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मजीठिया मामला : पत्रकारों के न्याय में आड़े आएगा श्रम निरीक्षकों का भ्रष्टाचार

देश की सबसे बड़ी अदालत का यह कदम निराशाजनक है। अखबार मालिक पैसे के बल पर बड़े वकील कर मामले को लंबा खींचने में कामयाब होते जा रहे हैं । इसके पहले की सुनवाई में कोर्ट ने जिस सख्ती के साथ आखिरी बार समय देने की चेतावनी दी थी उससे तो यही लग रहा था कि इस बार वह गिरफ्तारी का आदेश देगा। पत्रकार समुदाय में इस बात पर गंभीर चर्चाएं हैं कि अब न्याय मिलने में श्रम निरीक्षकों का भ्रष्टाचार आड़े आएगा।  

देश की सबसे बड़ी अदालत का यह कदम निराशाजनक है। अखबार मालिक पैसे के बल पर बड़े वकील कर मामले को लंबा खींचने में कामयाब होते जा रहे हैं । इसके पहले की सुनवाई में कोर्ट ने जिस सख्ती के साथ आखिरी बार समय देने की चेतावनी दी थी उससे तो यही लग रहा था कि इस बार वह गिरफ्तारी का आदेश देगा। पत्रकार समुदाय में इस बात पर गंभीर चर्चाएं हैं कि अब न्याय मिलने में श्रम निरीक्षकों का भ्रष्टाचार आड़े आएगा।  

कोर्ट ने नये आदेश में विशेष अधिकारी की नियुक्ति की बात कही है । इसके पहले भी सभी राज्यों के श्रम विभाग को यह जिम्मेदारी दी गयी थी। कितने राज्यों के श्रम विभागों ने इसे लागू कराने में ईमानदारी दिखाई है। कुछ दिनों पहले ही सोशल मीडिया के माध्यम से जानकारी मिली कि दिल्ली की तत्कालीन सरकार ने तो अपने को श्रम विभाग को इस आशय का पत्र तक नहीं लिखा था वहीं देहरादून के श्रम विभाग ने सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी ( पत्रांक ५३६९/दे.दून-स.अधि./नि.प.७६/२०१४दिनांक ९/१०/२०१४) में देहरादून से प्रकाशित दैनिक जागरण, हिन्दुस्तान और अमर उजाला में मजीठिया लागू होने की तथ्यहीन बात बताई थी। 

अब सवाल यह उठता है कि यह सूचना इन्होंने तो अपने से दी नहीं होगी । इन अखबारों में चोरकट इंस्पेक्टर गया होगा और नोटों की गड्डी लेकर रिपोर्ट तैयार कर दी । अब इस बात की क्या गारंटी कि श्रम विभाग का विशेष अधिकारी दूध का धुला होगा । वह अखबार के दफ्तर में आएगा तो क्या संपादक, प्रबंधक और एच आर से नहीं मिलेगा। उनकी आवभगत स्वीकार नहीं करेगा ? क्या हर कर्मचारी से अकेले में बात करेगा ? क्या सबके कलमबंद बयान लेगा ? इस विशेष अधिकरी से पत्रकारों ने क्या कहा और इसने क्या रिपोर्ट भेजी, इसकी जानकारी सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत नहीं मांगी जा सकती । 

फिर एक सवाल और, बारबार अनुनय विनय करने के बाद भी बड़ी कम संख्या में लोगों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया । वो भी तब जब भड़ास4मीडिया ने नाम गुप्त रखने का विकल्प दिया । पत्रकारों की स्थिति का अंदाजा आम जनता की स्थिति से लगाया जा सकता है । आज जनता जनवादी आंदोलन के लिए तैयार नहीं है तो उससे वर्ग संघर्ष की उम्मीद कैसे और क्यू करें । उदाहरण के लिए राष्ट्रीय सहारा के दिलेर पत्रकारों को पांच छह माह से वेतन नहीं मिला है । डीए तीन साल से शून्य है। इस बार बोनस भी नहीं मिला। तब भी कोई हड़ताल क्या, एक दिन का सामूहिक अवकाश लेने के लिए तैयार नहीं है । काम कर रहे हैं वो तीन चार कर्मचारी का अकेले । अब इनसे यह उम्मीद की जाए कि ये लेबल इंस्पेक्टर को अपनी व्यथा बताएंगे, तो इसे हास्यास्पद ही माना जा सकता है।

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