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उपेक्षा का शिकार हो रहा है गांधी का सत्याग्रह आश्रम

गुजरात के पाटनगर गांधीनगर के महात्मा मंदिर में महात्मा गांधी के हिंद आगमन की शताब्दी प्रवासी भारतीय सम्मेलन के रुप में मनाई जा रही है, लेकिन देश में सत्तारुढ़ पार्टी हो या विपक्षी दल गांधी के नाम पर पिछले कई सालों से राजनीति करने वालों को शायद यह भी नहीं मालूम कि जब महात्मा गांधी अफ्रीका से गुजरात आए थे और 20 मई 1915 को अहमदाबाद में सत्याग्रह आश्रम की स्थापना कर देश की आजादी का शंखनाद किया था, वह सत्याग्रह आश्रम उपेक्षा का शिकार हो रहा है. देश में साबरमती आश्रम के बारे में तो सबको मालूम है लेकिन सत्याग्रह की शुरुआत करने वाले गांधीजी के आश्रम को ना केवल कांग्रेस बल्कि देश की सत्तारुढ़ भाजपा सरकार ने भी भुला दिया है यही कारण है कि महात्मा गांधी के हिंद आगमन शताब्दी के आरंभ में और ना ही इन 100 सालों में इस सत्याग्रह आश्रम में अब तक कोई भी कार्यक्रम आयोजित नहीं हुआ.

गुजरात के पाटनगर गांधीनगर के महात्मा मंदिर में महात्मा गांधी के हिंद आगमन की शताब्दी प्रवासी भारतीय सम्मेलन के रुप में मनाई जा रही है, लेकिन देश में सत्तारुढ़ पार्टी हो या विपक्षी दल गांधी के नाम पर पिछले कई सालों से राजनीति करने वालों को शायद यह भी नहीं मालूम कि जब महात्मा गांधी अफ्रीका से गुजरात आए थे और 20 मई 1915 को अहमदाबाद में सत्याग्रह आश्रम की स्थापना कर देश की आजादी का शंखनाद किया था, वह सत्याग्रह आश्रम उपेक्षा का शिकार हो रहा है. देश में साबरमती आश्रम के बारे में तो सबको मालूम है लेकिन सत्याग्रह की शुरुआत करने वाले गांधीजी के आश्रम को ना केवल कांग्रेस बल्कि देश की सत्तारुढ़ भाजपा सरकार ने भी भुला दिया है यही कारण है कि महात्मा गांधी के हिंद आगमन शताब्दी के आरंभ में और ना ही इन 100 सालों में इस सत्याग्रह आश्रम में अब तक कोई भी कार्यक्रम आयोजित नहीं हुआ.

कितनी अजीब त्रासदी है कि देश के राजनेताओं ने गांधी का स्वरुप ही बदल दिया है. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे तब गांधीनगर के 40,000 पेड़ कटवाकर और 14,000 श्रमिकों की झोपड़ियों को उजाड़कर अपना गुणगान और अपनी मार्केटिंग करने के लिए महात्मा मंदिर बना दिया, लेकिन जिस महात्मा मंदिर में जिस प्रवासी की याद में प्रवासी भारतीय सम्मेलन आयोजित किया गया है और जिसने सत्याग्रह आश्रम की स्थापना कर नया राजनैतिक अध्याय आरंभ किया उसकी स्थली को आखिर क्यों भुला दिया गया यह एक बहुत बड़ा सवाल है.

अफ्रीका में रंगभेद के खिलाफ 1908 में मोहनदास करमचंद गांधी ने आजादी की लड़ाई का शंखनाद किया और अफ्रीका ही में बने अश्वेत लोगों को संगठित किया, और 1908 में अफ्रीकन इंडियन कांग्रेस की स्थापना कर मास मुवमेंट शुरु किया. गांधी के इस जन आंदोलन में सभी लोग संगठित रहे और 6 साल तक यह आंदोलन चला, जिसके परिणामस्वरुप ब्रिटिश सरकार को रंगभेद के खिलाफ कानून में बदलाव लाना पड़ा. गांधीजी का ध्येय अफ्रीका में तो पूरा हुआ लेकिन 1893 में पीटरमेरिस बर्ग रेलवे के कम्पार्टमेंट में गांधीजी को जब उतार दिया तो रंगभेद नीति को लेकर उन्हें और झटका लगा जिसने विश्व का इतिहास ही बदल कर रख दिया. और गांधीजी अपनी पत्नी कस्तूरबा गांधी के साथ हमेशा के लिए भारत लौट आए. गांधीजी की इच्छा गोखले की संस्था भारत सेवक समाज से जुड़ने की थी लेकिन गोखले ने कहा कि 25 सालों से देश में काफी बदलाव आए हैं, पहले उसे समझो फिर भविष्य़ तय करो..

गांधीजी ने अफ्रीका में टॉलस्टाय आश्रम स्थापित किया था, इसी तर्ज पर उन्हें भारत में भी एक आश्रम स्थापित करने की जरुरत महसूस हुई, हांलाकि गांधीजी को कोलकत्ता, राजकोट, और अन्य जगह से आश्रम स्थापित करने का न्यौता मिला था लेकिन उन्होंने अहमदाबाद को प्राथमिकता दी,  सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि 1915 में अहमदाबाद को भारत का ‘मैनचेस्टर’ कहा जाता था, यहां कपड़े की अनेक मिलें थी, इसीलिए गांधीजी का ऐसा मानना था कि खादी का काम यहां अच्छे से विकसित हो सकेगा. यहां के व्यापारी वर्ग, धनिकों ने भी उन्हें आश्वासन दिया था कि आश्रम का खर्च उठाएंगे, इसीलिए गांधीजी ने अहमदाबाद में सत्याग्रह आश्रम की स्थापना की थी, 20 मई 1915 को आश्रम की स्थापना हुई.

गांधीजी अहिंसा और सत्य के पुजारी थे इसीलिए इस आश्रम का नाम सत्याग्रह आश्रम रखा गया था, इस आश्रम से ही राजनैतिक परिवर्तन का एक नया अध्याय शुरु हुआ,  साथ ही सामाजिक परिवर्तन और आर्थिक बदलाव का नया युग भी आरंभ हुआ. कस्तूरबा और अन्य लोगों के विरोध के बावजूद भी गांधीजी ने एक दलित परिवार को इस आश्रम में जगह दी. जिसके कारण इस आश्रम को आर्थिक सहायता मिलनी भी बंद कर दी गई थी लेकिन गांधीजी डटे रहे. स्वाधीनता संग्राम में महिलाओं को एक नई दिशा भी इसी आश्रम से गांधीजी ने दी थी, ‘मेंकिग ऑफ महात्मा’ का उदय भी इसी आश्रम से हुआ था. लेकिन इस सबके बावजूद भी सत्याग्रह के नींव का पत्थर रखने वाले इस आश्रम को आज भुला दिया है. गुजरात के साबरमती आश्रम में नेताओं और लोगों का हूजूम उमड़ता है और चला जाता है लेकिन जहां से गांधीजी ने सत्याग्रह की शुरुआत की वह सत्याग्रह आश्रम कब खुलता है कब बंद होता है इस बारे में ना ही गुजरात पर्यटन विभाग और ना ही देश के पर्यटन विभाग को इस बात की कोई खबर है. ताज्जुब की बात यह है कि इस आश्रम के रख-रखाव को लेकर राज्य सरकार एक साल में केवल सवा लाख की ग्रांट देती है.

हालांकि गांधीजी के मूल्यों, विचारों और सिद्धातों से संबंधित विचारधारा को समझने के लिए वडोदरा के निजी टूर आपरेटर  ‘मरुन माइग्रेट’ से 2013 में अहमदाबाद की गुजरात विद्य़ापीठ के साथ गांधीजी के सत्याग्रह आश्रम को प्रमोट करने के लिए समझौता किया था और 2 अक्टूबर 2013 को ‘लिव गांधी फॉर ए वाइल; (गांधी को थोड़ा जीकर देखो) के नाम से 1000 रु. एक दिन के पैकेज की घोषणा की थी जिसमें पर्यटकों को एक दिन के लिए इस सत्याग्रह आश्रम में रहना था बल्कि खादी के कपड़े पहनने से लेकर गांधीजी के विचारों को समझना भी इस टूर पैकेज में शामिल था लेकिन लगता है कि यह योजना राज्य सरकार या केन्द्र सरकार के गले नहीं उतरी और पर्यटन क्षेत्र में सत्याग्रह आश्रम का पैकेज टूर पूरी तरह से विफल रहा. 

अहमदाबाद से उषा चांदना की रिपोर्ट.

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