इंद्रेश मैखुरी-
जय भारत टीवी के पत्रकार हेम भट्ट की पत्नी का बयान सुनिए. वे कह रही हैं कि सुबह सवा चार बजे, सात- आठ लोग उनके घर पर आए और उनमें से केवल एक वर्दी में था. बाकी सब गुंडे टाइप के ही लग रहे थे. हेम भट्ट के साथ मारपीट करने का आरोप भी वे लगा रही हैं.
मुख्यमंत्री जी, डीजीपी साहेब और एसएसपी महोदय – ऐसी क्या आफत आ गयी थी कि एक वर्दी में और बाकी बिना वर्दी के, मुंह अंधेरे हेम भट्ट के घर में घुसे, उनसे मारपीट की और उन्हें उठा ले गए? क्या हेम भट्ट कोई दुर्दांत अपराधी हैं? बिना वर्दी, पहचान छुपा कर हेम भट्ट के घर में घुसने का मंतव्य क्या था? जो बिना वर्दी वाले थे, क्या वे पुलिस वाले ही थे या फिर जैसा हेम भट्ट की पत्नी आशंका प्रकट कर रही हैं- पुलिस अपने साथ गुंडे लेकर गयी थी?
वर्दी वाले और बिना वर्दी वालों की पहचान सार्वजनिक की जानी चाहिए. यह पूरा घटनाक्रम पूछताछ के लिए किया गया तो नहीं लगता है. पूछताछ के लिए होता तो पुलिस नोटिस देकर बुला सकती थी.
यह सारी कार्रवाई तानाशाहीपूर्ण और पुलिसिया गुंडागर्दी का नमूना है. इस प्रकरण में संलिप्त पुलिस कर्मियों के खिलाफ कठोर दंडात्मक कार्यवाही की जानी चाहिए. मुख्यमंत्री इस बर्बर, अलोकतांत्रिक और तानाशाही रवैये की लिए सार्वजनिक माफी मांगें और सुनिश्चित करें कि भविष्य में ऐसा नहीं होगा.
पत्रकार हेम भट्ट को तत्काल रिहा किया जाए.
धर्मेंद्र रावत-
देहरादून में पत्रकार हेम भट्ट को पुलिस द्वारा पूछताछ के लिए ले जाने का मामला लगातार चर्चा में है। यह पूरा मामला 20 हजार रुपये के इनामी अभियुक्त प्रदीप सकलानी से जुड़ी जांच के बाद सामने आया है।

पुलिस के अनुसार, प्रदीप सकलानी के खिलाफ जनपद के विभिन्न थानों में जमीन से संबंधित धोखाधड़ी के 26 से अधिक मुकदमे दर्ज हैं, जबकि दो दर्जन से अधिक चेक बाउंस के मामले अलग-अलग न्यायालयों में विचाराधीन हैं। बताया गया है कि वह नेहरू कॉलोनी के तीन और रायपुर थाने के एक मामले में वांछित था। फिलहाल उसे गिरफ्तार कर न्यायिक अभिरक्षा में जेल भेजा गया है।
पुलिस का कहना है कि पूछताछ के दौरान प्रदीप सकलानी ने कई लोगों के नाम बताए, जिन पर कथित रूप से धोखाधड़ी में सहयोग करने, पुलिस कार्रवाई से बचाने और मामले को रफा-दफा कराने में संपर्क में रहने के आरोप हैं। इसी क्रम में पत्रकार हेम भट्ट का नाम सामने आने के बाद उन्हें पूछताछ के लिए बुलाया गया।
लेकिन अब कई सवाल उठ रहे हैं। आखिर ऐसी क्या आपात स्थिति थी कि हेम भट्ट के घर सुबह 4 बजे पुलिस पहुंची? क्या उन्हें पहले नोटिस या समन जारी कर पूछताछ के लिए नहीं बुलाया जा सकता था? यदि किसी आरोपी द्वारा किसी का नाम लेने मात्र से इस तरह की कार्रवाई होती है, तो क्या यह प्रक्रिया हर नागरिक के अधिकारों और कानून की पारदर्शिता पर सवाल नहीं खड़े करती?
कार्रवाई के दौरान परिवार के साथ कथित अभद्रता और फोन ले जाने जैसे आरोपों पर police क्या स्पष्टीकरण देगी? हेम भट्ट को कहाँ ले जाया गया, उनसे किस आधार पर पूछताछ की जा रही है और क्या पूरी प्रक्रिया कानूनी प्रोटोकॉल के तहत हुई — इन सभी सवालों के जवाब अब जनता जानना चाहती है।
हालांकि, पुलिस की ओर से कहा गया है कि मामले की जांच जारी है और जांच पूरी होने तक किसी भी व्यक्ति को दोषी मानना उचित नहीं होगा।
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