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आज के अखबार : छात्रों के प्रदर्शन पर कार्रवाई के लिए हसीना को मौत की सजा मिली, भारत में शरण जारी

संजय कुमार सिंह

बांग्लादेश में जो सब हुआ उसके बाद शेख हसीना को दिल्ली आना पड़ा, यहां उन्हें शरण मिली और अभी तक वे यहीं रह रही हैं। आज की खबरों से पता चला कि इसके लिए शेख हसीना के साथ (बांग्लादेश के) पूर्व गृहमंत्री असदुज्जमां खान को भी मृत्युदंड मिला है और वे भी यहीं रह रहे थे। खबरों के अनुसार शेख हसीना ने कहा है कि उनके खिलाफ यह फैसला गलत, पक्षपाती और राजनीति से प्रेरित है। यही नहीं, यह भी कहा है कि फैसला ऐसे न्यायाधीकरण ने दिया है जिसे गैर निर्वाचित सरकार चला रही है। यह दिलचस्प है कि बांग्लादेश में उनके खिलाफ फैसला गैर निर्वाचित सरकार द्वारा चलाये जा रहे न्यायाधिकरण ने दिया और यहां उन्हें जिस सरकार ने संरक्षण दे रखा है उसपर चुनाव चोरी या वोट चोरी से सत्ता में होने का आरोप है। वे अपने काम की बात कर रही हैं यह तो ठीक है लेकिन हमारा मीडिया? हमारी सरकार ने इन दो (पता नहीं इतने ही या कुछ और) बांग्लादेशी नेताओं को तो शरण दे ही रखा है, बांग्लादेश में हिन्दुओं के उत्पीड़न के लिए चिन्ता भी जताती रही है। बांग्लादेश ने जब कहा है कि भारत प्रत्यर्पण के लिए मजबूर है तो भारत ने कहा है कि वह सभी हितधारकों के साथ रचनात्मक बातचीत करेगा। अमर उजाला की लीड का शीर्षक है, हसीना को सजा-ए-मौत। बिल्कुल यही शीर्षक नवोदय टाइम्स में है। देशबन्धु की लीड का शीर्षक है, सऊदी अरब में सड़क हादसा, 45 भारतीयों की मौत। बांग्लादेश की खबर इसके नीचे है और शीर्षक है, शेख हसीना को सुनाई गई मौत की सजा। अपराध न्यायाधिकरण ने मानवता के खिलाफ अपराध मामले में दोषी ठहराया। मुझे लगता है कि भारत में पाठकों को बताया जाना चाहिए और अगर किसी को लगता है कि पहले बताया जा चुका है तो इस सजा के आलोक में यह याद दिलाया जाना चाहिए कि इस दोषी को भारत ने शरण दे रखा है।

टाइम्स ऑफ इंडिया का शीर्षक है, हसीना के लिए सजा ए मौत, ढाका उन्हें वापस चाहता है। हिन्दुस्तान टाइम्स के शीर्षक के अनुसार, बांग्लादेश ट्रिब्यूनल ने हसीना को मौत की सजा सुनाई। इंडियन एक्सप्रेस में ढाका डेटलाइन से छपी खबर पर रुमा पॉल और कृष्णा एन दास की बाईलाइन है और इसमें लिखा है, अगस्त 2024 में जब उनकी सरकार के खिलाफ बगावत चरम पर थी तब हसीना भारत भाग गई थीं। अखबार में इस खबर का इंट्रो है, ढाका ने दिल्ली से उनके प्रत्यर्पण की मांग की। विदेश मंत्रालय ने कहा, हम रचनात्मक तौर पर जुड़ेंगे। द हिन्दू में इस खबर का शीर्षक है, हसीना व सहायक को 2024 में छात्रों के प्रदर्शन पर कार्रवाई के लिए मौत की सजा। दि एशियन एज में भी यह खबर लीड है और हसीना को मौत की सजा ही शीर्षक है। फ्लैग शीर्षक में कई बुलेट प्वाइंट हैं। इनमें एक यह भी कि यह फैसला फरवरी में होने वाले चुनावों से पहले आया है। दूसरा बुलेट है, भारत विवाद से बचता है। द टेलीग्राफ में भी यह खबर लीड है। खबर का इंट्रो है, ढाका ने प्रत्यर्पण की मांग की। आज इस खबर के चक्कर में बिहार में मुख्यमंत्री का मामला पीछे चला गया। वैसे तो नीतिश कुमार के नाम और शपथग्रहण की तारीख की घोषणा आज है लेकिन नीतिश कुमार को शिन्दे बनाने की कोशिश करते हुए भाजपा को नीतिश को ही फडणवीस मानना पड़ा। यह असाधारण मजबूरी है। भारी जीत को बहुत हल्का कर देती है। 

