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आज के अखबार : इंडियन एक्सप्रेस की खबर बताती है कि अखबारों में ‘राजा का बाजा’ ही बजता रहा है

संजय कुमार सिंह

वैसे तो आज आज ज्यादातर अखबारों में अफस्पा की वापसी और दिल्ली में प्रदूषण ही लीड और सेकेंड लीड है पर अखबारों का भाजपा के प्रचार में लगा होना भी स्पष्ट है। दि एशियन एज आज अकेला अखबार है जिसने प्रधानमंत्री के बयान, जो लोकसभा चुनाव के समय से कांग्रेस की आलोचना करने वाला ही होता है, को लीड बनाया है और चुनाव आयोग ना ऐसे बयानों को रोक पा रहा है और न प्रधानमंत्री अपने स्तर योग्य कोई मसाला ढूंढ़ पा रहे हैं। जो भी हो, उन्होंने कहा है, “जम्मू व कश्मीर में कांग्रेस अलग संविधान और 370 चाहती है”। यहां राहुल गांधी का कहा सही लग रहा है कि प्रधानमंत्री ने संविधान को पढ़ा ही नहीं है। पर वह अलग मुद्दा है। वैसे, प्रधानमंत्री के चुनाव प्रचार से राहुल गांधी के इन आरोपों में दम लगता है कि प्रधानमंत्री के सेफ रहने के लिए ही उनका सत्ता में बने रहना जरूरी है और इसीलिए उनके खास चुनाव प्रचार की जरूरत है। इस कारण अब वे देश सेवा (जो भी करते रहे) छोड़कर चुनाव प्रचार को ज्यादा महत्व दे रहे हैं जबकि चुनाव प्रचार में कहने के लिए उनके पास कुछ खास है ही नहीं। यह सब अखबारों की खबरों से ही लगता है, आइये देखते हैं।   

इंडियन एक्सप्रेस में आज छपी श्याम लाल यादव की खबर बताती है कि उत्तर प्रदेश विधानसभा में नौकरी के लिए परीक्षा के बाद कुल उपलब्ध नौकरियों का पांचवां हिस्सा वीवीआईपी के बच्चों को मिला। इनमें विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष, प्रिंसिपल सेक्रेट्री के बच्चे शामिल हैं। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि यह घोटाले से कम नहीं है और सैकड़ों नियुक्तियां अवैध ढंग से हुई हैं। उस समय के विधानसभा अध्यक्ष ने कहा है कि उनकी कोई भूमिका नहीं है और सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई की जांच रुकवा दी है। मामले में सुनवाई जनवरी 2025 में होगी। नेता अगर अपने बच्चों के लिए ही व्यवस्था करें तो जो भी मौका पायेगा बहती गंगा में हाथ तो धोयेगा ही। एक अलग खबर में बताया गया है कि टेस्ट लेने वाली फर्मों के मालिकों का पेपर ट्रेल संदिग्ध है और उन्हें गिरफ्तार किये जाने का भी रिकार्ड है। नौकरी पाने वाले वीवीआईपी (के) बच्चों में ऐसी फर्म के मालिकों के पांच रिश्तेदार भी है। खबर के अनुसार कुल 186 पदों के लिए विज्ञापन निकला था। इसके लिए 2.5 लाख आवेदन प्राप्त होने का अनुमान है। इनमें चुने गए लोगों में 38 वीवीआईपी के रिश्तेदार हैं। यहां यह उल्लेखनीय है कि आज जब ज्यादातर अच्छे पत्रकार बेरोजगार (उम्र निकलने के कारण भी) हैं और अपने संस्थानों को समय से पहले अलविदा कह चुके हैं तो श्याम लाल यादव उन लोगों में से हैं जो पहले की तरह खबर लिखते रहते हैं और शायद इसीलिए अभी भी इंडियन एक्सप्रेस में टिके हुए हैं।

