दैनिक जागरण से सैकड़ों लोग इसलिए सस्पेंड कर दिए गए क्योंकि वे प्रबंधन से सुप्रीम कोर्ट का आदेश मानने का आग्रह कर रहे हैं

Fourth Pillar : दैनिक जागरण के नोएडा आफिस में मरघट का जो सन्‍नाटा छाया है, उसकी चीत्‍कार दूर-दूर तक सुनाई दे रही है। यह ठीक उसी प्रकार है जैसे संजय (संजय गुप्‍ता नहीं) ने महाभारत से ठीक पहले मरघट का नजारा देख लिया था। धृतराष्‍ट्र के तो आंखें नहीं थीं, लेकिन संजय गुप्‍ता आंख होते हुए भी शकुनी (विष्‍णु त्रिपाठी) के भ्रमजाल में बुरी तरह फंस चुके हैं। पहले चर्चा चली थी कि 40 से 60 फीसदी वेतन बढ़ा कर मजीठिया मामले से फुर्सत पा ली जाए, लेकिन उस पर विष्‍णु त्रिपाठी ने कहा था, 40 फीसदी देंगे तो 60 फीसदी मांगेंगे और 60 फीसदी दे देंगे तो 80 फीसदी मांगेंगे। मतलब सूई के नोक के बराबर भी नहीं देना है। उनका यह गलत आकलन था या जानबूझ कर गलत पेश किया था, ताकि दैनिक जागरण प्रबंधन को लंबे समय तक मूर्ख बनाया जा सके।

आइए, आपको महाभारत काल से निकाल कर कलयुग में ले चलते हैं। दैनिक जागरण के कर्मचारियों ने क्रांति का जो सूत्रपात किया था, वह अब रक्‍तरंजित इतिहास रचने के मुहाने पर है। 180 लोगों को सिर्फ इसलिए निलंबित किया गया है कि वे दैनिक जागरण प्रबंधन से माननीय सुप्रीम कोर्ट का आदेश मानने का आग्रह कर रहे हैं और उसके लिए नई दिल्‍ली स्थित जंतर-मंतर पर धरना-प्रदर्शन के लिए सड़क पर उतर आए हैं। रक्‍तरंजित इतिहास तभी रचा जाता है, जब लोगों के लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमला कर दिया जाता है।

नोएडा-ग्रेटर नोएडा तो वह इलाका है, जहां एक अफवाह पर किसी निर्दोष की जान ले ली जाती है। ऐसा लगता है कि दैनिक जागरण प्रबंधन एक और कत्‍लेआम की तैयारी कर रहा है। उसकी हठवादिता रोकने के लिए उत्‍तर प्रदेश सरकार को सक्रियता दिखानी होगी। कहीं ऐसा न हो कि मोदी की चाल सफल हो जाए और बदनामी समाजवादी पार्टी के हिस्‍से में आ जाए। इन बातों का प्रमाण यह है कि दैनिक जागरण प्रबंधन बुरी तरह से सहम गया है। सीजीएम नीतेंद्र श्रीवास्‍तव, विष्‍णु त्रिपाठी और उनके चमचों के चेहरे की हवाइयां उड़ी हुई हैं। संस्‍थान का परिसर पुलिस छावनी में तब्‍दील हो गया है। पुलिस बल के जवान संस्‍थान के अंदर पेट्रोलिंग करते नजर आ रहे हैं। वे एक-एक कर्मचारी के पास कुछ इस तरह से जा रहे हैं, जैसे वह कर्मचारी नहीं, कोई आतंकी हो। इसे कहते हैं विश्‍वास का बिदा हो जाना।

किसी को यह भरोसा नहीं है कि कल वह अपनी नौकरी गंवाएगा या जिंदगी। इस माहौल ने अंग्रेजी शासन के दुराज या दोहरा शासन की याद दिला दी है। पुलिस के जवान जिनकी सुरक्षा में तैनात किए गए हैं, उन पर पहले से ही जागरण कर्मचारियों पर हमला और छिनैती कराने के आरोप हैं, जिनकी जांच वरिष्‍ठ पुलिस अधिकारी के कार्यालय में लंबित है। सबसे अधिक खतरा उन्‍हें है जिन्‍हें कोई पुलिस सुरक्षा मुहैया नहीं कराई गई है। ये वे कर्मचारी हैं, जिन्‍होंने अपने जमीर को ताक पर रखकर चमचागीरी को ही अपने जीवन का उद्देश्‍य बना लिया है। वे इस समय क्रांतिकारियों की जासूसी करने में लगे हैं। इस बात से क्रांतिकारी अत्‍यधिक खफा हैं। हालांकि कभी-कभी वे क्रांतिकारी जैसा दिखने का नाटक करते हैं, ताकि उनकी जान से खतरा टल जाए। लेकिन क्रांतिकारियों के बीच उनकी पोल खुल गई है। अब वे जगह-जगह फोन करके अपनी सुरक्षा का स्‍तर जानने का प्रयास करने में लगे हैं। ऐसे बेचारों को भगवान ही बचा सकते हैं, पुलिस तो उनके घर जाने से रही।”

फेसबुक पेज ‘फोर्थ पिलर’ से साभार.


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