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सुख-दुख

कॉकरोच को कॉकरोच क्यों बोला… पिल्लागिरी को पत्रकारिता समझने वाले दीमक भी कॉकरोच कहने पर बुरा मान गए!

अमित शर्मा-

कॉकरोच को कॉकरोच क्यों बोला…? कुछ पत्रकार कॉकरोच होते हैं, लेकिन कोई कॉकरोच पत्रकार नहीं होता… जज साहब, आपको इतना कड़वा सच भी नहीं बोलना था…इतना कठोर सच सुनने की आदत नहीं इस समाज को… बुरा तो लगेगा ही…

अपने ही भाइयों/सहकर्मियों के खिलाफ नीचता की हद तक जाकर साजिशें करेंगे… खुद का कोई लाभ न हो, लेकिन अपने साथियों को गिराने के लिए खुद गर्त में गिर जाएंगे… न देश की चिंता, न समाज की… केवल पिल्लागिरी को ही पत्रकारिता समझने वाले दीमक भी कॉकरोच कहने पर बुरा मान गए…

भैया जी… सच तो यह है कि गुरु घंटाल टाइप बड़े बुजुर्ग कॉकरोच बहुत समझदार होते हैं.. ये प्रतिभाशाली कॉकरोचों को बचपन में ही पहचान लेते हैं…. वे इन पिल्ले टाइप छोटे-छोटे कॉकरोच को पालकर रखते हैं… वे उन्हें पालते पोषते हैं…बड़ा करते हैं… उन्हें पिल्लागिरी के नए-नए गुण दिखाते हैं….. उनके हर बुरे काम को ऊपर वाले के सामने सही ठहराते हैं… क्यों…?….जिससे वो उनसे भी बड़ा कॉक्रोच बने और उनका नाम रोशन करे…. खुद जीवन भर यही करके मठाधीश बने… अब अगली पीढ़ी में भी उनसे बढ़कर कॉकरोच पैदा होते रहे, इसके लिए खूब सोच समझकर एक रणनीति के साथ नए नए कॉकरोच तैयार करते हैं…..

कई बार अपने क्षेत्र से चुनकर प्रतिभाशाली कॉकरोच लाकर उन्हें बड़े पद देकर उन्हें तैयार करते हैं.. लेकिन कोई बोलना मत… बुरा लग जाएगा कॉकरोच साहब को… लगना ही चाहिए… आखिर वेश्याओं को भी समाज में पतिव्रता ही दिखना पसंद होता है…. धंधा करती हैं… लेकिन पर्दे के पीछे… सामने तो सती सावित्री ही दिखने की इच्छा होती है…. आखिर इज्जत भी कोई चीज होती है…

जनरल साहब ने इन्हीं लोगों को प्रेस्टीट्यूट बोल दिया था… कुछ गलतफहमी हो गई थी उनको…. बोलना तो दलाल या भंxवा था… लेकिन सभ्य आदमी थे… गंदे शब्द क्यों बोलते…. इशारा कर दिया… जिन्हें जो समझना था… समझ गए… लेकिन प्रेश्याओं को बुरा लग गया… उन्हें लगा कि जैसे भरे बाजार किसी ने उनके कपड़े उतार दिए हों…

वैसे ये गलतफहमी केवल तुम्हें ही है कि लोग तुम्हारी इज्जत करते हैं… तुम आगे से चिकने घड़े दिखना चाहते हो, पीछे से सब कुछ फटा हुआ है… पीछे से तुम नंगे हुए पड़े हो… और ये बात तुम्हें छोड़ बाकी सबको मालूम है….

जज साहब ने भी उनकी बात को तोड़ने मरोड़ने की बात कहकर पीछे हट गए हैं…. लेकिन हो तो तुम कॉकरोच ही… समझ तो सब गए ही हैं… दो टके की इज्जत नहीं रही तुम्हारी…? (वैसे बेशर्मी इस कॉकरोचों की दुनिया का सबसे पहला और सबसे महत्वपूर्ण नियम होता है। बड़े बुजुर्ग कॉकरोच खींसे निपोरते हुए नए कॉकरोचों को बताते हैं…जो बेशर्म न हुआ, वो क्या खाक कॉकरोच बनेगा।)

वैसे साहब जी, कॉकरोचों में बड़ी एकता होती है…. एक कंपनी का कॉकरोच चार अन्य कंपनियों के कॉकरोच को अपना बाप बनाकर रखता है…केवल एक सच्चा कॉकरोच ही दूसरे सच्चे कॉक्रोच की इज्जत करता है…. जैसे कोई छुटभैया पॉकेटमार बड़े हत्यारों और आतंकवादियों का सम्मान करता है… इनके लिए धंधा ही सब कुछ है… धंधा ही सबसे बड़ा धर्म है… इनके कॉकरोच बाप इन्हें बचपन में ही ये बात समझा देते हैं… और ये पूरी जिंदगी इस पाठ को याद रखते हैं… पूरी शिद्दत से कॉकरोचों की दुनिया के नियमों का पालन करते हैं….

दुःख केवल यह है कि इनकी इस गंदगी के बीच अच्छे लोगों को भी वह सम्मान, अधिकार प्राप्त नहीं होता जिसके वे अधिकारी हैं। उन सच्चे पत्रकारों को मेरा प्रणाम।

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