कहने की जरूरत नहीं है कि मामला पुराना है और आज छपा है क्योंकि श्याम लाल यादव और इंडियन एक्सप्रेस अपनी पड़ताल आज पूरी कर पाये होंगे। पर बाकी मीडिया संस्थान और इनमें सरकारी ही नहीं वो संस्थान भी शामिल हैं जिन्हें सरकारी सेठ ने खरीद लिया है, क्या कर रहे हैं? उन्हें ऐसी खबरें क्यों नहीं मिलती हैं और नहीं मिलती हैं तो राजा का बाजा बजाने के लिए ही बाजार में रहने की क्या जरूरत है? इंडियन एक्सप्रेस सरकार का समर्थन करते हुए भी ऐसी पत्रकारिता या खबरें कर पा रहा है तो उसका कारण समझना मुश्किल नहीं है और पहले बताया भी जा चुका है। अब अगर मीडिया संस्थान पहले की तरह काम नहीं कर रहे हैं और स्वतंत्र नहीं हैं तो यह विकास नहीं है और ना ही अच्छे दिन है। पाठकों को इसे समझने की जरूरत है। इसीलिए रोज अखबारों की लीड सबसे आसान खबर होती है और लीड लायक खबरें करवाई नहीं जाती हैं। यह गौर करने वाली बात है कि भाजपा जब सत्ता में नहीं थी तो भाजपा के लोग अच्छी पत्रकारिता के लिए जाने जाते थे (अरुण शौरी) और अच्छी किताबें भी लिखते थे (जीवीएवल नरसिम्ह राव) और अब जब भाजपा सत्ता में नहीं है तो अरुण शौरी भले बुजुर्ग हो गये, जीवीएल नरसिम्हन (60) का भी पता नहीं है।

आकार पटेल को उनकी किताब आने के बाद परेशान किया गया और दो पूर्व सेना प्रमुखों की किताबें रुकी पड़ी हैं। इमरजेंसी पर ही नहीं ईवीएम पर (के समर्थन में) 2019 तक किताबें आई हैं। कुल मिलाकर, पूरा इको सिस्टम भाजपा और संघ परिवार के प्रचार और सेवा में लगा है। उसमें प्रदूषण रोकने के लिए कुछ नहीं हो रहा है। विदेशी चंदे से संबंधित कानून के कारण कई गैर सरकारी संगठन समाज सेवा का अपना काम नहीं कर पा रहे हैं और काला धन शेल कंपनियों में न लगे उसके लिए लाखों शेल कंपनियां बंद कराने के बावजूद अदाणी की कंपनी में 20,000 करोड़ रुपये के निवेश का पता नहीं है और उसका पता लगाने की जरूरत भी नहीं समझी जा रही है। कौन बचा रहा है सबको पता है लेकिन उसके खिलाफ कार्रवाई भी नहीं हो रही है और पूरी सरकार चुनाव लड़ने में ही नहीं किसी भी तरह जीतने में लगी है। आइये समझें कैसे?   

हिन्दुस्तान टाइम्स में आज की लीड दिल्ली में प्रदूषण की खबर है और अच्छे से छपी है लेकिन पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर नितिन गडकरी के हवाले से कहा गया है कि सामाजिक आर्थिक बराबरी महत्वपूर्ण है, लेकिन जाति आधार पर बंटवारा नहीं। कहने की जरूरत नहीं है कि यह महाराष्ट्र चुनाव के लिए भाजपा का प्रचार है और अखबार ने बताया है कि वे 22वें हिन्दुस्तान टाइम्स लीडरशिप समिट के एक ऑनलाइन सत्र में बोल रहे थे। इसमें उन्होंने स्वीकार किया कि इस बार की गर्मियों में राष्ट्रीय चुनाव के दौरान विपक्ष लोगों के बीच यह समझ फैलाने में सफल रहा कि भाजपा संविधान बदलना चाहती है और पिछड़ी जाति व अनुसूचित जन जाति के लोगों को मिलने वाले आरक्षण के लाभ खत्म करना चाहती है। पर यह तबकी बात है अब महाराष्ट्र के लोग जानते हैं कि वह ऐसा नहीं करने जा रही है। उन्होंने कहा है कि जातिवार जनगणना बराबरी का समाज तैयार करने का तरीका नहीं है। इसके बाद उन्होंने अपने निजी विचार बताये हैं पर महत्वपूर्ण यह है कि जातिवार जनगणना के बारे में राहुल गांधी क्या कह रहे हैं उनकी राय क्या है वह किसी अखबार ने जनता को बताया? आज हिन्दुस्तान टाइम्स समिट के ऑनलाइन सेशन का यह प्रचार राहुल गांधी की बात बताये बगैर उन्हें गलत साबित करने की कोशिश करता लगता है। मन की बात करने वाली सरकार से यह नहीं पूछा गया कि आपने अपने इसी उच्च विचार को लागू करने के लिए 10 साल क्या किया?

