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सियासत

लोग मर रहे थे तब भगवान जी क्या कर रहे थे?

नीरेंद्र नागर-

जब कुंभ मेले में भगदड़ मच रही थी और भक्त कुचले जा रहे थे तब भगवान जी क्या कर रहे थे? सो रहे थे?

अपने भक्त हाथी को मगरमच्छ के जबड़े से बचाने जो भगवान दौड़े-दौड़े चले आए थे, वे परसों रात क्या कर रहे थे?

और यदि यह सब भगवान जी की इच्छा से हो रहा था (होइहि सोइ जो राम रचि राखा.. उसकी मर्ज़ी के बिना पत्ता भी नहीं हिलता) तो कुंभ में हुई मौतों के लिए शोक कैसा?

ये वे प्रश्न हैं जो इस दुर्घटना के बाद हर आस्तिक व्यक्ति और ख़ासकर कुंभ स्नान के लिए जानेवालोँ के मन में पैदा होने चाहिए। लेकिन नहीं होते। क्योंकि यदि वे इतने ही अक़्लमंद और तर्कशील होते तो कुंभ जाते ही क्यों? क्या वे इतनी-सी बात नहीं समझते कि गंगा या किसी भी नदी में नहाने से यदि पुण्य मिलता तो गंगा में रहनेवाली सभी मछलियाँ स्वर्ग नहीं चली जातीं।

बहुत पहले स्कूल में हिंदी साहित्य का इतिहास की किताब में ये पंक्तियाँ पढ़ी थीं – गंगा में नहाए कहो कि नर तरिगे, मछरी न तरि जात जाके पानी में घर है। उसी दिन यह दलील इस तरह दिमाग़ में घुसी कि जीवन में फिर कभी इन धार्मिक क़िस्से-कहानियों में नहीं उलझा। काश बाक़ी लोग भी इतने ही तार्किक होते तो यह दुनिया कितनी बेहतर होती। न धार्मिक नफ़रत होती, न धर्मयुद्ध, न दंगे-फ़साद होते।

लेखक नीरेंद्र नागर लंबे समय तक नवभारत टाइम्स दिल्ली में एडिटर रहे हैं।

कुछ प्रतिक्रियाएं-

Pradeep– The famed psychoanalyst Sigmund Freud described religion as a form of wish fulfillment. However, modern psychology recognizes that religion can play an important role in an individual’s life and experiences and can even improve health and well-being. In fact, studies have shown that religion can help people develop healthy habits, regulate their behaviors, and understand their emotions—all factors that can affect your mental health.

ये बात कई रिसर्च में कही जा चुकी है। उन्हीं स्टडी में ये भी आया है कि नास्तिकों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, क्यों कि वे कुछ मामलों में मानसिक विकार से पीड़ित होते हैं।

और एक बात सर…
इस तरह की बातें सिर्फ सनातन धर्म पर ही हो सकती है। यहां दयालुता का भाव होता है। कुछ और धर्म भी हैं, जहाँ इतना लिखने पर ईशा निंदा जैसा कानून लगता है।

Suresh Trivedi– आपके विचारों से सहमत नहीं। कुम्भ पर यह एकतरफा टिप्पणी करके उसे गलत ठहराना सही नहीं। यह एक आस्था है जो हजारों वर्षों ऋषि मुनियों के समय से है।
भारतीय ज्योतिष व समय राशि की गणना विश्व मे सबसे पुरानी है व विश्व के महानतम वैज्ञानिक शोध में सर्व प्रथम इसको केंद्र में रखकर शोध किया जाता है। आपकी टिप्पणी से लगता है कि कुम्भ में जाने वाले प्रत्येक दुष्विचारो वाले लोग है जो वहा जाकर पाप धोते है….. करोड़ो की संख्या में लोग आते है प्रशासन द्वारा इतनी व्यवस्था संतो का इस अवसर पर आगमन अनायास ही नही किया जाता है। पृथ्वी पर जन्म लेने वाले प्रत्येक व्यक्ति को संस्कार शिक्षा मिलने के बाद कोई गलत कार्य करे, तो यह वह स्वयं जिम्मेदार है व उसकी सजा भी समय का चक्र अवश्य देता है। साधु संत यह नही कहते है कि गलत काम करने वाले कुंभ में आओ ओर अपने पाप धो दो। ईश्वर की आस्था आराधना एक प्रेम है जो हमे गलत रास्तो पर जाने से रोकती है, जैसा कि हम अपनी माँ से प्रेम करते है जो अपने बच्चे को गलत संगत गलत रास्ते पर जाने से रोकती है नागर जी, इस विषय पर बहुत कुछ लिखने का मन हो रहा है, यह हिन्दू धर्म को गलत ठहराने वाली बात लगी आपकी क्यो कि आपने इसे सिर्फ एक नजर से देखा है।
क्या कोई गलत काम करे व कुम्भ पाप धोने जाए तो क्या उन्ही के लिए आपने टिप्पणी की, अन्य बातों पर आपकी कोई दृष्टि नही पड़ी व इसके विषय मे बहुत लंबा शोध करने की जरूरत है । हिन्दू धर्म या कोई भी धर्म गलत काम पाप करने वालो के साथ है ही नही तो आपकी यह टिप्पणी समझ से बाहर है। अब तक कुम्भ के विषय पर कुछ नही लिखा था, व भगदड़ मचने व लोगो के मरने व घायल होने की खबर आते ही इस पर आपकी टिप्पणी आना यह सिर्फ एक नजर से ही देखना दर्शता है.। आप इस बारे में विद्धवान है, जानकर भी है, नव भारत टाइम्स के बहुत बड़े पद पर थे, आपके कई विचारों का मैं बहुत सम्मान करता हु, ओर आपका प्रसंसक हु,
आपको किसी प्रकार की ठेस पहुचना मेरा उद्देश्य नही है। बस इस बारे में कुछ विचार मन मे आये सो लिख दिया। धन्यवाद!

Chaitanya Nagar– बिल्कुल कह सकते हैं हज के बारे में भी. यदि ईश्वर है भी तो उसे किसी प्रजाति के सदस्यों के जीने मरने से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. ऐसा ही प्रतीत होता है. और इसमें ईश्वर अल्लाह आया ही कहाँ से? लोग अपने संस्कारों के वेग में आकर इस तरह की जगहों पर पहुँच जाते हैं, और ग़लतियों का परिणाम उन्हें भोगना पड़ता है. ग़लतियाँ किसी की भी हों. ये अलग इशू है.

नास्तिक ऐसी जगहों पर जाने के झमेलों से बचे रहते हैं. उनके हिस्से में कुछ ऐसा दुख ही आता जो स्वाभाविक रूप से बाक़ी मानवता के हिस्से में भी आता है. वह बस इसके वैज्ञानिक आधार को ढूँढ कर उसके दोष ईश्वर वगैरह को नहीं देता.

Dilbag Singh– कुंभ में हुई दुर्घटना दुःखद है यह कहना जरूरी है। इसके बाद मैं यही सोच रहा था कि आप जैसा जागरूक विद्रोही पत्रकार टिप्पणी जरूर करेगा। नवभारत टाइम्स में होते हुए आपने खुलकर यह दिखा दिया था कि आप लकीर के फकीर नहीं, बल्कि तार्किक हैं। अंध आस्था जैसा आपके जीवन मे कुछ नहीं। अनेक लोग आपके विचार जानकर वही घिसे पीटे तर्क देंगे, थोड़ा तिलमिलाएगें मगर मन मसोस कर रह जाएंगे। पिछले बहुत से सालों में अनेक लोगों की मौत हो चुकी है लेकिन व्यवस्था में कोई सुधार नहीं । एक बात स्पष्ट है कि जो एक बात किताबी जान पड़ती है (धर्म एक अफीम) उसके अनेक उदाहरण आने देश मे मिल जाते हैं । किसी को इस बात की परवाह नहीं कि विश्व पटल पर हमारी क्या छवि बन रही है?

Balmukund Sinha– इस तरह की घटना कहीं भी होती है, इसी तरह अलोचना होती है। चाहे मक्का हो या रोम। हज़ ट्रेजेडी गूगल कर के अभी देख लें। सदिओं से लोग कुंभ और हज़ कर रहे हैं। वे सही हैं। उनमें आस्था और श्रद्धा है। लेकिन उसका इंतज़ाम अल्ला या ईश्वर नहीं करता है। उसका इंतज़ाम राजा और राजा के आदमी करते हैं। अलोचना उनकी की जाती है। जैसे नागर जी ने पूछा है कि भगवान् क्या कर रहे थे, उसी तरह से इस्लाम और ईसाई में भी पूछा जाता है। उर्दू साहित्य उठा कर देखिये। आलोचना और सवालों से भरा है। हम ने पढ़ा नहीं, इसका मतलब यह नहीं कि वहाँ यह नहीं पूछा गया। लेकिन नागर जी के सवाल का आशय अलग है। वो यह बताने के लिए है कि ऐसे आयोजन अल्ला या ईश्वर नहीं करते। इसका श्रेय भी नहीं लूटते। हे श्रद्धालु जन, यह जान लो कि अल्ला ईश्वर इस से निरपेक्ष हैं। इसलिए ‘यह कहना बंद करो कि जैसी ईश्वर कि मर्जी’। ईश्वर कुंभ या रोम जाने को नहीं कहता। यह राजा और उसके आदमी कहते हैं। चल, बढ़िया इंतज़ाम है, कोई दिक्कत नहीं होगी। सुरक्षा हम देंगे। आस्था संकीर्ण नहीं होती। धर्म भी संकीर्ण नहीं होता। संकीर्ण तब होता है जब हम राजा के इंतज़ाम की आलोचना से बचाने के लिए मक्का और रोम की गलियों में घुसने लगते हैं। किसी माँ का बेटा या स्त्री का पति मार दिया जाता है, तो क्या वो नहीं कहती कि हे राम, ये तूने क्या किया?

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