Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

सियासत

ईरान युद्ध का असली हाल जानिए : ट्रंप बुरी तरह फँस गए हैं, भारत को भी झेलना पड़ेगा!

मुकेश कुमार-

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प के लिए एक बाद एक बुरी ख़बरें आ रही हैं। वे जितना जंग से निकलना चाह रहे हैं उतना ही फँसते जा रहे हैं। ईरान ने बातचीत के उनके प्रस्ताव को ठुकरा दिया है और अपनी ओर से शर्तें रख दी हैं। ये शर्तें बहुत कड़ी हैं और उन्हें स्वीकार करना हार मानने जैसा होगा।

लेकिन बुरी ख़बरों की फ़ेहरिस्त लंबी होती जा रही है। होरमुज जलडमरू मध्य को बंद हुए अब एक महीने होने जा रहे हैं और तेल की क़ीमतें घटने का नाम नहीं ले रहीं। अमेरिका में ही एक डॉलर से ज़्यादा की बढ़ोतरी हो गई है।

उधर ईरान ने मध्यपूर्व में उसके सभी 13 अमेरिकी अड्डों को तबाह कर दिया है। नौबत ये आ गई है कि अमेरिकी सैनिक होटलों या दूसरी जगहों पर पनाह ले रहे हैं। उसे अपने दो युद्धपोत दूर ले जाने पड़े हैं।

हथियारों की कमी भी पड़ने लगी है। पेंटागन की रिपोर्ट कह रही है कि टामहॉक मिसाइलों की किल्लत होने वाली है। ईरान के मिसाइल और ड्रोन हमलों को रोकने के लिए उसे दूसरी जगहों से हथियार लाने पड़ रहे हैं।

उधर इस्राइल की सेना भी ध्वस्त होती जा रही है। खुद सेना प्रमुख कह चुके हैं कि और सैनिक न मिले तो सेना कोलेप्स कर जाएगी।
और ऐसे में ईरान ने एक और मोर्चा खोल दिया है। उसने यूती विद्रोहियों से भी हमले करवाने शुरू कर दिए हैं। इसके नतीजे घातक हो सकते हैं। यूती रेड सी में जहाज़ों की आवाजाही बंद कर सकते हैं जिससे तेल संकट बढ़ सकता है।

ज़मीनी जंग की बात ट्रम्प ज़रूर कर रहे हैं मगर ऐसा लगता है कि इसके लिए वे हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं। उन्हें डर सता रहा है कि कहीं अमेरिका लंबे समय के लिए न फँस जाए और उसे और जगहों की तरह भागना न पड़ जाए।

ऐसे में ट्रम्प के सामने बहुत कम विकल्प बचे हैं। बल्कि ये कहा जाना चाहिए कि एकमात्र विकल्प यही बता है कि वे ईरान की कुछ शर्तों को मान लें…क्या वे अपनी इज्जत बचाते हुए ऐसा कर सकते हैं…..


रामा शंकर सिंह-

रूस की आणविक पनडुब्बियॉं होर्मुज में पहुँच गई हैं और ईरान की तरफ़ से लड़ने की घोषणा यमन के हौथी सैनिकों व हिज़बुल्ला लड़ाकों ने भी कर दी है।चीनी चाहें तो बगैर युद्ध क्षेत्र में आये ही बड़ी मदद कर सकते हैं , शायद जल्दी ही करेंगें । कारण कि चीन अमरीका को जल्दी ही दीवालिया बनाकर अपने दिये क़र्ज़े में फँसा कर रखेगा ।

दस दिन का एकतरफ़ा युद्ध विराम एक और अमरीकी धोखा है , रोज़ बम दागे जा रहे हैं ईरान पर। ईरान ने युद्ध लम्बा खींच कर अमेरिकी और उसके यार राष्ट्रों की अर्थव्यवस्था को निशाना बनाया है ।

भयानक ऊर्जा संकट आ सकता है कि अब हौथी टुकड़ियों ने अल बाब मंदेब नाम के दूसरे संकरे जहाज़ी रास्ते को अपने नियंत्रण में लेने का इरादा जता दिया है । यह तय हो रहा है कि लड़ाई लम्बी चलेगी कि ईरान अब आर पार की लड़ाई लड़ने के इरादे में है चाहे वो कितनी ही नष्ट होना पड़े लेकिन इज़रायल को नेस्तनाबूद करके रहेगा ।

अमरीकी आंतरिक विरोध बढ़ेगा कि अभी तक इस युद्ध पर 36 ट्रिलियन डॉलर खर्च हो चुका है = 360000000000000 अमरीकी डॉलर । एक ट्रिलियन डॉलर माने 94864200000000रुपया ! हमको समझबै नहीं करेगा! कुछ हफ्तों बाद अमरीकियों को भी समझ नहीं आयेगा और सदी के सबसे दुष्ट असफल युद्धकामी ट्रम्प को पीढ़ियाँ लानत देंगीं ।

