कानपुर नगर और कानपुर देहात में हाल के दिनों में सामने आए घटनाक्रमों ने पुलिस व्यवस्था को लेकर नई बहस छेड़ दी है। पत्रकारों से जुड़े मामलों, विवादित बयानों और प्रशासनिक रवैये को लेकर अब सोशल मीडिया से लेकर पत्रकार संगठनों तक सवाल उठने लगे हैं कि क्या पुलिस अपनी संवैधानिक भूमिका से आगे बढ़ती जा रही है।
दरअसल, कानपुर देहात में सीओ संजय सिंह का एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें वह मातहत पुलिसकर्मियों को कथित तौर पर “पब्लिक को बवाल करने दो” जैसी सलाह देते सुनाई दिए। वीडियो सामने आने के बाद पुलिस विभाग की काफी किरकिरी हुई। इसके तुरंत बाद खबर आई कि एसपी कार्यालय में अफसरों और पत्रकारों के मोबाइल फोन ले जाने पर मौखिक रोक लगा दी गई है।
इन घटनाओं के बाद कानपुर नगर में भी पुलिस की कार्यशैली को लेकर चर्चा तेज हो गई। पत्रकारों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि पुलिस अब केवल कानून-व्यवस्था संभालने वाली संस्था नहीं, बल्कि हर मामले में अंतिम निर्णय लेने वाली ताकत की तरह व्यवहार करती दिख रही है।
आलोचकों का कहना है कि हालात ऐसे बनते जा रहे हैं मानो पुलिस ही तय करेगी कि कौन पत्रकार है, कौन सही है और किसकी आवाज सुनी जाएगी। इसी को लेकर सोशल मीडिया पर तीखे व्यंग्य भी सामने आए, जिनमें कहा गया कि “कानपुर पुलिस अब सर्वेसर्वा है — वही जिलाधिकारी है, वही सूचना अधिकारी, वही सांसद और विधायक भी।”
पत्रकारों का कहना है कि लोकतंत्र में मीडिया और प्रशासन दोनों की अपनी-अपनी संवैधानिक सीमाएं हैं। यदि सवाल पूछने वालों पर दबाव बनेगा या रिपोर्टिंग को नियंत्रित करने की कोशिश होगी, तो इससे लोकतांत्रिक व्यवस्था कमजोर होगी।
वहीं, पुलिस विभाग की ओर से अभी तक इन आलोचनाओं पर कोई विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। हालांकि, वायरल वीडियो और उससे जुड़े मामलों की आंतरिक स्तर पर समीक्षा किए जाने की चर्चा जरूर है।
कानपुर पुलिस अब सर्वेसर्वा है।
वही ज़िलाधिकारी है, वही सूचना अधिकारी, वही सांसद, वही विधायक।
अब वही तय करेगी कि कौन पत्रकार है और कौन नहीं।
बेहतर होगा कि सारे विभागों को अब सीधे पुलिस में ही समाहित कर दिया जाए।-हैदर नक़वी, वरिष्ठ पत्रकार
पत्रकारिता के क्षेत्र का एक कड़वी हकीकत को बयां करता ‘प्रसंग’
अभी कुछेक दिनों पहले की बात है। एक मामले से सम्बन्धित कुछ तथ्यों की जानकारी हेतु मैं, एक पुलिस चौकी गया। लगभग एक घण्टा तक इन्तज़ार के पश्चात चौकी में तैनात एक उप निरीक्षक जी का आगमन हुआ। उनके समक्ष, मैंने अपना परिचय लघु (छोटी) श्रेणी के पत्रकार के रूप में दिया।
मेरा परिचय सुनते ही उप निरीक्षक महोदय ने सवाल दागा, ‘‘आपको इसके पहले अभी यहाँ आते नहीं देखा!’’
…और यह कहते हुए वो कार्यालय कक्ष के अन्दर चले गए। मेरी नज़र अन्दर की तरफ गई तो दिखाई दिया कि जिस मामले में, मैं जानना चाहता था, उसी मामले से पीड़ित लोग अन्दर थे।
मैंने, उप निरीक्षक महोदय से अनुमति लेकर कक्ष में प्रवेश किया और मामले से सम्बन्धित ‘कुछ’ जानने की जिज्ञासा जताई। लेकिन निराशा हाँथ लगी, और उप निरीक्षक महोदय ने मुझसे बोल दिया, बाहर निकलो, इन लोगों से (जो लोग अन्दर बैठे थे।) कुछ पूछताछ करनी है।
उप निरीक्षक साहब के निर्देश के अनुपालन में मैं, कक्ष से बाहर निकल आया। लेकिन मन में एक सवाल आया कि उप निरीक्षक साहब के बगल में बैठा व्यक्ति क्या कोई विशेष है जो उसे बैठाये रखा गया?
