30 जनवरी 2018…. आज ही की तारीख थी जब बॉम्बे हाई कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश बीजी कोलसे पाटिल ने अपने एक बयान से हंगामा खड़ा कर दिया था। उन्होंने कहा था कि- जस्टिस लोया के दो जज मित्रों की भी हत्या हुई थी, जिसके वो खुद गवाह हैं। लेकिन साल 2018 के बाद जहां तहां कोलसे पाटिल की खबरें छपीं बाकी पूरे मीडिया ने इसे नजरअंदाज कर दिया था। आज जस्टिस कोलसे फिर से एक बार याद में हैं। क्योंकि आज 30 जनवरी 2026 है, पर सवाल वहीं अटका हुआ है कि क्यों आखिर जांच नहीं हुई…
कोलसे पटिल ने अपने वक्तव्य में दावा किया कि लोया की मौत के समय उन्हें 100 करोड़ रुपये का ऑफ़र देने का प्रसंग भी सामने आया था। इसके अलावा उन्होंने यह भी कहा कि न सिर्फ लोया, बल्कि उनके दो न्यायिक साथियों की भी संदिग्ध मौतें हुई हैं।
पाटिल ने आरोप लगाया कि “लोया की मौत की तरह उनके साथ काम कर रहे अन्य नागरिक न्यायाधीश भी अजीब परिस्थितियों में नहीं रहे।” उन्होंने कहा कि एक जज को कोर्ट से भेजा गया, और दूसरे को ट्रेन में मृत पाया गया। इसके अलावा उनके फोन में मिस्ड कॉल्स और संदिग्ध संदेश भी मिले।
पाटिल ने यह भी कहा कि वह खुद इस समय “गवाह” हैं और उनका नंबर अब न्यायमूर्ति कोलसे पटिल है। उन्होंने आगे कहा कि अगर न्याय प्रणाली में सच्चाई नहीं होगी, तो लोगों को न्याय पर भरोसा* नहीं रहेगा।
सूत्र बताते हैं कि जज लोया मामले को लेकर न्यायपालिका और सरकार की भूमिका पर सवाल उठने के कारण यह मामला स्वत: चर्चा का विषय रहा है। पाटिल के बयान ने इस विवाद में फिर से भड़क पैदा कर दी है।
क्या जस्टिस लोया के दो मित्रों की भी हत्या हुई थी और वो जज थे?
जब अपराधी ही दरोगा बन जाएं तो न्याय का दम तोड़ना निश्चित है। न्यायमूर्ति कोलसे पाटिल द्वारा वर्ष 2018 में लगाये इन एक-एक आरोपों को जरा ध्यान से पढ़िए।
यह खबरें आपको गोदी मीडिया कभी नहीं दिखायेगा। रावत, रुपाणी, पवार… लिस्ट लंबी है। -कुणाल शुक्ला, आरटीआई एक्टिविस्ट
जस्टिस बी.एच. लोया की मौत प्रकरण पर एक नजर
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ विशेष न्यायाधीश बी.एच. लोया की 2014 में नागपुर में हुई मौत आज भी मीडिया और न्याय जगत में चर्चा का विषय बनी हुई है। 30 जनवरी के आसपास 2018 में प्रकाशित कई खबरों में यह दावा उठाया गया था कि लोया की मृत्यु संदिग्ध परिस्थितियों में हुई थी और इस मामले में न्यायपालिका से लेकर सेवानिवृत्त जजों की संदिग्ध मौतों का हवाला देते हुए यह सवाल उठाया गया कि क्या लोया की मौत “प्राकृतिक” थी या फिर कुछ और।
उन खबरों में यह भी कहा गया था कि लोया के साथ नौ महीने तक सेवा में रहे दिवंगत जिला न्यायाधीशों में भी संदिग्ध मौतें शामिल हैं, और इसी को लेकर समाज में गंभीर सवाल उठे। इसी वजह से सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएँ दायर है, जिनमें मामले की स्वतंत्र जांच की मांग की गई।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इस मामले पर सुनवाई के दौरान लोया की मौत को प्राकृतिक बताया और याचिकाओं को खारिज कर दिया था, लेकिन बहस अभी भी जारी है। कोर्ट ने कहा था कि सबूतों के आधार पर स्पष्ट नहीं हुआ कि मौत संदिग्ध तरीके से हुई थी, इसलिए स्वतंत्र जांच की मांग नहीं मानी जा सकती।
क्यों अभी भी चर्चा
बी.एच. लोया केस को लेकर विवाद इसलिए जारी है क्योंकि
- लोया तब हाई-प्रोफाइल मामले की सुनवाई कर रहे थे जिसमें मुख्य आरोपियों में राजनीतिक और सामाजिक रसूख़दार व्यक्ति जुड़े थे
- कुछ वरिष्ठ जजों तथा सहायक न्यायाधीशों की मौत को संदिग्ध रूप से जोड़ा गया
- ज़्यादातर विवादित बयान मीडिया संस्थानों और वकीलों ने उठाए, जिनका आधार अलग-अलग टिप्पणियाँ और विश्लेषण थे
2018 की कुछ रिपोर्टों ने इसे जस्टिस लोया के परिवार और कुछ कोर्ट वर्कर के बयान के साथ जोड़ते हुए यह दावा किया कि मौत “हत्या” या “अनियमित परिस्थितियों” में हुई थी — लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस दावे को बिना ठोस सबूतों के अस्वीकार किया।
विशेषज्ञ कहते हैं कि “बी.एच. लोया केस आज भी इसलिए चर्चित रहता है क्योंकि यह न्याय व्यवस्था और न्यायिक स्वतंत्रता पर जनमानस के बीच गहरे सवाल उठाता है।”