भारत में भी भक्त मंडली की आँखें खुलेंगी जल्दी ही कि उनके आराध्य ने क्या कर दिया ! आज पतंजलि व्यापारी रामदेव ने ईरान के पक्ष में बोलना शुरु किया है कि उसका सारा विदेश का हलाल व्यापार इन्हीं खाड़ी देशों में चलता रहा है । भारी चंदा व अनुदान के चलते अभी बहुत सी आँखें बंद ही रहेंगी।


नितिन ठाकुर-

अब ईरान वाली वॉर का फॉलोअप लेते ठीकठाक वक्त हो गया है। जितना समझ आ रहा है वो ये कि इस जंग को खत्म करने का सौभाग्य ट्रंप को नहीं मिलेगा। उसने खामेनेई को सद्दाम या गद्दाफी समझ लिया था जो अपने देशों में पर्याप्त अलोकप्रिय हो चुके थे। वहां विरोध में खड़े होनेवाले संगठन अमेरिका को मिल गए थे। ईरान की स्क्रिप्ट में ये सब गायब है। फिर ईरान की आबादी, ताकत, तंत्र सब कुछ क्रूर नेता में तब्दील हो चुके सद्दाम और अय्याशी के पर्याय के तौर पर देखे जानेवाले गद्दाफी के मुकाबले बड़े और बेहतर रहे। स्ट्रेट ऑफ हॉर्मूज़ को अमेरिका के गले की घंटी बनाने का विकल्प भी उनके पास नहीं था जो ईरानियों के पास है। अब हालत ये है कि ट्रंप दुनिया को बातचीत का आश्वासन देकर स्थितियां सामान्य बनाने का प्रयास कर रहे हैं, ईरानी मीम बनाकर ट्रंप का मज़ाक उड़ा रहे हैं। ईरान के पड़ोसी विचार करने लगे हैं कि अमेरिका के अड्डे अपने यहां रखना सुरक्षा की जगह नुकसान का कारण बनने लगा है तो क्या अब वक्त है कि अपनी सिक्योरिटी के लिए कहीं और देखना चाहिए?

नेतन्याहू की बात अलग है। उनके लिए ये इतिहास सही करने का अवसर है। अपना राजनीतिक अस्तित्व बनाए रखने का भी। उनकी किस्मत से एक अमेरिकी राष्ट्रपति मोसाद के तर्कों पर राज़ी होकर जंग को तैयार हो गया लेकिन नतीजे जैसे आए हैं उसके बाद सोच विचार इज़रायल में चल रहा है। हिज़बुल्ला और हमास बस संगठन थे मगर ईरान एक राष्ट्र है। सारे गणित उलटा सकने की क्षमता दिखानेवाला राष्ट्र।

भारत सरकार की फॉरेन पॉलिसी थोड़ी भ्रम का शिकार रही। जंग के एक दिन पहले नेतन्याहू की बगल में खड़े दिखना कोई रणनीति नहीं हो सकती। ये सिर्फ गलत सलाहकारों की सलाह का नतीजा कहा जा सकता है।

हालांकि अच्छा ये है कि ईरान को लेकर जो कुछ जनसमर्थन और मीडिया का भाव दिखा उसके चलते ईरानी सरकार ने समझा होगा कि भारत इस जंग के पक्ष में नहीं है। पिछले कुछ दिनों में जो तटस्थता सरकार ने दिखाई वो भी ठीक थी। हां कुछ लोग भारत सरकार से स्टैंड की मांग कर रहे हैं लेकिन मुझे नहीं लगा कि अभी किसी स्टैंड का कोई वक्त है। जितना हो सके अमेरिका से दूर दिखना चाहिए। इज़रायल से दोस्ती व्यवहारिक ज़रूरत है पर उन्होंने हमें कभी वेस्ट एशिया की लड़ाई में नहीं खींचा सो अपने को दूरी रखनी चाहिए। वैसे भी जिनके घरों में सिलेंडर और तेल की कमी का खतरा हो उनको ज़्यादा चैंपियन नहीं बनना चाहिए। हमारे पास वेनेजुएला या इराक का तेल नहीं है। बेसिकली ज़रूरत है कि पहले हम अंदर से मज़बूत बनें। बिन मज़बूती स्टैंड लेकर नुकसान उठाने का कोई फायदा नहीं। ये कोई नैतिक युद्ध भी नहीं। दूर से “लड़ो मत लड़ो मत” पहले भी किया है अब भी जारी रखें। खामेनेई की हत्या और बच्चियों की मौत पर शोक ज़ाहिर करनेवाला टाइम तो पहले ही गंवा दिया, सो अब जो है वो है। अगर तब किया होता तो हम ट्रंप को एम्बेरेस करके उस हरकत का बदला लेते जो उसने भारत पाकिस्तान वाली झड़प के दौरान सीज़फायर का क्रेडिट लेने के लिए की थी।


