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सियासत

मेरी फ्रेंडलिस्ट के एक सज्जन फारूक अब्दुल्ला पर हमला करने वाले शख़्स को “फेसबुकिया प्रजाति का अंकिल” कहकर उपहास उड़ा रहे हैं!

यशवंत सिंह-

मेरी फ्रेंडलिस्ट के एक सज्जन फारूक अब्दुल्ला पर हमला करने वाले शख़्स को “फेसबुकिया प्रजाति का अंकिल” कहकर उपहास उड़ा रहे हैं तो मैंने उनकी पोस्ट के कमेंट में ये लिखा और कुछ फैक्ट भी रखे-

“ये अंकिल कश्मीरी पंडितों के नरसंहार का बदला लेना चाहता होगा। कश्मीरी पंडित चुन चुन के खत्म किए गए थे कश्मीर में। इन्हीं फारूक अब्दुल्ला के राज में। ये फैक्ट है। उसकी टीस आज भी देश भर में बिखरे कश्मीरी पंडितों से बातचीत में उभर कर सामने आती है। मैं जब तक किसी कश्मीरी पंडित से न मिला था तब तक नहीं समझा पाया था कि उनके साथ क्या हुआ। फारूक अब्दुल्ला को फाँसी देनी चाहिए। कश्मीरी पंडितों का नरसंहार कराने के जुर्म में।”


कश्मीरी पंडितों का पलायन और हिंसा – यह तथ्य है

1989–1990 के दौर में कश्मीर में आतंकवाद बहुत तेजी से बढ़ा। कई कश्मीरी पंडितों की हत्या हुई, धमकियाँ दी गईं और बड़े पैमाने पर पलायन हुआ। अलग-अलग अनुमानों के अनुसार लगभग 3 से 5 लाख कश्मीरी पंडितों को कश्मीर घाटी छोड़नी पड़ी। यह घटना भारत के हालिया इतिहास की बहुत दुखद और दर्दनाक त्रासदी मानी जाती है।

उस समय सरकार किसकी थी

जनवरी 1990 तक जम्मू-कश्मीर में Farooq Abdullah की सरकार थी, लेकिन 19 जनवरी 1990 को उन्होंने इस्तीफा दे दिया। उसके बाद राज्य में गवर्नर रूल लग गया और Jagmohan राज्यपाल बने।


इस नरसंहार के बाद ही राष्ट्रपति शासन लगा था। इतने आतंकी बुला लिए गए थे कि वे सफाई अभियान राष्ट्रपति शासन में भी चलाते रहे। शुरुआत फारूक अब्दुल्ला के कार्यकाल में ही हुई थी।

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