं।
लेखक संकेत देते हैं कि भाजपा की राजनीतिक सफलता का एक कारण यह भी है कि उसने चुनावी विमर्श को केवल आर्थिक मुद्दों तक सीमित नहीं रहने दिया, बल्कि सांस्कृतिक और वैचारिक मुद्दों को भी प्रमुखता दी।
व्यापक राजनीतिक और आर्थिक संदर्भ
यह लेख ऐसे समय में प्रकाशित हुआ जब भाजपा ने हाल के विधानसभा चुनावों में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की थी, विशेषकर पश्चिम बंगाल में। दूसरी ओर देश में महँगाई, बेरोज़गारी और वित्तीय दबाव को लेकर चिंताएँ बढ़ रही थीं।
अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों, विशेषकर वैश्विक तेल संकट, के कारण ईंधन की कीमतों में वृद्धि हुई, जिससे आम जनता का घरेलू बजट प्रभावित हुआ। विपक्षी दलों ने भी सरकार की आर्थिक नीतियों की आलोचना तेज कर दी थी।
निष्कर्ष
लेख अंततः समकालीन भारतीय राजनीति के एक महत्वपूर्ण विरोधाभास को रेखांकित करता है—
एक राजनीतिक दल चुनावी रूप से अत्यंत सफल हो सकता है, जबकि उसी समय आर्थिक क्षेत्र में गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा हो।
लेखक के अनुसार, यदि आर्थिक संकट गहराता है और रोजगार तथा आय की समस्याएँ बनी रहती हैं, तो भविष्य में यह राजनीतिक लोकप्रियता के लिए भी चुनौती बन सकता है।