सुभाष सिंह सुमन-

हमारी मुद्रा अभी फ्री फॉल में है। ऐसा लग रहा है, जैसे पृथ्वी का सारा गुरुत्वाकर्षण हमारे रुपये पर ही लगा हुआ है। पिछले सप्ताह 92 टूटा, 93 टूटा। इस सप्ताह 94 टूटा और 95 बहुत दूर नहीं लग रहा है। कल (27 मार्च को) यह 94.81 पर बंद हुआ। बस 19 पैसे और, 95 भी पार हो जायेगा। साल भर पीछे चलें, तो 1 अप्रैल 2025 को 1 डॉलर में 85.60 रुपये आ रहे थे। मतलब एक साल में रुपया 11% गिरा है। इस तरह यह रुपये के इतिहास के सबसे खराब वित्त वर्षों में एक के रूप में दर्ज होने वाला है। अमेरिका-इजरायल ने ईरान पर अटैक किया 28 फरवरी को। उससे एक दिन पहले 27 फरवरी को 1 डॉलर का 91 रुपया था। युद्ध के एक महीने में रुपया 91 से 95 तक गया है। करीब-करीब 4% गिरा है।

अब ये तो हो गयी रुपये की बात। यदि आपने बात इतने पर समाप्त कर दी, तो कुछ लोग बिना आँकड़ों वाली गप्प करने लगेंगे। गप्प जैसे कि अभी तो सबकी करेंसी गिर रही है, बाहर के युद्ध में हम कुछ नहीं कर सकते हैं वगैरह। सरकार ने यदि पक्ष रख दिया, तो वित्त मंत्री का पेट-डॉयलॉग आयेगा:- हमारे फंडामेंटल्स बहुत मजबूत हैं।

लेकिन, हम आज सिनेमा पूरी देखेंगे। हमारा पड़ोसी है पाकिस्तान। 1 साल में उसकी करेंसी डॉलर के सामने ऑलमोस्ट स्टेबल दिख रही है। ईरान युद्ध शुरू होने के बाद से, मतलब 1 महीने में तो यह 0.36% मजबूत ही हो गयी है। चीन का युआन 1 साल में करीब 5% गिरा है, लेकिन ईरान युद्ध शुरू होने के बाद से 0.78% चढ़ा है। बांग्लादेशी टका साल भर में सिर्फ 1% और 1 महीने में बस 0.44% गिरा है। जापानी येन साल भर में 7% और 1 महीने में 2.5% गिरा है। कोरियाई वॉन साल भर में 2.5% और 1 महीने में 4.75% गिरा है।

मतलब, गिरने में हमारी मुद्रा का कोई होड़ नहीं है। हमने गिरने में एशिया टॉप किया है। पूरे वित्त वर्ष के भी टॉपर हैं और ईरान युद्ध शुरू होने के बाद भी टॉपर हैं। टॉपर भी इतने मार्जिन से हैं कि कोई टक्कर देने की हिम्मत नहीं कर पा रहा है।

बाहर की परिस्थितियाँ सबके लिए एक जैसी दिख रही हैं। लगभग सारे एशियाई देश (जिनकी मुद्राओं का जिक्र है) तेल-गैस खरीदते ही हैं ज्यादातर। ईरान युद्ध ने सबको परेशान किया है। सबका सबसे ज्यादा तेल-गैस होर्मुज के ही रास्ते आता है। चीन तो ईरानी तेल का सबसे बड़ा खरीदार है। युआन को तो इस हिसाब से 15-20% गिर जाना चाहिए था। पाकिस्तान तो भीख पर पल रहा है। उसकी करेंसी तो और 25-50% गिरना चाहिए था। लेकिन गिर हम रहे हैं, जबकि लेजर-आई डिप्लोमेसी के हिसाब से दुनिया को सबसे अच्छे से हम ही डील कर रहे हैं।

फिर दिक्कत कहाँ आ रही है? साफ-सीधी बात है, दिक्कत बाहर नहीं है। भीतर ही है। धूल आईने पर है ही नहीं, चेहरे पर है। बाहर की कुछ दिक्कत गिनायी जा सकती है, लेकिन उसकी जिम्मेदारी भी घूम-फिरकर आईने की जगह चेहरे पर ही आयेगी। हम अपनी अद्भुत लेजर-आई डिप्लोमेसी के दम पर दुनिया में सबसे महँगा तेल खरीद हैं। लेकिन यह कारण तो ताजा है। हमारी गिरावट तो इसके हिसाब से प्राचीन लग रही है।

मुझे लगता है, अब समय आ गया है कि हम उस सफेद बालों वाले महान अर्थशास्त्री को खोजकर लायें, जो 2014 से पहले कमजोर रुपये का मतलब कमजोर प्रधानमंत्री बताया करता था। अब रुपये की इज्जत को सिर्फ वही बहादुर बचा सकता है। तो बहादुर का आह्वान करते हुए सब लोग नारा लगायें:- ‘‘बहुत हुआ रुपये का बंटाधार, अबकी बार बहादुर सरकार’’।

(नीचे समझने में आसानी के लिए ग्राफ लगा रहा हूँ। ग्राफ बनाने का श्रेय चैटजीपीटी का। मैंने भाई को कहा कि 1 अप्रैल 2025 के दिन डॉलर के सामने इन मुद्राओं के भाव को 100 का बेस दो, फिर उसके बाद अब तक की चाल को लाइन ग्राफ में दिखा दो। भाई ने ये करके दे दिया। भाई ने काम अच्छा किया है।)

Local News Community
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन