मो. जाहिद-
भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश धनंजय यशवंत चंद्रचूड़ ने BBC के पत्रकार Stephen Sackur को दिये इंटरव्यू में यह स्वीकार किया कि वह एक धार्मिक व्यक्ति हैं और पूर्व मुख्य न्यायाधीश के अनुसार “सभी धर्मों के प्रति निष्पक्ष होने के लिए नास्तिक होना कतई ज़रूरी नहीं” दरअसल न्यायमुर्ति डी वाई चंद्रचूड़ यह भूल गए कि भारत के उच्चतम न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश देश की पूरी न्याय प्रणाली का मुखिया होता है और उनके व्यवहार, शब्दों और सार्वजनिक उपस्थित के साथ धार्मिक आस्था के प्रति आचरण का पूरी न्यायिक व्यवस्था पर प्रभाव पड़ता है और उनके नीचे लोवर कोर्ट के जज तक उनके इस व्यवहार से प्रभावित होते हैं।
और अपने कार्यकाल के अंतिम दिनों में वह यही करते रहे, मुख्य न्यायाधीश पद पर रहते हुए भगवा पहन कर गुजरात में मंदिर-मंदिर घूमे, घर में प्रधानमंत्री के साथ गणेशोत्सव मनाते दिखे तो अयोध्या जाकर राम मंदिर और हनुमान गढ़ी के दर्शन किए, और तमाम फैसले सरकार के पक्ष में आधे अधूरे दिए।
देश की न्यायिक व्यवस्था का मुखिया होने के कारण उनका यह कृत्य देश के पूरे न्यायिक सिस्टम को एक मैसेज देता है प्रभावित करता है।
तो जब उन्होंने स्वयं स्वीकार कर लिया कि वह धार्मिक व्यक्ति हैं तो अब सवाल तो चंद्रचूड़ से यह है कि धार्मिक होते हुए उनकी निष्पक्षता पर कैसे विश्वास किया जाए? कि जिस अराध्य की वह सुबह-शाम पूजा करते रहे हैं वही अराध्य उनकी अदालत में एक पक्ष के रूप में खड़ा है। तो क्या राम को पूजने वाला एक जज अपनी अदालत में एक पक्षकार “रामलला विराजमान” के खिलाफ फैसला दे सकता है?
स्पष्ट है कि कत्तई नहीं ….
तो फिर बाबरी मस्जिद पर उच्चतम न्यायालय का फैसला स्पष्ट है कि मुस्लिम पक्ष और बाबरी मस्जिद की तमाम दलीलों और सबूतों को स्वीकारने और मंदिर पक्ष की तमाम दलीलों को नकारने के बाद भी बाबरी मस्जिद अदालत में क्यों हार गयी?
कारण पीठ के चार जजों का उस मुकदमे के एक पक्ष “राम लला विराजमान” के प्रति श्रद्धा रखना था, वर्ना क्या कारण है कि बाबरी मस्जिद के पक्ष में सारे सबूत और सारे तथ्य को स्वीकार कर लेने के बावजूद बाबरी मस्जिद को फांसी दे दी गई।
ऐसा पूरी दुनिया में यह इकलौता फैसला है जो न्याय के मूल सिद्धांत के विरुद्ध किया गया है और मुख्यतः इसे डी वाई चंद्रचूड़ के द्वारा लिखा फैसला माना जाता है।
स्पष्ट है कि मुसलमानों के धार्मिक मामलों में एक पक्ष यदि न्यायधीश के धर्म वाला हुआ तो न्याय कैसा होना चाहिए यह डी वाई चंद्रचूड़ ने रेखांकित कर दिया है और चुंकि वह खुद को धार्मिक व्यक्ति कहते हैं तो सब कुछ स्पष्ट हो जाता है।
दरअसल डी वाई चंद्रचूड़ झूठे और दोहरे चरित्र के व्यक्ति हैं और जहां तक मैं उनके धर्म को जानता हूं वह ऐसा धर्म कत्तई नहीं है।
उस धर्म में राम हैं जिन्होंने भरी राजसभा में एक धोबी को उन्होंने ऐसे ही न्याय दिया था और विवाद लगने पर अपनी पत्नी सीता का त्याग कर दिया था और मेरा मानना है कि न्याय देने वाले आज यदि राम स्वयं होते तो फैसला बाबरी मस्जिद के पक्ष में देते।