यही नहीं, “ना जात पर ना पात पर मोहर लगेगी हाथ पर” के बाद राहुल गांधी को जातिवार जनगणना की बात क्यों करनी पड़ रही है? जानने वाले जानते हैं और संक्षेप में मैं उसका राजनीतिक कारण बता दूं तो वह यह कि भाजपा ने हिन्दू मुसलमान करके सत्ता तो हथिया ली। उसमें मुल्लों और पंचर बनाने वालों को कसने जैसे प्रचार के साथ न सिर्फ घर में घुस कर मांस की जांच की गई बिरयानी बेचने वालों को इतना परेशान किया गया कि अब बिरियानी खाना मुश्किल ही नहीं महंगा भी हो गया है। चलती ट्रेन में नाम पूछकर सरकारी कमर्चारी ने सरकारी गोली से नागरिकों की जान ली। ऐसे में राहुल गांधी ने बताया कि हिन्दुओं को खुश करने वाली सरकार असल में अपनी सत्ता सुरक्षित कर रही है गरीब-पिछड़ों की भलाई के लिए कुछ नहीं किया गया है। लोगों ने इसे समझा और इसका असर हुआ इसलिए भाजपा (और प्रधान प्रचारक नरेन्द्र मोदी) की परेशानी छिपाये नहीं छिप रही है। भाजपा न सिर्फ हिन्दू मुसलमान करके चुनाव जीतती रही है, चुनाव जीतने के किसी उपाय को नहीं छोड़ती है और इसमें ईवीएम शामिल है। इसीलिए, लोकसभा चुनाव में सीटें कम हुईं तो प्रधानमंत्री ने कहानी सुनाई, मैंने पूछा ईवीएम जिन्दा है कि मर गया। इस तरह, परोक्ष रूप से उन्होंने कह दिया कि ईवीएम से चुनाव जीते जाते तो भाजपा इतनी सीटें हारतीं? सच्चाई यह है कि ईवीएम से कुछ वोट बढ़ाये और विपक्ष के कम किये जा सकते हैं हमेशा जीतना संभव नहीं है। हालांकि यह अलग मुद्दा है।

जहां तक जातिवार जनगणना और संविधान बदलने की बात है, हिन्दू मुसलमान करना और उसका परिष्कृत रूप एक हैं तो सेफ हैं – आदर्श आचार संहिता के खिलाफ है। जाति धर्म के नाम पर गाली देने वाले को गिरफ्तार किया जाना चाहिये पर मंत्री बना दिये जाने का उदाहरण है इसलिए साबित कुछ करना नहीं है सब दिख रहा है भले अखबार वाले बता नहीं रहे हैं या छिपा रहे हैं। स्थिति यह है कि चुनाव आयोग तो छोड़िये सुप्रीम कोर्ट भी आतिशबाजी रोकने के अपने आदेश को लागू नहीं करवा पाया और पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि उन्हें सुबह की अपनी सैर बंद करनी पड़ी। ऐसे समय में राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री के कहे का जवाब दिया जो आज सिर्फ द टेलीग्राफ में कोट है। उन्होंने कहा है, मोदी जी को लगता है कि संविधान की जो प्रति मैं रखता हूं उसमें कोरे पन्ने हैं क्योंकि इसमें जो है उसकी उन्हें कोई जानकारी नहीं है। उन्होंने इसे कभी पढ़ा ही नहीं है। इसके मुकाबले प्रधानमंत्री का कहा जो कुछ आज छपा है उसमें एक हिन्दुस्तान टाइम्स के अधपन्ने पर है, हरियाणा के बाद महाराष्ट्र कांग्रेस के सपने चूर करेगा।

सवाल पैदा होता है कि ऐसा कैसे और क्यूं होगा। अगर भाजपा और उसकी डबल इंजन की सरकार ने अच्छा काम किया होता तो इसकी गारंटी हो सकती थी पर मोदी की गारंटी के बावजूद लोकसभा चुनाव में भाजपा की सीटें कम हुई हैं। ऐसे में अब सपने चूर होने का आधार अपना काम नहीं है, उसका उल्लेख नहीं है तो क्या ईवीएम है? विपक्ष हरियाणा में हारने का कारण ईवीएम को बता रहा है प्रधानमंत्री जीतने का क्या कारण बता रहे हैं? पुरानी स्थितियों से लगता है कि भाजपा चुनाव हारने के लिए तैयार थी। यही ईवीएम मर गया कि जिन्दा है के समय कही गई उनकी बात से लगता है और फिर हरियाणा में आश्चर्यजनक जीत का कारण स्पष्ट नहीं है तो प्रधानमंत्री महाराष्ट्र में जीतने का दावा किस आधार पर कर सकते हैं और इसे पहले पन्ने पर छाने का आधार क्या हो सकता है? दूसरी ओर, विपक्ष ने हरियाणा में हार का कारण ईवएम को बताया गया है। चुनाव आयोग का जवाब संतोषजनक नहीं है और हारने पर प्रधानमंत्री ने ईवीएम की याद दिलाई थी और अब यह कहकर उसे भुलाना चाहते हैं? ईवीएम का प्रचार या बचाव प्रधानमंत्री का काम नहीं है। विपक्ष में रहते हुए भाजपा ने जब इसका विरोध किया था तब अब समर्थन क्यों कर रही है। क्या इसके विरोध को निराधार मान लिया जाये?