यह सब तो हुई खबरों की बात और मैंने कल यहां लिखा था, सबसे बड़ी खबर यही है कि एक्सप्रेस समूह के संस्थापक के नाम पर आयोजित इस व्याख्यान में ऐसे वक्ताओं को आमंत्रित किया गया है जिन्होंने बदलाव को आकार दिया है और समकालीन चुनौतियों तथा मुद्दों पर आलोचनात्मक चिंतन को प्रेरित किया है। ऐसे में यह दिलचस्प है कि नरेन्द्र मोदी को इस विषय पर बोलने के लिए आमंत्रित किया गया है। नरेन्द्र मोदी जो बोलेंगे, जब बोलेंगे पर अभी एक्सप्रेस समूह के अध्यक्ष विवेक गोयनका ने कहा है, “यह व्याख्यान कोई समारोह नहीं, बल्कि सत्य-कथन, जवाबदेही और विचारों की शक्ति के मूल्यों के प्रति कटिबद्धता है।” अब नरेन्द्र मोदी ने जो बोला उस पर आने से पहले बता दूं कि 11 साल से ज्यादा से भारत जैसे लोकतांत्रिक देश के निर्वाचित प्रधानमंत्री के पद पर जमे नरेन्द्र मोदी ने एक भी प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं की, आलोचनात्मक पत्रकारिता के प्रति न सिर्फ खुद, अपने समर्थकों को भी अपनी उपेक्षा बार-बार स्पष्ट करने की छूट दी है। उन्हें इस विषय पर बोलने के लिए बुलाया ही गया था तो कुछ बोलना ही है। प्रधानमंत्री अच्छा बोलें तो कोई बात ही नहीं है, खराब भी बोलें तो महत्वपूर्ण हो ही जाएगा। नवोदय टाइम्स के अनुसार उन्होंने कहा, अच्छी नीयत वाले दलों पर भरोसा करते हैं लोग। यह भी कि सरकारों का प्राथमिक ध्यान विकास पर होना चाहिए। लेकिन सवाल है कि 80 करोड़ की आबादी को मुफ्त राशन पर जीने के लिए मजबूर करके बाकी के लिए टोल वाली सड़कें और फ्लाईओवर बनाना ही विकास है? कर्ज लेकर टोल रोड बनाने या गैर जरूरी हवाई अड्डों का उद्घाटन करके उनके बंद हो जाने को कौन सा विकास कहेंगे। जाहिर है, यह योजनाबद्ध विकास नहीं है और प्रधानमंभी की सोच के अनुकूल है इसलिए मन की बात की तरह कह दिया गया क्योंकि मौका था। इसलिए आज मैं अनुवाद करके इसकी रिपोर्ट करने के पक्ष में नहीं था लेकिन नवोदय टाइम्स ने छापा है तो पेश कर दे रहा हूं।

खबर इस प्रकार है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को कहा कि बिहार चुनाव के नतीजों ने यह सबक सिखाया है कि सरकार से लोगों की आकांक्षाएं बहुत अधिक हैं और वे अच्छी नीयत वाले राजनीतिक दलों पर भरोसा करते हैं। मोदी ने छठा रामनाथ गोयनका व्याख्यान देते हुए कहा कि चाहे केंद्र सरकार हो या क्षेत्रीय दलों के नेतृत्व वाली राज्य सरकारें, उनका प्राथमिक ध्यान विकास पर होना चाहिए। मोदी ने कहा, ‘बिहार चुनाव के नतीजों ने एक बार फिर भारत के लोगों की ऊंची आकांक्षाओं और महत्वाकांक्षाओं को लेकर एक सबक सिखाया है। भारत के लोग आज उन राजनीतिक दलों पर भरोसा करते हैं जिनकी नीयत अच्छी है और जो लोगों की आकांक्षाओं को पूरा करते हैं एवं विकास को प्राथमिकता देता है। उन्होंने कहा, “मैं राज्य सरकारों को निवेश आकर्षित करके और विकास को बढ़ावा देने के लिए स्वस्थ प्रतिस्पर्धा की भावना को दृढ़तापूर्वक प्रोत्साहित करता हूं। व्यापार को आसान बनाने के लिए प्रतियोगिताओं का आयोजन इस दिशा में एक बड़ा कदम हो सकता है।” मोदी ने कहा कि भाजपा चुनाव इसलिए जीतती है क्योंकि लोगों के विकास और कल्याण के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि व्यक्ति को लोगों के कल्याण के लिये काम करना चाहिए, न कि चुनाव को ध्यान में रखकर। मोदी ने कहा कि दुनिया भारत के विकास मॉडल को “उम्मीद के मॉडल” के रूप में देख रही है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। चैट जीपीटी का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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