उसी धर्म में सबसे बड़े “सत्यनिष्ठ” राजा हरिश्चंद्र भी हैं, जिन्होंने अपना सारा राजपाट दान करके श्मशान घाट पर एक डोम के यहां नौकरी कर ली।
सांप काटने पर जब पुत्र रोहतास की मृत्यु हो गई तो उसके दाह संस्कार के लिए उसी श्मशान घाट पर लगने वाले कर के रूप में हरिश्चंद्र ने अपनी पत्नी तारा की साड़ी फाड़कर उसे कर के रूप में ले लिया।
धर्म यह होता है, कि आप जिस पद पर रहें वहां निष्पक्षता ही आपका धर्म है जो जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ नहीं निभा सके और अपने व्यक्तिगत धर्म का पक्ष ले लिया और उन्होंने ही क्यों चार और न्यायाधीश लोगों ने भी ले लिया।
यह मैं नहीं पूर्व उच्चतम न्यायालय के पूर्व जज जस्टिस आर एफ़ नरीमन ने कहा है कि बाबरी मस्जिद फ़ैसले में धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत का पालन नहीं किया गया अर्थात जजों ने अपने धर्म का पक्ष लिया।
दरअसल न्याय की कुर्सी पर बैठा व्यक्ति स्वयं भगवान का एक रूप होता है, इसीलिए उन्हें “पंच परमेश्वर” भी कहा गया है, न्यायाधीश का अर्थ भी वही होता है न्याय+ आधीश, आधीश का अर्थ होता है राजा, अर्थात न्याय का राजा। न्यायमूर्ति का भी वही अर्थ होता है “न्याय की मूर्ती” अर्थात साक्षात न्याय के देवता और अंग्रेज़ी में इन्हें मी लार्ड कहा जाता है अर्थात मेरे भगवान, अर्थात न्याय की कुर्सी पर बैठते ही इनका कोई व्यक्तिगत धर्म नहीं होता बल्कि यह स्वयं अपने आप में भगवान होते हैं जिनका एक ही धर्म होता है कि अपने व्यक्तिगत जीवन या व्यक्तिगत धर्म का असर अपने फैसलों पर ना पड़ने दें, और किसी भी मुकदमे में फैसला सबूत, गवाह और तथ्य के आधार पर ही दें, राम की तरह, राजा हरिश्चन्द्र की तरह।
माननीय लोगों ने ऐसा नहीं किया जिसकी विवेचना इतिहास जब तक यह धरती है करता रहेगा। सत्ता आती जाती रहती है, नरेटिव बनते बिगड़ते रहते हैं मगर उच्चतम न्यायालय के फैसले इतिहास में दर्ज हो जाते हैं।
मगर यहां डी वाई चंद्रचूड़ को क्या ही कहें जब वह अपने बयान से ही पलट गये और उन्होंने इस बात से इनकार किया है कि अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के फ़ैसले से ठीक पहले उन्होंने भगवान से इस समस्या का समाधान उन्हें सुझाने की प्रार्थना की थी।
जबकि उनके ऐसा कहते वीडियो यूट्यूब पर अभी भी उपलब्ध हैं..
दरअसल कलयुग के पंच को “पंच परमेश्वर” अब तो नहीं ही कहा जाना चाहिए और इसके कारण डी वाई चंद्रचूड़ जैसे न्यायाधीश हैं और तब भी जब फैज़ाबाद के जिला न्यायाधीश कृष्ण मोहन पांडेय ने स्वीकार किया कि उन्होंने बाबरी मस्जिद का ताला खोलने का आदेश एक बंदर के आदेश पर दिया।
फिर सवाल यह है कि ऐसे फैसलों के बावजूद देश के मुसलमानों का न्यायालय के प्रति विश्वास कैसे बना रहे?
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Dr manish
February 15, 2025 at 5:24 am
मियाँ ज़ाहिद आप तो अपने agende पर चलने लगे … जुमा की नमाज पढ़ने जाएं तो बहुत नेक दिल बंदा होता है मंदिर या चर्च चला जाए तो वो बेकार है … ग़ज़ब का दोगलापन है मुस्लिम सोच से बाहर निकल ही नहीं पाते हैं. व्यक्ति का मूल्यांकन उसके कार्य पर करिए na की उसने टोपी लगाया है या तिलक लगाया है इस आधार पर करना चाहिए