रिपोर्टिंग के एक और पक्षपात को बताने के लिए बता दूं कि आज नवभारत टाइम्स की एक खबर है, अजित पवार ने अडानी पर खोला क्या राज कि महाराष्ट्र में घमासान, कूदे राहुल गांधी, देवेंद्र फडणवीस और शरद पवार। इस खबर के अनुसार, अजित पवार के एक बयान से विवाद शुरू हुआ। उन्होंने दावा किया था कि अमित शाह और शरद पवार की मुलाकात दिल्ली में अदाणी की मौजूदगी में हुई थी। इसके बाद महा विकास अघाड़ी ने मौके को लपक लिया और बीजेपी पर निशाना साधना शुरू कर दिया। बीजेपी को सफाई देनी पड़ी और अजित पवार अपने बयान से पलट गए। आप जानते हैं कि महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के लिए वोटिंग 20 नवंबर को है और चुनाव से पहले सियासत गरमाती ही है। इस बार इसके केंद्र में प्रधानमंत्री के गैरराजनीतिक मित्र अदाणी हैं। राहुल गांधी ने कल नांदेड़ की जनसभा में कहा था, ‘ये महाराष्ट्र के लोगों की नहीं, अदाणी की सरकार है’। आप इसके राजनीतिक मायने समझ सकते हैं और यह अजीत पवार के बयान के आधार पर कहा गया था।

राहुल गांधी ने यह भी कहा,  महाराष्ट्र में जनता से उनकी सरकार छीनी गई। सरकार गिराने के लिए जो मीटिंग हुई उसमें अदाणी मौजूद थे। मैंने इस खबर का उल्लेख यह बताने के लिए किया है कि आज टाइम्स ऑफ इंडिया में पहले पन्ने पर एक खबर है जो शरद पवार के हवाले से है। इसके अनुसार, बड़े पवार ने कहा है कि अदाणी ने 2019 की वार्ता की मेजबानी की (या बैठक बुलाई, आपूत किया) पर उसमें शामिल नहीं हुए। मैं तो यही कहूंगा कि आपको यकीन हो तो इसपर यकीन कर लीजिये। मुझे यह संभव नहीं लगता है और अगर यकीन ही नहीं करना है तो शरद पवार या अजीत पवार के कहे पर क्यों यकीन किया जाये जब बाद की परिस्थितों से बहुत कुछ स्पष्ट है। ऐसी स्थिति में यह खबर किसी भी तरफ से खबर नहीं है। और तब पहले पन्ने के लायक नहीं है। लेकिन टाइम्स ऑफ इंडिया में है और इसके साथ फडनविस के हवाले से यही बात कही गई है। जाहिर है, मकसद छोटे पवार के खुलासे से हुए नुकसान की भरपाई सुनिश्चित करना हो सकता है।

यूपी में जुड़ेंगे तो जीतेंगे

द हिन्दू में आज छपी एक खबर के अनुसार बंटेंगे तो कटेंगे वाले मुख्यमंत्री के राज्य उत्तर प्रदेश के छात्रों और बच्चों ने साबित कर दिया है कि जुड़ेंगे तो जीतेंगे। राज्य में नारों की यह होड़ तो है ही, द हिन्दू की खबर महत्वपूर्ण है। इसके अनुसार, छात्रों के विरोध के मद्देनजर उत्तर प्रदेश सरकार ने प्रमुख नौकरी की परीक्षा से संबंधित अपने निर्णय वापस ले लिये हैं। उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग कार्यालय ने यूपीपीसीएस का एग्जाम दो शिफ्ट में करवाने का फैसला वापस ले लिया है। वहीं समीक्षा अधिकारी/सहायक समीक्षा अधिकारी परीक्षा -2023 को लेकर कमेटी बनाने की बात कही है। प्रयागराज में आयोग के गेट के सामने 4 दिनों से 20 हजार छात्र डटे थे, इनकी मांग के आगे सरकार को झुकना पड़ा है। धरना दे रहे एक छात्र ने दैनिक भास्कर से बातचीत में इसे ‘आधी जीत’ बताया। उसने कहा, आयोग का नोटिस जारी करना एक छलावा है, ढोंग है। छात्र इस मुद्दे पर अभी भी आयोग के बाहर डटे हुए हैं। भोंपू बजाकर और बोतलें पटक कर हूटिंग कर रहे हैं। छात्र अड़े हैं कि आयोग स्पष्ट फैसला दे।