बाद में पता चला कि, पहले से बैठा व्यक्ति, पत्रकारिता का चोला ओढ़कर दलाली करने वाला व्यक्ति था ! जिसके समक्ष पूछताछ की जा सकती थी लेकिन मेरी मौजूदगी में नहीं !
अब सवाल यह उठता है कि जो पत्रकार, रोज थाना-चौकी अथवा आलाधिकारियों की चौखट के चक्कर नहीं लगाएगा!
क्या, उसे पत्रकार नहीं माना जाएगा?
क्या, उसे कोई तवज्जो नहीं दी जाएगी ?
कुछ भी हो लेकिन, एक पुलिस चौकी में घटी एक आम सी दिखने वाली घटना ने एक बड़ा और गम्भीर सवाल खड़ा कर दिया है कि, ‘पत्रकार कौन है?’ क्या पत्रकार वह है जो सच की तह तक जाने के लिए सवाल पूछता है, या पत्रकार वह है जो सुबह-शाम थाने-चौकियों और अधिकारियों की चौखट पर हाजिरी लगाकर अधिकारियों की ‘गुड बुक’ में बना रहता है?
एक निष्पक्ष और स्वाभिमानी पत्रकार का काम खबरों की खोज करना, पीड़ितों की आवाज़ बनना और व्यवस्था की कमियों को उजागर करना है। लेकिन जब एक पत्रकार किसी मामले की जानकारी लेने पुलिस चौकी, थाना या अन्य अधिकारियों के समक्ष पहुंचता है और उसे सिर्फ इसलिए नजरअन्दाज या अपमानित कर दिया जाता है क्योंकि वह ‘रोज़ वहाँ नहीं जाता’, तो यह व्यवस्था की संकीर्ण मानसिकता को दर्शाता है और सवाल उठाता है कि, ‘क्या रोज थाना-चौकी नहीं जाने वाला पत्रकार नहीं माना जाता है?’
चौकी के भीतर का वह दृश्य बेहद विचारणीय है। क्योंकि एक ‘दलाल’ नुमा कथित पत्रकार कुर्सी तोड़े रौब से बैठा था और मुझ छुटके पत्रकार को ‘बाहर निकलो’ कहकर खदेड़ दिया गया।
मेरे नजरियें से तो शायद वही सही मायने में पत्रकार है, जो अधिकारियों की चौखट का अनावश्यक चक्कर नहीं लगाता, बल्कि जरूरत पर ही जाता है, क्योंकि वह किसी के प्रभाव या दबाव में नहीं होता। उसकी कलम आज़ाद होती है। रोज पुलिस या अन्य विभागों के अधिकारियों के साथ चाय पीने वाले पत्रकार अक्सर खबरों से समझौता कर बैठते हैं, क्योंकि उनके ‘सम्बन्ध’ आड़े आ जाते हैं।
यह एक कड़ुवी सच्चाई है कि आजकल हर शहर और कस्बे में ऐसे ‘सफेदपोश’ मिल जाएंगे जिन्होंने पत्रकारिता को सिर्फ एक ढाल या दलाली का ज़रिया बना लिया है। पुलिस प्रशासन ही नहीं अपितु हर विभाग के अधिकारियों को भी ऐसे ही कथित पत्रकार बेहद रास आते हैं क्योंकि-
– ये कभी तीखे सवाल नहीं पूछते।
– ये अधिकारियों की कमियों पर पर्दा डालने का काम करते हैं।
– ये पुलिस और अपराधियों या पीड़ितों के बीच ‘सेटिंग-गेटिंग’ का माध्यम बनते हैं।
– यही कारण है कि एक दलाल पत्रकार को उप-निरीक्षक के बगल में वीआईपी ट्रीटमेंट मिलता है और सच्चाई जानने पहुंचे एक छुटके पत्रकार को दुत्कार दिया जाता है।
यह स्थिति विचलित करने वाली ज़रूर है, लेकिन यह इस बात का प्रमाण है कि आप सही रास्ते पर हैं। जो पत्रकार, रोज़-रोज अधिकारियों के चक्कर नहीं काटता, वह अपनी ऊर्जा को खोजी पत्रकारिता और जनता के मुद्दों में लगाता है। वहीं दलाली का चोला ओढ़े कथित पत्रकार कुछ समय के लिए थानों में मलाई काट सकते हैं, लेकिन इतिहास गवाह है कि समाज में सम्मान हमेशा उसी पत्रकार को मिला है, जो सच के साथ खड़ा होता है। अधिकारियों की चौखट नापने वाले को नहीं, क्योंकि पत्रकारिता का रास्ता थानों अथवा अधिकारियों की चौखट से नहीं, जनता के दिलों से होकर गुज़रता है। -श्याम सिंह ‘पंवार’
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