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ख़ुशहाली की मांग बने चुनावी एजेंडा

संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा बीस मार्च को अन्तर्राष्ट्रीय ख़ुशहाली दिवस के उपलक्ष्य में सातवीं वार्षिक रिपोर्ट जारी हुई है। विश्व के 156 देशों में ‘वार्षिक आय, स्वतंत्रता, विश्वास, स्वस्थ जीवन प्रत्याशा, सामाजिक समर्थन और उदारता’ नामक प्रमुख छह चरों के आधार पर तैयार इस रिपोर्ट में भारत को पिछले साल की रैंकिंग में सात स्थान की गिरावट के साथ 140 वाँ स्थान प्राप्त हुआ है। दक्षेस देशों में पाकिस्तान 67 वें और बांग्लादेश 125 वें स्थान के साथ हमसे अधिक ख़ुश देश हैं। यह भी बताते चलें कि जान एफ० हेलीवेल, रिचर्ड लेयर्ड और जेफ़री डी० सच्स द्वारा इस रिपोर्ट में फ़िनलैंड लगातार दूसरे साल प्रथम स्थान पर है, अमेरिका को 19 वाँ, चीन को 93 वाँ और सूडान सबसे आख़िरी अर्थात 156 वें स्थान पर है।

इस ख़ुशहाली रैंकिंग का आधार केवल आर्थिक समृद्धि नहीं है वरना विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देश अमेरिका को प्रथम स्थान पर होना चाहिए और भारत को आर्थिक रूप से अपेक्षाकृत विपन्न और अशांत अपने दोनों पड़ोसी देशों पाकिस्तान और बांग्लादेश की तुलना में काफ़ी ऊपर होना चाहिए। कार्यक्षम जनमानस और विकासोन्मुखी विचारधारा की सरकार होने के बावजूद भारत का इस सूची में पिछड़ना दुखद और खेदजनक है। आम जनता को इस रिपोर्ट को अपने उत्थान के अवसर के रूप में लेना चाहिए। दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश में आम-चुनाव की बेला है। हम अगले पाँच सालों के लिए अपना भाग्य-विधाता चुनने जा रहे हैं। अगले कुछ महीने आम चुनावों के चलते राजनीतिक दलों के पुरोधाओं द्वारा विभिन्न मुद्दों पर आरोप-प्रत्यारोपों की गहमा-गहमी ख़बरों में छायी रहने वाली है। इस पूरी प्रक्रिया में इस रिपोर्ट और जनता की ख़ुशहाली का मुद्दा चर्चा में नहीं आने वाला है। इस हंगामी चुनावी-प्रक्रिया में “जनता की ख़ुशहाली” चुनावी घोषणापत्रों में शामिल कराए जाने के लिए मांगपत्र सभी राजनीतिक दलों के समक्ष प्रस्तुत किए जाने चाहिए। क्या देश का कोई राजनीतिक दल अपने चुनावी घोषणापत्र में इस सभी छः चरों पर आधारित सूचकांकों को समेकित रूप से ‘विकास’ का वायदा करेगा?

आज़ादी के बाद सरकारों के तमाम समाजवादी सुधारों के बावजूद आज भी देश की आय और सम्पत्ति पर चंद पूँजीपति व्यापारिक घरानों, भ्रष्ट राजनेताओं और नौकरशाहों का क़ब्ज़ा है। ग्रामीण क्षेत्रों से बेरोज़गारी के कारण होने वाले पलायन से श्रम-मूलक कृषि-अर्थव्यवस्था को गहरा आघात पहुँच रहा है। गाँवों में कृषि के साथ कृषि-आधारित पूरक उद्योगों के माध्यम से रोज़गार सृजन की दिशा में बहुत नगण्य उपलब्धि प्राप्त हुयी है। लक्षित जन वितरण प्रणाली होने के बावजूद आज भी उड़ीसा के कालाहांडी में भूख से मौत होने की ख़बरें आती रहती हैं। अनाज की कालाबाज़ारी और घटतौली का खेल प्रशासनिक सुधारों के बाद भी रोका नहीं जा रहा है। छत्तीसगढ़, झारखंड और तेलंगाना के आदिवासी क्षेत्रों में इस सभी छः चरों पर आधारित विकास का सूरज दिए जैसा टिमटिमा रहा है।

प्रधानमंत्री जन-आरोग्य अभियान ने देश भर में स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध कराने की दिशा में महत्वपूर्ण सफलता पायी है। इसके बावजूद गम्भीर और असाध्य बीमारियों के उपचार की दिशा में उठाए गए क़दम अभी भी अपर्याप्त साबित हो रहे हैं। देश भर में प्रसव के दौरान होने वाली मौतों को रोका नहीं जा पा रहा है। समान शिक्षा पद्धयति की व्यवस्था के बिना देश की उन्नति सम्भव नहीं है। शिक्षा के समान माध्यम, पाठ्यक्रम और उपागम निर्धारण प्राथमिकता के आधार पर करना होगा। मूल्यहीन उच्च शिक्षा और तकनीकी शिक्षा में शोध-कार्य का अभाव शिक्षित बेरोज़गारों की संख्या में वृद्धि कर रहा है। स्वतंत्रता, सामाजिक समर्थन और उदारता जैसे अति-मानवीय सूचकांकों पर काम करने के लिए देश में पर्याप्त परिवर्तन की आवश्यकता महसूस होती है।

अब वक़्त आ गया है कि सभी राजनीतिक दलों को इन सभी छः सूचकांकों पर काम करने के लिए एक सर्वदलीय बैठक कर विकास का एक साझा घोषणापत्र बनाने पर सहमति बनानी चाहिए ताकि प्रत्येक नागरिक को ‘ख़ुशहाली का अधिकार’ प्राप्त हो सके। भारतीय जनता को ख़ुशहाली की माँग के लिए आंदोलन करने चाहिए और जन-दबाव बनाना चाहिए ताकि संविधान-संशोधन लाकर सरकार इसे नियत करे कि सरकार का मूल-कर्तव्य ख़ुशहाली लाना और जनता का मूल अधिकार ख़ुशहाली पाना हो। जाति, क्षेत्र, भाषा और अन्य विभेदों में बँटे देश को अब ‘ख़ुशहाली’ पाने के लिए एकता के सूत्र में बाँधने के लिए धर्म-गुरुओं, समाजसेवियों और लोक-नायकों को आगे आना ही होगा वरना वो दिन दूर नहीं जब भारत सूडान को भी मात दे देगा।

लेखक Arvind kumar Tripathi से संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.

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