लाटरी किंग पर छापा

झारखंड में विधानसभा चुनाव का दो में से एक चरण पूरा हो चुका है। आप पढ़ चुके हैं मतदान से एक दिन पहले तथाकथित घुसपैठ मामले में ईडी का छपा पड़ा था। पहले और कल के छापे के बाद अभी तक यह नहीं बताया गया है कि छापे में क्या कुछ खास मिला और क्यों मतदान से पहले छापा मारना जरूरी था या क्यों इसे राजनीतिक छापा नहीं कहा जाये। जो कुछ कहा गया है उसमें भाजपा का कहा ज्यादा है ईडी का कहा नहीं के बराबर है। आज अमर उजाला और द टेलीग्राफ में पहले पन्ने पर खबर है, लाटरी किंग पर छापा। इस खबर के अनुसार ईडी ने गुरुवार को चेन्नई के लाटरी किंग से संबंधित कई ठिकानों पर छापा मारा। अखबारों ने बताया है कि इसने 1300 करोड़ रुपये का कुल चंदा दिया था और यह इलेक्टोरल बांड के जरिये राजनीतिक दलों को दिया गया सबसे बड़ा चंदा है। महाराष्ट्र और झारखंड के चुनावी समय में इस छापे का राजनीतिक महत्व है। पर आज इस खबर को ज्यादा महत्व नहीं मिला है।

मणिपुर के छह थाना क्षेत्रों में एएफएसपीए

इन खबरों के बीच आज अखबारों की लीड मणिपुर के छह थाना क्षेत्रों में एएफएसपीए (अफस्पा) आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर अधिनियम या सशस्त्र बल (विशेषाधिकार) अधिनियम को फिर से लागू कर दिया है। इंडियन एक्सप्रेस में यह छह कॉलम में है। थानाक्षेत्रों में जिरीबाम थाना क्षेत्र भी शामिल है, जहां हाल ही में हिंसा हुई है। यह निर्णय राज्य में सुरक्षा स्थिति की समीक्षा के बाद लिया गया है। प्रभावित क्षेत्र सेकमाई, लामसांग, लामलाई, जिरीबाम, लीमाखोंग और मोइरांग हैं। द टेलीग्राफ की खबर के अनुसार मणिपुर में अफस्पा का जाल बढ़ गया है। सरकार ने इस अधिनियम को 2022 में स्थिति सुधरने के बाद वापस लिया था और अब फिर से लागू कर दिया है। राज्य में जातीय हिंसा में वृद्धि के बाद अफ्सपा लागू करने से नामित अशांत क्षेत्रों में सशस्त्र बलों को तलाशी, गिरफ्तारी और गोली चलाने की बेलगाम शक्ति मिलती है। यह कदम अफस्पा को 31 मार्च 2025 तक बढ़ाता है, का उद्देश्य सुरक्षा बलों को “विद्रोही समूहों” की गतिविधियों का मुकाबला करते हुए इन क्षेत्रों में समन्वित अभियान चलाने और व्यवस्था बहाल करने में सक्षम बनाना है।

फडणविस की स्वीकारोक्ति

इंडियन एक्सप्रेस ने दि एक्सप्रेस इंटरव्यू में महाराष्ट्र भाजपा नेता देंवेन्द्र फडणविस के इंटरव्यू को टॉप पर दो कॉलम में छापा है और इसके जरिये उन्होंने कहा है (आप मानना चाहें तो मान सकते हैं) कि शीर्षक है, भारत जोड़ो यात्रा अराजकतावादियों की एक ताकत है और लोकसभा चुनाव में भाजपा इसका मुकाबला करने में नाकाम रही। उपशीर्षक है, हमने आरएसएस के तहत संगठनों से अपील की और उन्होंने हमें मुकबला करने में ताकत दी। अगर फडणविस ऐसा कह रहे हैं तो प्रधानमंत्री जीतने का दावा किस आदार पर कर रहे हैं, वही जानें। पर मुद्दा यह है कि कांग्रेस या राहुल गांधी को वह प्रचार नहीं मिल रहा है जो मिलना चाहिये। इसमें हेमंत सोरेन और अखिलेश यादव की क्या बात की जाये।

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