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सोने की बिक्री में 70% की गिरावट: क्या फिर से लौट रहा है हाजी मस्तान का दौर?

अश्विनी कुमार श्रीवास्तव-

जब-जब सरकार ने कानूनों या अपीलों के जरिए सोने की चमक को फीका करने की कोशिश की है, तब-तब एक नई ‘समानांतर अर्थव्यवस्था’ (Parallel Economy) का जन्म हुआ है। 1960 और 70 के दशक का ‘गोल्ड कंट्रोल एक्ट’ इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। उस वक्त भी आधिकारिक बाजार सूख गया था, लेकिन भारतीयों का सोने के प्रति पारंपरिक मोह कभी कम नहीं हुआ।

इसी मांग और सरकारी पाबंदियों के बीच के गैप ने हाजी मस्तान जैसे तस्करों को जन्म दिया, जिन्होंने सोने की तस्करी का एक ऐसा साम्राज्य खड़ा किया जिसने आगे चलकर मुंबई अंडरवर्ल्ड की नींव रखी।

आज 70% की यह गिरावट उसी इतिहास की ओर इशारा कर रही है। प्रधानमंत्री की अपील के बाद सोने की आधिकारिक बिक्री में आई इस भारी गिरावट को मुख्यधारा का मीडिया भले ही आयात बिल घटने और विदेशी मुद्रा (Forex) बचने की एक बड़ी जीत के रूप में पेश कर रहा हो, लेकिन अगर इस पूरी तस्वीर को ‘हाजी मस्तान एंगल’ से देखा जाए, तो बाजार की एक बेहद स्याह हकीकत सामने आती है।

आइए समझते हैं कि यह ‘अंडरग्राउंड’ पहलू कैसे काम करता है:

  1. डिमांड खत्म नहीं हुई, सिर्फ ‘शिफ्ट’ हुई है
    भारत में सोना केवल एक पीली धातु नहीं है; यह एक सामाजिक सुरक्षा, स्त्रीधन और गाढ़े वक्त के निवेश का सबसे भरोसेमंद जरिया है। अगर शोरूम्स में सोने की बिक्री 70% गिर गई है, तो इसका यह मतलब कतई नहीं है कि शादियों या निवेश के लिए लोगों ने सोना खरीदना छोड़ दिया है। यह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि मांग अब सफेद बाजार (White Market) से खिसक कर ग्रे मार्केट (Grey Market) में जा चुकी है। लोग बिना पक्के बिल (GST) के, नकद में सोना खरीद रहे हैं।
  2. स्मगलिंग सिंडिकेट्स का ‘गोल्डन एरा 2.0’
    जब आधिकारिक रास्ते से सोना खरीदना जटिल हो जाता है, तो तस्करों का मुनाफा कई गुना बढ़ जाता है। आज कमोडिटी मार्केट पारदर्शी है, लेकिन यह फिजिकल ग्रे मार्केट पूरी तरह से नकद और अंडरग्राउंड भरोसे पर चलता है। हवाई अड्डों पर पेस्ट के रूप में, मशीनों के पुर्जों में छिपाकर और पोरस बॉर्डर्स के जरिए होने वाली सोने की तस्करी में जो उछाल आता है, वह इसी 70% की ‘कथित’ गिरावट का सीधा बाय-प्रोडक्ट है। तस्कर उसी खाली जगह को भरते हैं जो सिस्टम पैदा करता है।
  3. हवाला और ब्लैक मनी का कॉकटेल
    हाजी मस्तान का दौर सिर्फ सोने का नहीं था, वह ‘हवाला’ के जन्म का भी दौर था। जब सोना गैर-कानूनी तरीके से देश में आता है, तो उसका भुगतान बैंकिंग चैनलों के जरिए नहीं होता। इसके लिए हवाला नेटवर्क का इस्तेमाल होता है। इसका सीधा अर्थ है कि जो पैसा सरकार के टैक्स नेट (GST और कस्टम ड्यूटी) में आना चाहिए था, वह अब अंडरग्राउंड इकॉनमी को फ्यूल कर रहा है, जो आगे चलकर रियल एस्टेट और राजनीति में काले धन के रूप में वापस आता है।
  4. भ्रष्ट गठजोड़ (Nexus) का निर्माण
    तस्करी कभी भी बिना ‘सिस्टम’ की मिलीभगत के नहीं पनपती। जब सोने का इतना बड़ा वॉल्यूम अंडरग्राउंड रास्तों से गुजरता है, तो कस्टम्स, पुलिस और सिस्टम के बीच एक भ्रष्ट नेक्सस का निर्माण होता है। मस्तान के दौर में भी यही हुआ था, जहाँ सफेदपोश लोगों और तस्करों की साठगांठ ने पूरे सिस्टम को खोखला कर दिया था। बाजार पर किसी भी तरह का कृत्रिम दबाव हमेशा इस तरह के भ्रष्टाचार को संस्थागत (Institutionalize) कर देता है।

आंकड़ों का भ्रम और जमीनी हकीकत
बाजार की हकीकत हमेशा सरकारी बयानों और मीडिया की हेडलाइंस से अलग होती है। 70% की यह गिरावट सरकार की बैलेंस शीट और चालू खाता घाटे (CAD) को कुछ समय के लिए खूबसूरत जरूर बना सकती है, लेकिन इसके पीछे पनपता ‘स्मगलिंग और हवाला का अर्थशास्त्र’ अर्थव्यवस्था की नींव के लिए खतरनाक है। जब आधिकारिक आंकड़े इस कदर गिरते हैं, तो अंधेरी गलियों में कोई नया ‘हाजी मस्तान’ अपने लिए अवसर तलाश ही लेता है।

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