मीडिया संस्थानों में सत्ता के ख़िलाफ़ न बोलने लिखने देने के कोड ऑफ़ कंडक्ट दरअसल PMO और होम मिनिस्ट्री से लादे गए हैं!

श्याम मीरा सिंह-

एक सवाल मुझे पूछा जा रहा है कि अगर आपने कंपनी के कोड ऑफ़ कंडक्ट (Guidelines) पर साइन किए तो आपको उसका पालन भी करना था. अन्यथा साइन नहीं करने थे. कंपनी के कोड ऑफ़ कंडक्ट कहते हैं कि आप खुद के सोशल मीडिया हैंडल्स पर कुछ भी नहीं लिख सकते.

पहली बात ये ही कितना हास्यास्पद है कि मीडिया कंपनियाँ guidelines जारी कर रही हैं कि बोलना मना है. लेकिन इसे कंपनियों के इतर बड़े परिदृश्य में देखने की ज़रूरत है. मीडिया संस्थानों और विश्वविद्यालयों में लगाए जाने कोड ऑफ़ कंडक्ट, इनके संपादकों और कुलपतियों द्वारा नहीं लगाए जा रहे, बल्कि लगवाए जा रहे हैं.

कौन बोलने वाली हर आवाज़ को कुचल रहा है वो इस देश का बच्चा बच्चा जानता है.

मीडिया संस्थानों के कोड ऑफ़ कंडक्ट, मीडिया संस्थानों के कोड ऑफ़ कंडक्ट नहीं हैं बल्कि PMO और Home ministary के कोड ऑफ़ कंडक्ट हैं.

जिस देश का प्रधानमंत्री हर रोज़ संविधान की ली हुई अपनी शपथ की धज्जियाँ उड़ाता हो. उस देश के विश्वविद्यालयों में छात्रों के लिए और मीडिया संस्थानों में पत्रकारों के लिए कोड ऑफ़ कंडक्ट ऊपर से लागू करवाए जाते हैं. जब भी वे प्रश्न करेंगे कि इस देश में संविधान की धज्जियाँ उड़ाई जा रही हैं तभी उनसे कह दिया जाए कि आपने कोड ऑफ़ कंडक्ट का उल्लंघन किया है.

सुप्रीम कोर्ट ने कई मर्तबा अपने जजमेंट्स में कहा है कि जो भी नियम, एक्ट, बिल, प्रथा, कोड ऑफ़ कंडक्ट इस देश के नागरिकों के बोलने की आज़ादी का हनन करेगा वो Null and Void माना जाएगा. यानी बोलने की आज़ादी के अधिकार पर अंकुश लगाने वाले नियम और क़ानून असंवैधानिक माने जाएँगे चाहे वो सरकार ने बनाए हों, चाहे किसी प्राइवेट संस्थान ने बनाएँ हों या किसी खाप पंचायत ने बनाए हों. अपने एक जजमेंट में सुप्रीम कोर्ट ने ये भी कहा था कि सरकारी कर्मचारी होने से किसी के बोलने की आज़ादी नहीं छीनी जा सकती. सरकारी कर्मचारी होकर भी आदमी के बोलने का अधिकार उतना ही है जितना बाक़ी नागरिकों का.

इसलिए केवल इंडिया टुडे या आजतक, NDTV ही नहीं, कोई भी सरकारी या प्राइवेट संस्थान कोड ऑफ़ कंडक्ट के नाम पर बोलने का अधिकार नहीं छीन सकते. रही बात उस कोड ऑफ़ कंडक्ट पर साइन करने की. तो जिस मीडिया संस्थान से मैंने पढ़ाई की है उस IIMC में भी इस तरह के कोड ऑफ़ कंडक्ट पर साइन किए थे, जिसके अनुसार मैं IIMC के ख़िलाफ़ नहीं लिख सकता था. सरकार के ख़िलाफ़ बोल नहीं सकता था. अगर मैं उस कोड ऑफ़ कंडक्ट पर साइन नहीं करता तो गेट से ही लौटा दिया जाता. मैंने उसपर साइन करके संस्थान में एडमिशन लिया. उसके बाद उसी कोड ऑफ़ कंडक्ट के विरोध में जमकर लिखा, उस संस्थान के बीच आँगन में खड़े होकर बोला.

