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आज के अखबार : मुख्य न्यायाधीश की विचारधारा और हाईकोर्ट के सरकार समर्थक फैसले की खबर एक साथ क्यों नहीं?

संजय कुमार सिंह-

पेट्रोल-डीजल की कीमत में वृद्धि होनी ही थी, घोषणा भी हो चुकी थी, तेल कंपनियों ने लागू किया तो आज ज्यादातर अखबारों की लीड यही है। नीट मामले में गिरफ्तारी और अगले साल से ऑनलाइन परीक्षा होने की खबर दूसरी लीड है। नीट परीक्षा की तारीख की घोषणा भी बड़ी खबर है। अमर उजाला और देशबन्धु ने इसे प्रमुखता दी है। नीट की खबर में लीक रोकने की इच्छा जैसा कुछ नहीं दिखता है। बाकी सरकार जो कर रही है, आरएसएस की जो लाइन है उससे भाजपा में भी लोग चकित हैं (दि एशियन एज)। देश में खबर, अफवाह और फैक्टचेक की व्यवस्था ऐसी हो गई है कि प्रधानमंत्री को खुद खबरों या अफवाहों का खंडन करना पड़ रहा है। नवोदय टाइम्स में इस आशय की एक खबर छपी है। विदेश यात्रा पर कोई भी नया या अतिरिक्त टैक्स नहीं लगाया जा रहा है। हाल ही में विदेश यात्रा पर नया सरचार्ज या टैक्स लगाने की उड़ी अफवाहों को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूरी तरह से खारिज और भ्रामक करार दिया है। वैसे, आज की सबसे बड़ी या खास खबर है, देश के मुख्य न्यायाधीश का बयान। इससे उनके विचार सार्वजनिक हुए हैं। इसके लिए उनकी आलोचना की जा रही है। मुझे लगता है कि उनकी विचारधारा मौजूदा सरकार के काम-काज के अनुकूल है और उनके फैसले सरकार के समर्थन में रहे हैं। इनमें चुनाव आयोग और सीबीआई का समर्थन शामिल है। आप इन्हें सरकार के साथ मानिए या अलग, दिखता रहा है कि सब सरकार के हित में काम करते रहे हैं। अगर ऐसे में मुख्य न्यायाधीश की विचारधारा भी सरकार वाली है तो जनता को सत्ता की ज्यादतियों से न्याय कहां मिलेगा? यहां अगर यह याद किया जाए कि राहुल गांधी ने कहा है कि सरकार ने सभी संवैधानिक संस्थाओं पर समान विचारधारा के लोगों को बैठा दिया है। अक्सर कहते रहे हैं कि केंद्र सरकार और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने मिलकर भारत के लोकतांत्रिक ढांचे और संवैधानिक संस्थाओं पर कब्जा कर लिया है। उनका दावा है कि इन संस्थाओं के कमजोर होने से भारत के संविधान की मूल भावना और विविधता का विचार खतरे में पड़ गया है। विपक्ष की भूमिका सीमित कर दी गई है। इन संस्थाओं की स्वायत्तता खत्म करके विपक्ष की आवाज को दबाया जा रहा है। इससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया प्रभावित हो रही है। चुनाव आयोग, सुप्रीम कोर्ट और सीबीआई की भूमिका चर्चा में रही है।

