दया शंकर शुक्ल सागर-
बिहार में नीतीश बाबू ने जबरदस्त खेला किया। उन्होंने देश के सभी सिटिंग सीएम यानी मौजूदा मुख्यमंत्रियों को चुनाव जीत का फार्मूला दे दिया है। चुनावी वर्ष या उससे साल भर पहले महिलाओं या युवाओं के खाते में रोजगार के नाम पर पैसा डालने की योजना शुरू करो। चुनाव अधिसूचना जारी होने के बाद मतदान के दिन तक योजना का पैसा गरीबों के खाते में डालते रहो। तब नोट के बदले इतने वोट मिलेंगे कि गिनना मुशकिल हो जाएगा। ये किसी भी राज्य के चुनाव में बंपर जीत का नायाब और अजेय फार्मूला है।
जब राहुल गांधी बिहार में वोट चोरी रोकने की यात्रा निकल रहे थे तब सुशासन बाबू खाते में सीधा पैसा डालने का इंतजाम कर रहे थे। राहुल वोट चोरी के लिए छाती पीट रहे थे तब उनके वोटरों पर डाका डालने की योजना बन रही थी। ये खेला ना देश में डेढ़ सौ साल से राजनीति कर रही कांग्रेस की समझ में आया न बूथ लूट का चुनाव जीतने वाली लालू यादव की पार्टी को। और तो और दुनिया भर के राजनेताओं को चुनाव लड़ने की ट्रनिंग देने वाले चुनाव प्रबंधन के मास्टर माइंड प्रशान्त किशोर भी यह खेला समझ नहीं पाए। वह इतने सदमे में हैं कि दो दिन से कहीं नज़र नहीं आ रहे। कांग्रेस और आरजेडी को जैसे सांप सूंघ गया हो। सदमें में वह भी मीडिया के सामने नहीं आ रहे।
जब बिहार के वोटरों के खाते में दस दस हजार रुपए जा रहे थे तभी विपक्ष को हल्ला मचाना चाहिए था। कोर्ट का दरवाजा खटखटाना चाहिए था। क्योंकि भारत में चुनाव आचार संहिता का कानून बहुत ढीला ढाला है। इसमें आचार संहिता लागू होने के बाद केन्द्र या राज्य सरकार कोई नई योजना नहीं शुरू कर सकती। किसी योजना पर अगर काम शुरू नहीं हुआ है तो उसे चुनाव के दौरान शुरू नहीं किया जा सकता लेकिन अगर योजना पहले से चल रही हो तो चुनाव के दौरान उसे जारी रखा जा सकता है। बिहार सरकार ने इसी क्लाज़ का फायदा उठाया।
लेकिन नई सड़क बनाने या नया पुल बनाने का काम जारी रखने और ठीक चुनाव के बीच मतदाता के खाते में पैसा जमा करने में ज़मीन और आसमान का फ़र्क है। इससे मतदाता सीधा प्रभावित होता है। इतनी-सी बात विपक्ष समझ नहीं पाया। इसीलिए इस देश में विपक्ष का ये हाल है। अब विपक्ष के सामने खिसियानी बिल्ली खंबा नोचने वाला हाल है। लेकिन एक घिसीपिटी कहावत यहां एकदम सटीक बैठती है- ‘अब पछताए क्या होत जब चिड़िया चुग गई खेत।’