कोड ऑफ़ कंडक्ट पर साइन कर संस्थानों में घुसना पढ़े-लिखे बच्चों की मजबूरी है और फिर उसका विरोध करते हुए बोलना न केवल आपका अपना अधिकार है बल्कि ज़िम्मेदारी भी है. यही काम मैंने किया. जिस कोड ऑफ़ कंडक्ट का मैंने कथित तौर पर उल्लंघन किया दरअसल वे इस सरकार द्वारा पत्रकारों और नागरिकों की आवाज़ दबाने के लिए लगाए गए प्रतिबंध हैं. मैंने कंपनी के नियमों का उल्लंघन नहीं किया, PMO, गृहमंत्रालय, आइटी मिनिस्ट्री द्वारा पूरे देश के विश्वविद्यालयों, मीडिया संस्थानों में लगाए जा रहे आलोकतंत्रिक कोड ऑफ़ कंडक्ट का उल्लंघन किया. कोड ऑफ़ कंडक्ट सरकार की तारीफ़ करने वालों पर लागू नहीं होते. फिर ये किसके लिए लाए गए हैं?

अगर इन कोड ऑफ़ कंडक्ट पर साइन न करें तो हज़ारों लोग IIT, IIM, IIMC और तमाम विश्वविद्यालयों में दाख़िला नहीं ले पाते. गेट पर से ही लौटा दिए जाते. कंपनियों के कथित कोड ऑफ़ कंडक्ट पर साइन न करें तो कंपनियों के अंदर नहीं जा पाते. हम सब डिज़र्व करते हैं कि हमें ऐसी यूनिवर्सिटियाँ, कॉलेज, कंपनियाँ मिलें कि हम पढ़ भी सकें बोल भी सकें. लिख भी सकें, सुना भी सकें.

जिस कोड ऑफ़ कंडक्ट के उल्लंघन का आरोप मुझ पर है वो कोड ऑफ़ कंडक्ट अपने आप में छात्रों, पत्रकारों के अधिकारों का उल्लंघन है. अन्यथा जो परिपक्व लोकतंत्र हैं वे अपने प्रधानमंत्री ही नहीं अपनी न्यायपालिका, जजों और संसद के ख़िलाफ़ बोलने की आज़ादी देने की ओर बढ़ चुके हैं. और हम नागरिकों की छोड़िए पत्रकारों की आज़ादी छीनने के लिए भी नियम ला रहे हैं. इसलिए कह रहा हूं कंपनियों और विश्वविद्यालयों के कोड ऑफ़ कंडक्ट, मैनेजर या कुलपतियों द्वारा लगाए जा रहे कोड ऑफ़ कंडक्ट नहीं हैं बल्कि PMO, IT ministry, Home ministry के छुपे हुए कोड ऑफ़ कंडक्ट हैं. जिन्हें तोड़ने का अधिकार इस देश के प्रत्येक नागरिक को है.

अगर किसी देश में नियम बना दिया जाए कि एक वर्ग की हत्याएँ करना एक क़ानून है इसकी कोई सजा नहीं मिलेगी. उसके बाद क़ानूनविद और संविधान पढ़ने वाले आगे से यही कहेंगे कि लिखे हुए नियम के हिसाब से एक वर्ग के लोगों की हत्या करना अपराध नहीं है, नियम तो यही कहता है. तब कुछ लोग ये भी कह सकते हैं चुनी हुई सरकार ने नियम बनाया है, देश में रहना है तो नागरिकता पर साइन क्यों किए? लेकिन वे ये नहीं कहेंगे कि इस प्रकार के नियम क्यों हैं अगर हम लोकतंत्र हैं.

जिन्हें लोकतंत्र, बोलने की आज़ादी, मानवाधिकारों, शासन पद्धति की थोड़ी भी समझ होगी वो कहेंगे कि बोलने की आज़ादी हमारा मूलाधिकार है, सरकार के नियम, किसी पंचायत के फ़रमान, किसी कंपनी के कोड ऑफ़ कंडक्ट उसपर अंकुश नहीं लगा सकते.

पत्रकारिता संस्थानों में ही नहीं, इस देश के स्कूलों, छात्रावासों, कंपनियों, दुकानों, शोरूमों, किसी भी जगह पर इस तरह के कोड ऑफ़ कंडक्ट नहीं होने चाहिए जो किसी नागरिक को उसके बोलने के अधिकार से रोकते हों.

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