सीबीआई प्रमुख की नियुक्ति पर राहुल गांधी के एतराज के बावजूद पहले के प्रमुख को ही विस्तार दिए जाने का व्यावहारिक मतलब यही है कि मुख्य न्यायाधीश ने सरकार का साथ दिया। दूसरी ओर चुनाव आयोग के प्रमुख की नियुक्ति से संबंधित सवालों को लंबित रखना और चुनाव आयोग के इस दावे को स्वीकार करना कि वह स्वतंत्र है – ने भाजपा को गंगोत्री से गंगा सागर तक पहुंचाने में मदद तो दी ही है। जबरदस्ती के एसआईआर के बावजूद डिजिटल डिसक्रिपेंसी, ट्रिब्यूनल और उसका काम तथा उसके बावजूद लाखों लोगों को वोट नहीं देने देना कुछ तो कहता ही है। विचारधारा की समानता के बाद मामला राहुल गांधी के आरोपों की याद दिलाता है। सच्चाई यह है कि समान विचारधारा वाले जजों को ईनाम मिल रहा है और वे इसके बदले काम करते दिख रहे हैं। यह सब या इतना कुछ तब हो रहा है जब मीडिया अपना काम नहीं के बराबर कर रहा है। होने से मेरा मतलब सार्वजनिक होने से है और अब विचारधारा सार्वजनिक होने या किए जाने की खबर जैसे छपनी चाहिए थी वैसे अकेले द टेलीग्राफ में है। मुख्य न्यायाधीश ने जो कहा है उसकी खबर जैसी छपनी चाहिए थी और सोशल मीडिया पर जितना हंगामा है वैसी नहीं छपी है। द टेलीग्राफ की खबर से समझा जा सकता है कि यह खबर क्या है और कैसी होनी चाहिए थी। खबर का हिन्दी अनुवाद इस प्रकार है, सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को उन “युवाओं” को “कॉकरोच” और “परजीवी” बताया, जो सोशल मीडिया पर “व्यवस्था पर हमला” करते हैं और “आरटीआई कार्यकर्ता” या “अन्य कार्यकर्ता” बन जाते हैं। ये टिप्पणियाँ उन वकीलों के संदर्भ में की गईं जो न्यायपालिका की आलोचना करते हैं। कोर्ट ने दिल्ली के कुछ वकीलों की कथित तौर पर फर्जी लॉ डिग्रियों की सीबीआई जाँच की चेतावनी दी; कोर्ट ने कहा कि इनमें से कई वकील न्यायपालिका के खिलाफ अपमानजनक और घिनौनी टिप्पणियाँ पोस्ट करते हैं। “समाज में पहले से ही ऐसे परजीवी हैं जो व्यवस्था पर हमला करते हैं, क्या आप भी उनमें शामिल होना चाहते हैं? कुछ युवा कॉकरोच की तरह होते हैं। उन्हें कोई रोज़गार नहीं मिलता और पेशे में उनकी कोई जगह नहीं होती।” मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने वकील और याचिकाकर्ता संजय दुबे को संबोधित करते हुए यह बात कही।” उनमें से कुछ मीडिया में चले जाते हैं, कुछ सोशल मीडिया पर सक्रिय हो जाते हैं, कुछ आरटीआई कार्यकर्ता बन जाते हैं और कुछ अन्य तरह के कार्यकर्ता बन जाते हैं। वे हर किसी पर हमला करना शुरू कर देते हैं।” यह स्पष्ट नहीं था कि “कॉकरोच” और “परजीवी” के संदर्भों को केवल उन युवा वकीलों के संबंध में समझा जाना चाहिए या नहीं, जो मुख्यधारा और सोशल मीडिया में बहुत अधिक सक्रिय हैं और अक्सर न्यायिक मामलों पर आलोचनात्मक और अपमानजनक तरीके से टिप्पणियाँ करते हैं।

मुझे लगता है कि बाकी अखबारों ने यह खबर कायदे से नहीं दी है। कानून की डिग्री की सीबीआई की जांच की चेतावनी बताती है कि हालात कैसे हैं। इसमें खुद सीबीआई के काम काज, उसका उपयोग, जज के बच्चों को सरकारी काम और बेहिसाब पैसे देने का मामला तथा उसका संदिग्ध मकसद बड़े मामले हैं लेकिन मुख्यधारा की मीडिया को जैसे सांप सूंघ गया है। मुख्य न्यायाधीश की यह टिप्पणी तब आई है जब दुनिया जानती है कि आप नेता और मंत्री की फर्जी डिग्री के मामले में दिल्ली पुलिस ने क्या किया था और प्रधानमंत्री की डिग्री के मामले में पूरा सिस्टम क्या-क्या करता रहा है। फर्जी डिग्री और प्रमाणपत्रों के और भी मामलों पर कार्रवाई नहीं हुई है पर मुख्य न्यायाधीश शिकायत करने वालों को चेतावनी दे रहे हैं – अखबारों ने यह सब नहीं बताया है। भोजशाला मामले में 1991 के कानून की चर्चा और उसपर फैसला भी आज बड़ी खबर थी। बाकी अखबारों ने बेहद निराश किया। दूसरी ओर मुख्य न्यायाधीश के कहने का मतलब यह भी है कि ऐक्टिविस्ट बनने वालों के पीछे सीबीआई लगा दी जाएगी।

आज ही खबर है, मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने विवादास्पद भोजशाला को मंदिर करार दिया है और हिन्दुस्तान टाइम्स ने इसे हिन्दू याचिकाकर्ताओं की जीत बताया है। हालांकि, अकेले हिन्दुस्तान टाइम्स ने इस खबर के साथ मुख्य न्यायाधीश की विचारधारा वाली खबर को छापा है। देश के हिन्दू पाठक आश्वस्त हो सकते हैं कि यह फैसला विचारधारा के आधार पर है तो सुप्रीम कोर्ट में क्या होगा या अपील हो भी पाएगी या नहीं। यह तब हुआ है जब देश में 1991 का पूजा स्थल कानून है। इसका मकसद देश के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने को बनाए रखना और स्वतंत्रता के समय (15 अगस्त 1947) जो धार्मिक स्थल जिस रूप में था, उसकी स्थिति को वैसा ही रखना था। यह कानून किसी भी पूजा स्थल के धार्मिक स्वरूप को बदलने पर पूरी तरह रोक लगाता है। इसके तहत 15 अगस्त 1947 को जो मंदिर था वह मंदिर रहेगा, जो मस्जिद, चर्च या गुरुद्वारा था, वह वही रहेगा। इसका मकसद अयोध्या जैसे अन्य विवादों को भविष्य में सिर उठाने से रोकना था ताकि देश बार-बार सांप्रदायिक तनाव और ध्रुवीकरण की आग में न झुलसे। यह कानून अतीत के घावों को कुरेदने के बजाय भविष्य की ओर बढ़ने का एक कानूनी संकल्प था। राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद को इस कानून से अपवाद स्वरूप बाहर रखा गया था। इसके बावजूद मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित भोजशाला-कमल मौला मस्जिद परिसर का विवाद एक नई कानूनी और सामाजिक चुनौती बनकर उभरा है। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के आदेश पर भोजशाला परिसर का भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा वैज्ञानिक सर्वे कराया गया। हिंदू पक्ष इसे वाग्देवी (सरस्वती) का मंदिर मानता है, जबकि मुस्लिम पक्ष इसे मस्जिद मानता है। 1991 के कानून के मद्देनजर इस तरह के विवाद को शुरू में ही रोका जा सकता है लेकिन सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाईकोर्ट अगर “धार्मिक स्वरूप का पता लगाने” के लिए सर्वे की अनुमति देते हैं, तो 1991 के कानून का मूल मकसद कमजोर होता दिखाई देता है। व्यावहारिक धरातल पर इसने उन दावों और विवादों के बंद दरवाजों को फिर से खोल दिया है जिन्हें 1991 के कानून ने हमेशा के लिए बंद करने की कोशिश की थी। इससे किसे फायदा है और क्यों होने दिया जा रहा होगा, समझना मुश्किल नहीं है।

ऐसे में आज मुख्य न्यायाधीश ने जो कहा और भोजशाला मामले में फैसला एक जैसी खबर है और एक साथ होनी चाहिए थी। भोजशाला मामले में यह फैसला भी वैसे ही बड़ी खबर है और इसीलिए टाइम्स ऑफ इंडिया ने इसे पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर लीड बनाया है। मुख्य न्यायधीश ने जो कहा वह पहले पन्ने पर नहीं है और भोजशाला की खबर के साथ पूर्व भाजपा विधायक कुलदीप सेंगर की जमानत रद्द करने की खबर है। दोनों खबरें एक साथ पढ़ने से पाठक को लग सकता है कि अदालतें निष्पक्ष फैसला दे रही हैं और भाजपा विधायक के खिलाफ फैसला हुआ है। मुख्य न्यायाधीश वाली खबर भी यहीं होती तो आप समझ सकते हैं कि संदेश क्या जाता और वह हिन्दुस्तान टाइम्स की दो खबरों से जो राय बनेगी उससे अलग होगा। हालांकि, यहां तीसरी खबर नहीं है। अखबार ने बताया है कि अदालत ने कहा है कि 1991 का कानून भोजशाला पर लागू नहीं होता है। कहने की जरूरत नहीं है कि इस सरकार और व्यवस्था ने कई कानूनों की व्याख्या पर समय खराब किया है और इसमें सबरीमाला मामला भी है। लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति और चुनाव आयोग के अधिकारों का मामला (या उसकी व्याख्या) जनता के खिलाफ, भाजपा के पक्ष में है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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