हरिशंकर व्यास-
नरेंद्र मोदी बतौर प्रधानमंत्री तय कर दे रहे हैं कि उनके बाद संघ परिवार का कोई नेता प्रधानमंत्री नहीं बने! यह वैसे ही है जैसे कभी वीपी सिंह ने किया था। मुझे याद है वीपी सिंह की छाती तब शरद यादव-लालू यादव, देवीलाल से लेकर कॉमरेड सुरजीत, ज्योति बसु तथा जनवादी क्रांति के हरकारे लुटियन पत्रकारों ने कैसे मंडल के नगाड़े बजा कर फुलाई थी! मतलब देश में सामाजिक क्रांति आई। और ऐसी तमाम हवाबाजी के लगभग चालीस साल बाद आज न जनवादी बचे हैं, न मंडलवाद है और न फकीर मार्क्सवादियों की जमात है! आज कोई नहीं बूझ सकता है कि तब कम्युनिस्ट पार्टी और खास कर मार्क्सवादियों का संगठन, कैडर कैसा गजब था। उस वैचारिकता में बंधा हुआ जो संघ के स्वंयसेवकों की तरह न सत्ता की भूख लिए था न परमपूजनीयों की भक्ति। पूरी पार्टी समानता के कॉमरेडवाद में जीती थी। एक से फक्कड़ और फकीर।
याद करें ज्योति बसु ने कितने दशक बंगाल में राज किया पर क्या भ्रष्टाचार, कदाचार का कोई किस्सा फाइल में, स्मृति में रिकॉर्ड है? मैं वामपंथ से हमेशा असहमत रहा। लेकिन मैंने पत्रकारिता के पचास सालों में मार्क्सवादी ज्योति बसु, माणिक सरकार, नयनार के 23 साल या 20-15 साल के शासन को गहराई से जाना-सुना है। ये मुख्यमंत्री न झूठ बोलते थे, न झांसे देते थे, न बांटो और राज करो की राजनीति करते थे। न ही इन्होंने ठेकेदारों से पत्थरों की इमारतें बनवा कर उनको तीर्थ का नाम दे कर अपने को तीर्थ में बैठा भगवान दिखलाया। ये कम्युनिस्ट नेता विचार प्रेरित चाल, चेहरे, चरित्र से चलते हुए थे कि न भय, भूख, भक्ति के हिंदू विकारों से!
वीपी सिंह की भूखी राजनीति के वायरस में बेचारे वामपंथी फंसे और उनका भी पतन शुरू। जनवाद जातिवाद में या कि मंडलवाद में ऐसा खोया कि कमंडल लिए स्वयं सेवकों का समय आ गया। वैश्विक कारणों, इस्लाम ने अलग भगवा रथ यात्राओं को धक्का दिया। उभरते बाजार (पीवी नरसिंह राव की बदौलत) में गुजरातियों या कि अंबानी-अडानियों की चांदी की जूतियों का वह चुंबक बना कि भाजपा के स्वंयसेवक प्रमोद महाजन, गोविंदाचार्य, नरेंद्र मोदी, वेंकैया आदि रथयात्रा और भीड़, मैनेजमेंट, कारपेट बमबारी से लोगों को उल्लू बनाने की तकनीक में धीरे-धीरे प्रवीण हो गए। सो, कमंडल हिट और मंडल आउट। हिंदुओं का भक्ति युग प्रारंभ!
अब नारी राजनीति का मोड़ है! सोचें, जिस संघ में निर्णयकर्ताओं की टीम में एक भी नारी पदाधिकारी कभी नहीं हुई और जिसकी पार्टी भाजपा में ले देकर कुसुम राय, शोभा करंदलाजे, वंसुधरा राजे, सुषमा स्वराज, रेखा गुप्ता, स्मृति ईरानी, निर्मला सीतारमण या आनंदी बेन जैसे कुछ चंद नाम है वह मोदी के महिला आरक्षण के युग में प्रवेश कर रही है तो आगे क्या होगा? अपना दो टूक जवाब है केवल सोनिया गांधी का सपना साकार होगा। सो, यह वैसा ही क्षण है जैसा वीपी सिंह को मंडल आरक्षण के इलहाम का क्षण था। इस क्षण से राजनीति आगे वैसे ही मोड़ लेगी जैसे मंडल से आया था।

महिला आरक्षण के बाद चुनाव 2029 का हो या 2034 का, भाजपा का पतन तय है। सोचें, भाजपा अपने इतिहास में एक खुद्दार, मनमौजी उमा भारती को बरदाश्त नहीं कर पाई? एक के लिए भी जब जगह नहीं तो भविष्य में संभव है जो लोकसभा के आरक्षित महिला ब्लॉक की राजनीति का प्रियंका गांधी या ममता बनर्जी जैसी नेता उभरें। इसलिए मोदी का दांव केवल इस सोच में है वे इतिहास में आरक्षण कराने वाले माने जाएंगे। सोचें, सोनिया गांधी ने विधेयक बनवाया और उसकी क्रेडिट मोदी लेंगे!


