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उत्तर प्रदेश

मिट्टी की सुगंध से आत्मनिर्भरता की राह तक, योगी सरकार की पहल का असर देखिए!

अनिल कुमार-

लखनऊ, 03 नवंबर :

“माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रौंदे मोहे,

एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूंगी तोहे।”

कबीर का यह दोहा हमें उस मौन लेकिन गहरी चेतना की याद दिलाता है जो मिट्टी में बसती है- सृजन की, श्रम की और जीवन के पुनर्निर्माण की। यही भावना आज उत्तर प्रदेश के कुम्हारों, शिल्पियों और ग्रामीण कारीगरों की मेहनत में जीवंत दिखती है। योगी सरकार के प्रयासों और माटीकला बोर्ड की पहल से यह मिट्टी फिर बोल उठी है- आत्मनिर्भरता, सम्मान और समृद्धि के स्वर में।

कबीर के दोहे की तरह, यह मिट्टी अब केवल रौंदी नहीं जा रही, यह अपने सृजन से जीवन को आकार दे रही है। जिन हाथों ने मिट्टी को रूप दिया, वही हाथ अब सम्मान और आत्मविश्वास से भरे हैं। यह केवल माटीकला की कहानी नहीं, यह उस भारत की कहानी है जो अपनी जड़ों से जुड़कर विकास की नई परिभाषा लिख रहा है।

माटीकला मेलों में बिक्री का बना रिकॉर्ड, ₹4.20 करोड़ का आंकड़ा पार

मिट्टी के बर्तनों, दीपों और हस्तशिल्पों से सजी दुकानों में जब खरीदारों की भीड़ उमड़ी, तो यह सिर्फ खरीद-बिक्री नहीं थी, यह परंपरा और आधुनिकता के मिलन का उत्सव था। उत्तर प्रदेश माटीकला बोर्ड द्वारा वर्ष 2025-26 में आयोजित विभिन्न माटीकला मेलों ने रिकॉर्ड तोड़ बिक्री दर्ज की। कुल 691 दुकानों में ₹4,20,46,322 का विक्रय हुआ, जो पिछले वित्तीय वर्ष के ₹3,29,28,410 की तुलना में ₹91 लाख से अधिक है, यानी करीब 28 प्रतिशत की वृद्धि।

लघु और क्षेत्रीय मेलों में खरीदारों का उत्साह

लखनऊ के खादी भवन में आयोजित 10 दिवसीय माटीकला महोत्सव में 56 दुकानों से ₹1.22 करोड़ की बिक्री हुई। गोरखपुर, आगरा, कानपुर देहात और मुरादाबाद में हुए क्षेत्रीय मेलों में ₹78.84 लाख का कारोबार हुआ। वहीं 70 जनपदों में आयोजित लघु माटीकला मेलों ने ₹2.19 करोड़ की बिक्री दर्ज कराई। यह संख्याएँ केवल आर्थिक उपलब्धि नहीं हैं, बल्कि इस बात का प्रमाण हैं कि आमजन का रुझान फिर से स्थानीय उत्पादों और हस्तनिर्मित वस्तुओं की ओर लौट रहा है।

कारीगरों को मिला सीधा बाजार, घटा खर्च, बढ़ी आय

इस बार दुकानों की संख्या पिछले वर्ष की तुलना में कम रही, फिर भी बिक्री अधिक हुई, यह दर्शाता है कि गुणवत्ता, प्रस्तुति और उपभोक्ता विश्वास में सुधार हुआ है। माटीकला बोर्ड की पहल से अब कारीगर सीधे उपभोक्ताओं से जुड़ पा रहे हैं। योगी सरकार ने गांवों के तालाबों से मिट्टी निकालने की अनुमति निशुल्क कर दी है, जिससे कारीगरों की लागत घटी और उत्पादन क्षमता बढ़ी।

परंपरा से आधुनिकता की ओर, सरकार की पहलें रंग ला रही हैं

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का ध्यान पारंपरिक शिल्प और कारीगरों की आर्थिक उन्नति पर केंद्रित है। माटीकला बोर्ड के गठन के बाद प्रशिक्षण, डिजाइन विकास, ब्रांडिंग और विपणन के क्षेत्र में अनेक नवाचार किए गए हैं। इस अभियान का उद्देश्य है कि मिट्टी के ये कलाकार केवल जीविका नहीं, बल्कि गरिमा के साथ जीवन जी सकें।

नई पहचान, नई ऊर्जा

इस बार खरीदारों ने स्थानीय शिल्प और पारंपरिक उत्पादों को बड़े उत्साह से अपनाया, जिससे माटीकला उत्पादों की ब्रांड वैल्यू मजबूत हुई है। आने वाले समय में इन मेलों का दायरा और जिलों तक बढ़ाया जाएगा, ताकि यूपी की माटीकला देश ही नहीं, विदेशों में भी अपनी पहचान बना सके।

