शिकागो का महानायक

भाष्कर गुहा नियोगी

शिकागो धर्म सभा के 126 वर्ष… अनाहार-अभाव से लड़ता रहा शिकागो का नायक…

वाराणसी। मंजिल तक पहुंचने की परीक्षा रास्ते की मुश्किलें लेती है। शिकागो धर्म सभा के नायक स्वामी विवेकानंद को भी यह परीक्षा देनी पड़ी। खुद उनके अनुभव बताते हैं कि धर्म सभा तक पहुंचने की राह उनके लिए कांटों भरे डगर से कम न थी। उनके लिखे पत्र की पंक्तियां उस दौर में हालात से लगातार दो-चार हो रहे उनके संघर्षों का बयान है-

“यहां के बहुतेरे लोग मुझे ठग समझते रहे है। यहां पर सभी लोग मेरे विपक्ष में है। एक तो मिशनरी के लोग ही मेरे पीछे पड़े हुए हैं साथ ही यहां के हिन्दू भी इर्ष्या के कारण उनका साथ दे रहे है-ऐसी दशा में उनको जवाब देने के लिए मेरे पास कुछ नहीं है।”

28 जून 1894 को शिकागो से यह पत्र विवेकानंद ने मद्रास में रह रहे अपने एक शिष्य को लिखा। पत्र का एक-एक शब्द बताता है कि युवा संन्यासी के लिए धर्म सभा की राह आसान न थी। आज से 126 वर्ष पहले मद्रास से शिकागो के लिए चले विवेकानंद को अभाव, अनाहार और अपमान से भी लड़ना पड़ा था।

सभा के बाद की ख्याति और जय-जयकार से पहले सभा तक उनके पहुंचने की राह अग्निपथ से कम नहीं थी। जिस धर्म सभा के बाद नायक बन उभरे जिस विवेकानंद को अमेरिकी मीडिया ने साईक्लानिक हिंदू की संज्ञा दी उसी विवेकानंद ने धर्म सभा के चंद रोज पहले अमेरिका से मद्रास में अपनी शिष्या आलसिंगा पेरूमल को तार के जरिए संदेश भेजकर कहा- “सारे पैसे खर्च हो गए है, कम से कम स्वदेश लौट आने के लिए रुपये भेजो”।

अमेरिका प्रवास के दौरान अर्थ संकट से उन्हें दो-चार होना पड़ रहा था। उन्हीं के सहयोगी रहे अमेरिकी साधक कृपानंद ने न्यूयॉर्क से मिसेज उली बुल को चुपके-चुपके खबर दी कि कमरे का किराया, विज्ञापन छापने का सारा खर्च स्वामी जी खुद वहन कर रहे हैं। ये सारे खर्च चलाते हुए, अक्सर वो बिन खाए रह जाते हैं। लेकिन वे दैत्य की तरह मेहनत करते हैं।

भूख किसे कहते हैं, वो जानते थे, इसलिए दुनिया भर के भूखे लोगों की पीड़ा को खुद में महसूस करते हुए सैकड़ों तरह की बीमारियों से लड़ते हुए जीवन के अंतिम दिनों में उन्होंने अपने प्रिय शिष्य शरतचंद्र को एक भोजनालय खोलने की हिदायत देते हुए कहा “जब रुपए आए तब एक बड़ा भोजनालय खोला जाएगा। भोजनालय में सिर्फ यही शोर गूंजता रहेगा-दीयता; नीयता; भज्यता;। …देश में ऐसा भोजनालय खुलते हुए, अपनी आंखों से देख लूं, तो मेरे प्राण चैन पा जाएं।”

शिकागो से 2 नवंबर 1893 को आलसिंगा को लिखे पत्र में स्वामी जी हावर्ड यूनिवर्सिटी के भाषा के प्रोफेसर डॉ.राइट् के बारे में जिक्र करते हुए लिखते हैं- उन्होंने जोर दिया कि मैं सवधर्म सम्मेलन में अवश्य जाऊं, क्योंकि उनके विचार से इससे मेरा परिचय सारे अमरीका से हो जायगा। प्रोफेसर साहब ने ही मेरे लिए सब बन्दोबस्त किया और मैं फिर शिकागो आ गया।

इसके बाद धर्म सभा में “अमेरिकी निवासी भागिनी तथा भ्रातृगण” के उदबोधन ने इतिहास को बदल दिया। लक्ष्य और उसकी प्राप्ति तक बिना रुके, बिना थके चलते रहने का मंत्र मानव जाति का सबसे बड़ा संकल्प बन गया। जो आज भी वैश्विक जगत में करोड़ों लोगो के लिए विपरीत परिस्थितियों में असंभव को संभव बनाने का मंत्र बना हुआ है।

भाष्कर गुहा नियोगी
वाराणसी, 9415354828

  • भड़ास की पत्रकारिता को जिंदा रखने के लिए आपसे सहयोग अपेक्षित है- SUPPORT

 

 

  • भड़ास तक खबरें-सूचनाएं इस मेल के जरिए पहुंचाएं- bhadas4media@gmail.com

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *