ज्ञानरंजन ने ‘पहल’ के माध्यम से जो किया, वह कोई और कारोबार था : कृष्ण कल्पित

Krishna Kalpit-

जब 2009 में पहल के 90 अंक निकालने के बाद ज्ञानरंजन ने इसे बंद करने की घोषणा की थी तो हिन्दी-संसार हतप्रभ रह गया था । उस समय पहल के अवसान पर बहुत लिखा गया था, यह टिप्पणी उसी समय आलोचक राजाराम भादू के आग्रह पर मैंने मीमांसा में लिखी थी जिसे लमही इत्यादि कई पत्रिकाओं ने प्रकाशित किया । दूधनाथ सिंह ने इसे ‘पहल’ पर लिखी सर्वश्रेष्ठ टिप्पणी कहा था। इसके बाद ‘पहल’ की दूसरी शुरुआत हुई और 35 अंक और निकले। अब जबकि ‘पहल’ के 125 अंकों के बाद ज्ञानजी ने इसे बंद करने की आधिकारिक घोषणा की तो, इस टिप्पणी की याद आई। ‘पहल’ के 90 अंक तक मैं केवल एक बार पहल के कविता-विशेषांक 1989 में प्रकाशित हुआ और 2009 के बाद बहुत बार। ‘पहल’ जैसी अप्रतिम और अब ऐतिहासिक पत्रिका के अवसान पर मैं अपनी 2009 में लिखी वह टिप्पणी प्रकाशित करता हूँ। -कृष्ण कल्पित

‘पहल’ : शोकगीतों का एक शोकगीत

-कृष्ण कल्पित

मजहब से मिरे क्या तुझे तेरा दयार और
मैं और, यार और मिरा कारोबार और !

~मीर तक़ी मीर

जिस जिस ने भी पहल के अवसान को एक साहित्यिक पत्रिका का अवसान समझकर अपनी शोकांजलियाँ अर्पित की हैं – उन कमजर्फ़ों को यह नहीं पता कि यह दूसरा ही कारोबार था । यह इस बात से भी साबित है कि जब तथाकथित लघु-पत्रिकाओं के चांदी काटने के दिन आ गए हैं – जब जनपथ और राजपथ पर अनेक विलुप्त पत्र-पत्रिकाओं को नई सज-धज के साथ विचरण करते हुए देख रहे हैं – तब दवा-ए-दिल बेचने वाले ज्ञानरंजन अपनी दूकान बढ़ा गए।

आज से कोई चालीस साल पहले (अब पचास) जब ज्ञानरंजन ने पहल की शुरुआत की थी तब यह पथ कंटकाकीर्ण था । तब हिन्दी की व्यावसायिक पत्रिकाओं के अलावा कल्पना थी, जिसे एक साहित्यिक अभिरुचि के सेठ बद्रीविशाल पित्ती चलाते थे । ज्ञानोदय थी, जिसे एक पूंजीपति घराने की साहित्य-सेवा कह सकते हैं । एक अजमेर से निकलने वाली लहर थी, जिसे प्रकाश जैन ने सचमुच अपार संघर्षों के बीच अपने जुनून से चलाया; लेकिन लहर की विचारहीनता ने इसे अकवितावादियों और विचार-विपथ विद्रोहियों का अड्डा बना दिया था । ऐसे माहौल में ज्ञानरंजन और उनके साथियों ने पहल को एक ख़ास मक़सद से निकाला – वैज्ञानिक चेतना और विचारधारा के साथ । इसे उन्होंने इस महादेश के वैज्ञानिक विकास के लिए प्रस्तुत प्रगतिशील रचनाओं की अनिवार्य पुस्तक की तरह प्रस्तावित किया । ध्यान रहे – पत्रिका नहीं, पुस्तक।

आज तो साहित्यिक या लघु पत्रिका निकालना एक कैरियर या धंधा है । जिस लिटल-मैगज़ीन की तर्ज़ पर हिन्दी में लघु-पत्रिकाएँ निकलीं, वे वाक़ई प्रोटेस्ट की पत्रिकाएँ थीं । अब तो प्रोटेस्ट को सरकारी अनुदान मिलता है, उनकी सरकारी ख़रीद होती है और कुछ असफल और दोयम दर्ज़े के कवि/लेखक/पत्रकार सिर्फ़ पत्रिकाएँ निकालकर साहित्य की भूमि में जामवंत बने हुए हैं।

यहां यह भी याद रखा जाना ज़रूरी है कि ज्ञानरंजन ने जब पहल निकालने की अपने मित्रों के साथ पहल की थी तब वे कथाकार के रूप में अपनी ख्याति के उत्कर्ष पर थे । वे पिता, अनुभव, फैंस के इधर और उधर, घण्टा और बहिर्गमन जैसी अनूठी कहानियाँ लिख चुके थे । ज्ञानरंजन ने दूधनाथ सिंह और काशीनाथ सिंह के साथ नयी कहानी के लद्धड़, मध्यवर्गीय और किंचित रूमानी गद्य के बरक्स एक ठेठ हिंदुस्तानी धूल-धक्कड़-धक्कों से लिथड़ा हुआ एक नया आवारा और बेचैन गद्य प्रस्तावित किया था – अपनी कहानियों के ज़रिए । नयी कहानी के पुरोधा और तीन-तिलंगे अभी जैनेंद्र-विजय का पूरा उत्सव भी नहीं मना पाए थे कि ज्ञानरंजन के चमकीले गद्य के सामने उनकी नयी कहानी पुरानी पड़ गई।

इस गद्य का निर्माण मिश्र-धातुओं से हुआ था, जिस पर बकौल असद ज़ैदी इतने बरसों के बाद भी ज़रा-सा भी जंग नहीं लगा है । विद्रोह की ऐसी जीवन में फंसी हुई कलात्मक भाषा इससे पूर्व कहाँ थी – इसमें धूल-धक्कड़, धुआँ, गर्द और एक शहर से घातक लगाव था । यह याद रखने लायक बात है कि ज्ञानरंजन के महाभिनिष्क्रमण के बाद ही इलाहाबाद ने साहित्यिक राजधानी की हैसियत गंवाई थी । इस आवा-जाही में ज्ञानरंजन से वह पुर्ज़ा खो गया, जिस पर इस अभूतपूर्व गद्य का कीमिया लिखा हुआ था । अब यह एक बन्द गद्य था । दीवारों से घिरा हुआ । वह दरवाज़ा जो ज्ञानरंजन से बन्द हुआ था, जिसे बाद में दूधनाथ सिंह ने, काशीनाथ सिंह ने – कुछ कुछ स्वयं प्रकाश और बाद में उदय प्रकाश ने अपनी बरसों की खट खट से खोलने का उपक्रम किया ।

(यह मेरी एक विनम्र प्रस्तावना है कि ज्ञानरंजन ने छठे-दशक की शुरुआत में जिस धुंधली और बीच-बीच में तीक्ष्ण-चमत्कार वाली भाषा का आविष्कार किया था वह बीसवीं-शताब्दी के अंत में दूधनाथ सिंह के यहाँ आख़िरी कलाम में परवान चढ़ी । यह इस गद्य की परिणति है जहाँ दूधनाथ सिंह ने अपनी विदग्ध और उत्तेजक भाषा में उत्तर-भारत के सर्वप्रिय ग्रन्थ रामचरित मानस को कटघरे में खड़ा कर दिया।)

ज्ञानरंजन

इस माहौल में ज्ञानरंजन ने अपनी वैचारिक प्रतिबद्धताओं के साथ, सीमित साधनों से पेरिस रिव्यू, लंदन मैगज़ीन और क्रिटिकल इंक़व्यरी जैसी पत्रिका हिंदी में निकालने का असम्भव स्वप्न देखा था जिसे उन्होंने तमाम प्रतिकूलताओं के बावज़ूद कोई चार दशक (अब पाँच दशक) तक जारी रखा । अब तो यह कल्पना भी नहीं की जा सकती कि अगर पहल नहीं होती तो क्या होता? समकालीन हिन्दी साहित्य का स्वरूप क्या होता? कला-प्रतिष्ठानों, सेठ-साहूकारों, निर्वीर्य-कलावादियों और धर्मप्राण जी-हुज़ूरियों का पहल ने निरन्तर प्रतिरोध किया। आज यदि हिन्दी साहित्य का माहौल अभी भी वाम वाम वाम दिशा समय साम्यवादी बना हुआ है तो इसमें पहल का भी कुछ योगदान रहा होगा।

असद ज़ैदी ने दस बरस की भूमिका में लिखा है : ‘1960 के दशक से हिन्दी की साहित्यिक पत्रिकाओं के वैकल्पिक मंच ने रचनात्मक साहित्यिक परम्परा के प्रकाशन और पुनरुत्थान का जो ऐतिहासिक जिम्मा निभाया है, उसकी मिसाल विश्व-सहित्य के इतिहास में शायद ही मिलती हो।’ यह कहना ग़लत नहीं होगा कि इस ऐतिहासिक ज़िम्मेदारी का पहल ने एक तरह से नेतृत्व किया। पहल के बाद उसकी नक़ल में बहुतेरी पत्रिकाएँ निकलीं, अब तक निकल रही हैं। शक्ल-सूरत, गेटअप और आकार-प्रकार में पहल की जितनी नक़ल हुई और हो रही है, वह इस बात का प्रमाण है कि एक तरह से पहल लघु-पत्रिकाओं की प्रतीक बन गई । इन पत्रिकाओं के योगदान को भी भुलाया नहीं जा सकता लेकिन ऐसी अधिकतर कोशिशें सम्पादकीय महत्वाकांक्षाओं और वैचारिक-विपथन से अपना वांछित प्रभाव नहीं छोड़ सकीं।

पहल का मूल्यांकन भविष्य में होगा लेकिन अब तक के 125 अंक देखकर कहा जा सकता है कि ज्ञानरंजन ने दुनिया-भर में जो प्रतिरोध और स्वतंत्रता का साहित्य है, विचार है – उसे पहल में समेटने की कोशिश की। इससे हिन्दी में सांस्कृतिक-राष्ट्रवाद और साम्प्रदायिक-फ़ासीवाद के प्रतिरोध की एक मज़बूत धारा विकसित हुई। पहल ने न केवल विश्व-साहित्य के प्रतिरोधी स्वर को बल्कि भारतीय भाषाओं के ऐसे लेखन को भी हिन्दी के समकालीन लेखन से जोड़ दिया। आज अगर पाश, लालसिंह दिल और सुरजीत पातर हमें हिन्दी के कवि लगते हैं तो इसमें पहल का बड़ा योगदान है। भारतीय-भाषाओं के अतिरिक्त पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे पड़ोसी मुल्कों के समकालीन लेखन से पहल ने हमें परिचित कराया। 1980 और 1989 में निकले पहल के दो कविता विशेषांकों ने हिन्दी की समकालीन कविता की दिशा-दशा निर्धारित की । हिन्दी में समकालीन कविता के ये सर्वश्रेष्ठ विशेषांक हैं।

पहल में छपी कोई एक यादगार कहानी, एक मौलिक वैचारिक लेख का नाम लेने की धृष्टता मैं नहीं करूँगा, क्योंकि यह सवाल नामवरजी ने अपने छोटे भाई काशीनाथ सिंह से पूछा था । ज्ञानरंजन ने अक्सर पहल में सम्पादकीय नहीं लिखे लेकिन पहल के एक-एक पृष्ठ पर ज्ञानरंजन के सम्पादन की छाप है। साहित्यिक पत्रकारिता की दृष्टि से देखें तो ज्ञानरंजन आज़ादी के बाद के सर्वश्रेष्ठ सम्पादक ठहरेंगे। नए लेखकों को बनाने में, एक नई साहित्य भाषा विकसित करने में, उनका योगदान महावीर प्रसाद द्विवेदी के समकक्ष ठहरेगा। एक सम्पादक के रूप में ज्ञानरंजन हमेशा रणक्षेत्र में खड़े नज़र आते हैं। आज़ादी के बाद एक ख़ास मक़सद से की गई मिशनरी पत्रकारिता का पहल पहला और सम्भवतः अंतिम उदाहरण है।

यहाँ एक व्यक्तिगत दृष्टांत देना अनुचित नहीं होगा क्यों कि ये मुस्तनद है । 1989 के पहल कविता विशेषांक में मेरी कविताएँ प्रकाशित हुईं थीं और 1990 में मेरा कविता-संग्रह ‘बढ़ई का बेटा’ प्रकाशित हुआ था । ज्ञानजी से थोड़ा-बहुत पत्राचार था । इसके बाद साहित्य की निर्मम, कुटिल और कृतघ्न दुनिया से मैनें कई बार भागने की कोशिशें कीं । ऐसे ही एक निर्वासन के दिन मैं बाड़मेर के सीमांत पर बिता रहा था कि एक दिन डाक से पहल का नया अंक मिला । अगरतला, पटना, जयपुर । कभी एक पैसा मैंने पहल को नहीं भेजा लेकिन हर बार मेरे नए पते पर पहल का अंक पहुंच जाता । पता नहीं ज्ञानजी को कहाँ से ख़बर लगती थी । पहल ने मेरा पीछा कभी नहीं छोड़ा । आज अगर मैं साहित्य-संग्राम का एक छोटा-मोटा सिपाही बना हुआ हूँ तो इसमें पहल का भी योगदान है अन्यथा निश्चय ही मैं बाउल-गायकों में शामिल होकर चिलम में निर्वाण तलाश करता।

पहल से किसी की भी तुलना नहीं की जा सकती । मारवाड़ी सेठों, सेठानियों के चंदे से चलने वाली हंस पत्रिका के सम्पादक राजेन्द्र यादव ने कहा कि जिन पत्रिकाओं की रचनात्मकता का स्रोत टूट जाता है, वे बन्द होने को अभिशप्त होती हैं । जाहिर है हंस और पहल की तुलना बेमेल है । पहल पुस्तक है जबकि हंस पत्रिका । हंस हर महीने रद्दी में बिकती है जबकि पहल के अंक दुर्लभ किताबों की तरह लोगों ने सम्भाल कर रखे हुए हैं।

ऐसा नहीं कि पहल के हिस्से आलोचनाएँ नहीं आईं । कहा गया कि अखिल भारतीय सेवा के जितने अधिकारियों को पहल ने लेखक बनाया उतना किसी ने नहीं । ज्ञानरंजन की सम्पादकीय मनमानी की भी आलोचना हुई । आठवें-दशक के कवियों की परवरिश पहल-आश्रम में ही हुई । आलोचना से पहल के महत्व पर ही प्रकाश पड़ता है। किसी दूसरे हाथों में देने की मनाही के साथ अब यदि पहल पत्रिका बन्द हो रही है तो इसका अर्थ यही है कि ज्ञानरंजन पहल को किसी व्यावसायिक-ब्रांड में नहीं बदलना चाहते । जिस पत्रिका को उन्होंने अपने ख़ून-पसीने से सींचा है उसे वे अपने सामने ही नष्ट होते देखना चाहते हैं और यह उचित ही है क्योंकि सरस्वती का महावीर प्रसाद द्विवेदी के बाद और अभी हाल में हंस का राजेन्द्र यादव के बाद जो हश्र हुआ है, वह सबके सामने है।

ज्ञानरंजन ने एक सम्पादक के रूप में पिछले चालीस-वर्षों में जो पत्र लिखे हैं उनका यदि भविष्य में संकलन हुआ तो यह एक ज़रूरी और महत्वपूर्ण दस्तावेज़ होगा । ये हिन्दी के आख़िरी पत्र भी हो सकते हैं।

ज्ञानरंजन को हम एक ऐसे सम्पादक के रूप में याद नहीं करेंगे जो पत्रिका की कमाई से शोफर-ड्रिवन गाड़ी से चलता था बल्कि वे एक ऐसे सम्पादक के रूप में याद किए जाते रहेंगे जिन्होंने मनुष्यता के पक्ष में फ़ासीवाद, साम्प्रदायिकता, पूंजीवाद, और बाज़ारवाद से अनथक संघर्ष किया और जो पहल के हर लिफ़ाफ़े पर अपने हाथ से पता लिखते थे।

इसीलिए जैसा कि पहले कहा जा चुका है – पहल की किसी अन्य पत्रिका से और ज्ञानरंजन की किसी अन्य सम्पादक से तुलना निरर्थक है- क्योंकि ज्ञानरंजन ने पहल के माध्यम से जो किया, वह कोई और कारोबार था!

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