योगी सरकार के प्रयासों से संरक्षित हो रही परंपरागत कला

परंपरागत कारीगरों और शिल्पियों की कला को संरक्षित व संवर्धित करने, उनकी सामाजिक सुरक्षा, आर्थिक सुदृढ़ता, तकनीकी विकास और विपणन सुविधा बढ़ाने तथा नवाचार के माध्यम से रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने के उद्देश्य से योगी सरकार ने उत्तर प्रदेश माटीकला बोर्ड का गठन किया है। इस पहल के माध्यम से न केवल पारंपरिक माटीकला को नई पहचान मिली है, बल्कि हजारों परिवारों को आत्मनिर्भरता का नया आधार भी प्राप्त हुआ है। योगी सरकार ने प्रजापति समुदाय के उन सभी लोगों के लिए, जो माटीकला उद्योग से जुड़े हैं, एक महत्वपूर्ण सुविधा प्रदान की है कि गांव के तालाबों से मिट्टी निकालने की व्यवस्था निःशुल्क कर दी गई है। इससे कारीगरों को उत्पादन की मूल सामग्री सुलभ हुई है और उनकी लागत में उल्लेखनीय कमी आई है। ये कदम दर्शाते हैं कि योगी सरकार परंपरागत शिल्प को केवल संरक्षित ही नहीं कर रही, बल्कि उसे आधुनिक विपणन, प्रशिक्षण और नवाचार के माध्यम से वैश्विक मंच तक पहुंचाने का लक्ष्य लेकर चल रही है।

क्या कहते हैं मटीकला बोर्ड यूपी के महाप्रबंधक शिशिर

सीईओ खादी एवं ग्रामोद्योग माटीकला बोर्ड के महाप्रबंधक शिशिर ने बताया कि योगी सरकार के समग्र समर्थन और बोर्ड के लक्षित प्रयासों के परिणामस्वरूप कारीगरों को सीधे उपभोक्ताओं से जुड़ने का अवसर मिला है। उन्होंने कहा कि मेलों में आए खरीदारों ने स्थानीय शिल्प व पारंपरिक उत्पादों को उत्साहपूर्वक अपनाया, जिससे कारीगरों की आय में वृद्धि हुई है तथा माटीकला उत्पादों की ब्रांड वैल्यू मजबूत हुई है। उन्होंने यह भी बताया कि आगामी वर्षों में इन मेलों के दायरे का विस्तार कर और अधिक जिलों में इस तरह के आयोजन किए जाएंगे, ताकि प्रदेश के माटीकला उत्पाद राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों से जुड़ सकें।


दीपावली से दो दिन पहले गोरखपुर के पन्‍ने लाल बेहद खुश थे। उनका ज्‍यादातर मिट्टी से बने हस्‍तशिल्‍प उत्‍पाद बिक गये थे। लखनऊ के सुमित प्रजापति भी अच्‍छी दुकानदारी कर चुके थे। दोनों ने बताया कि यहां पर उत्‍पादों के उचित एवं अच्‍छे दाम मिल जा रहे हैं। खरीदने वाले लोग भी बड़े चाव से खरीदारी कर रहे हैं। पन्‍ने और सुमित उत्‍तर प्रदेश माटीकला बोर्ड द्वारा लखनऊ खादी भवन में लगाये गये दस दिवसीय माटीकला महोत्‍सव अपने हाथों से उत्‍पादित मिट्टी के सामानों की बिक्री कर रहे थे। इसमें दीया से लेकर मूर्ति एवं अन्‍य कई प्रकार के मिट्टी निर्मित साज-ओ-सामान शामिल थे।

दोनों ने बताया कि सीधे उपभोक्‍ताओं से डील करने के चलते उन्‍हें अच्‍छी खासी बचत हो रही है। माटीकला बोर्ड द्वारा महोत्‍सव एवं मेले के माध्‍यम से सीधे उपभोक्‍ताओं से जोड़ दिये जाने से कलाकारों को बाजार के बिचौलियों की कोई जरूरत नहीं रह गई थी। उत्‍तर प्रदेश की योगी सरकार द्वारा माटी के काम से जुड़े कुम्‍हारों एवं कलाकारों के लिये किये गये प्रयास का प्रतिफल यह है कि अब मिट्टी का काम करने वाला वर्ग धीरे धीरे खुद ही उपभोक्‍ताओं से जुड़ रहा है। उसे किसी बिचौलिये या सस्‍ते दामों पर होलसेल खरीद करने वालों की कोई जरूरत नहीं रह गई है।

माटीकला से जुड़े लोगों को अब उचित आय हो रही है। आंकड़े बताते हैं कि उत्तर प्रदेश माटीकला बोर्ड द्वारा वित्तीय वर्ष 2025-26 में आयोजित माटीकला मेलों में प्रदेश के कारीगरों व हस्तशिल्प उत्पादों के बिक्री में उल्लेखनीय उछाल आई है। दीपावली के पूर्व बोर्ड ने 10 दिवसीय माटीकला महोत्सव, 07 दिवसीय क्षेत्रीय माटीकला मेले और 03 दिवसीय लघु माटीकला मेले आयोजित किए। इन सभी मेलों में कुल 691 दुकानें लगाई गईं और ₹4,20,46,322 की बिक्री हुई। यह पिछले वित्तीय वर्ष में दर्ज कुल बिक्री ₹3,29,28,410 की तुलना में ₹91,17,912 अधिक है, जो पिछली बार से 27.7 प्रतिशत अधिक है!

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