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साहित्य

अरुंधति रॉय की नई किताब : एक शुरुआती सरसरी समीक्षा!

प्रियंका दुबे-

आधी से ज़्यादा पढ़ चुकी हूँ. बाद में लम्बा लिखूँगी लेकिन अभी सिर्फ़ इतना ही कि यह किताब हिंदुस्तान में लिख रहे या लिखना चाह रहे हर व्यक्ति को पढ़नी चाहिए. इसे पढ़ते हुए (अगर आपको नहीं मालूम तो) आपको मालूम चलेगा कि ऐसा क्यों है कि आज जब हर साल नई “किताबों” का ढेर लग रहा है, रोज़ाना नए लेखों, कविताओं और कहानियों और उनके अतिरेक से हमारे समय को पाटा जा रहा है तब किसी भी शब्द का किसी पर कोई असर क्यों नहीं हो रहा ? लिखे हुए शब्द का कोई असर इसलिए नहीं होता क्योंकि हमारे समय में हमें एहसास ही नहीं है कि लेखक किस शय का नाम है. ब्रांडेड बैगों और “महँगे” सामानों के हवाले से अपना गहरा स्वामित्व बोध सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करने वाले वाले, गाड़ियों, मकानों और विदेश यात्राओं को जीवन की उपलब्धि समझने वाले और पैसे की अनन्य भक्ति करने वाले हमारे इस समय से कभी वैसा टेक्स्ट पैदा ही नहीं हो सकता जिसका असर हो. जीवन ही इतना हल्का और उथला है. और दुखद यह है कि इस बात पर कोई मंथन, आत्मवलोकन या शर्म भी नहीं. इस किताब को पढ़ते हुए शायद हमारे इस पूरे खोखले वातावरण को डूबने के लिए चुल्लू भर पानी की दरकार उठे.

बिनबाप और एक लगभग नामौजूद रही हिंसक गुस्सैल क्रूर माँ के बीच बड़ी हुईं अरुंधती के बारे में यह लिखना उचित ही होगा कि वे बिना अभिवावक के बड़ी हुईं. नंगे पैर गाँव भर में फिरने वाली इस बच्ची के पैरों में वो सख़्त गठानें पड़ी थीं जिन्हें जुराबों में अपने पैर महफ़ूज़ रखने वाले आप, हम और हमारे समय के ज़्यादातर बच्चे नहीं समझ सकते. अकेलापन, उपेक्षा, मार पीट, हिंसा और चेचक के साथ साथ प्राइमरी टीबी जैसी बीमारियों से जूझने के बाद भी बालक अरुंधति के प्रति व्यस्क अरुंधति में कोई दया का भाव नहीं . कोई विक्टिमहुड नहीं. लेखक अपनी क्रूर हिंसक माँ को भी करुणा से देखतीं हैं. एक मार्मिक दृश्य जो मुझे याद रह गया उसमें चेचक से जूझ रही बच्ची इतनी बिन माँ-बाप की है कि बीमारी में भी गेट से लटक कर दुपहर गुज़ारती है और आने जाने वालों में से जो भी रुचि ले उसे अपने चेचक के फोड़े बालसुलभ मासूमियत से दिखा देती है.

यहाँ गौर करने वाली बात यह है कि इतनी ग़ुरबत और हिंसा झेलने के बाद भी लेखक कभी रुपयों के प्रति आकर्षित नहीं होतीं. हाँ, बड़ी होकर वे लिखकर रुपया कमाती ज़रूर हैं लेकिन कभी रुपये की ग़ुलाम नहीं बनतीं. वो हमेशा चाहना से आज़ाद होनी चाहती हैं. पैसे को चाहना, हमेशा युवा दिखने की चाहना, प्रसिद्धि की चाहना – हर चाहना है.

उनके दुख बड़े दुख हैं. प्यार के दुख, प्यार में मिले दुख. देश के लोगों के दुख। उनकी लड़ाइयाँ बड़ी लड़ाइयाँ हैं. इस किताब को पढ़कर मैंने सोचा कि यह कितनी कारुणिक बात है कि ख़ुद इतनी यातना झेल चुका एक व्यक्ति पूरे जीवन दूसरों की यातनाओं के बारे में लिखने का चुनाव करता है!

आप अरुंधति के किसी बयान या किसी राय से असहमत हो सकते हैं. लेकिन आप इस बला की मज़बूत और बेइंतहा कमजोर मनुष्य के भीतर से फूटती रौशनी के मुरीद कैसे न बनें ? कितनी ही बातें हैं इस लेखक की जो मन को छू जाती हैं.

बचपन से अपनी माँ के स्कूल (बहुत बाद में जब वह स्कूल खड़ा हो सका) में बाक़ी बच्चों के साथ टॉयलेट और फर्श साफ़ करने की ट्रेनिंग लेने वाली अरुंधति के बारे में मशहूर है कि वे अकेली रहती हैं और अपने कामों के लिए किसी घरेलू सहायक की मदद नहीं लेतीं. पोस्ट बुकर युग में जब उनके पास संसाधन थे, तब भी नहीं. वे अपने सारे काम ख़ुद करतीं हैं. खाना, बर्तन, टॉयलेट धोना, फर्श साफ़ करना और लिखना भी. यह बात उनको उन्हीं गांधी जी के करीब लाती है जिससे उनकी गहरी असहमति रही.

लम्बे अरसे बाद किसी किताब को लेकर इतनी उत्सुकता है. इसका मूल कारण the god of small things के जुड़वा बच्चों की यात्रा की स्मृति है या कुछ और, नहीं जानती. लेकिन मैं, जो अब नौकरी करना शुरू कर चुके अपने तेईस वर्षीय छोटे भाई तक के लिए सारी सृष्टि की चिंता अपने कंधों पर उठाए फिरती हूँ, मेरा वह सेल्फ यह जानना चाहता है कि मैरी और अरुंधती का एक दूसरे को छोड़ना कैसे संभव हुआ होगा. एक माँ कैसे अपनी किशोर बेटी की सात साल तक कोई ख़बर नहीं लेती. कैसे अरुंधती की शुरुआती ज़िंदगी पैटी स्मिथ जैसी रही है और इस दर दर भटकने ने उन्हें कैसे वह बनाया जो वे हैं. कैसे गढ़ी होगी उन्होंने वह अद्भुत भाषा जिसे पढ़कर मैंने यह जाना कि सामाजिक ताने बाने के तमाम अंतर्विरोधों का बयानिया किस क़दर आकर्षक हो सकता है. अरुंधती एक ऐसी लेखक हैं जिनसे कई बार असहमत होने पर भी मैं जिनकी विद्वता और उनके होने के कमाल की मुरीद रही हूँ. वो अपने बोलने और लिखने से मुझे यूनिवर्सिटी के दिनों से चमत्कृत करती रहीं हैं. उनकी नई किताब की उन्हें ढेरों बधाई. मैं बुकस्टोर से अपनी प्रति ख़रीदूँगी.

PS : I bought the first copy of this book in Indore.

-प्रियंका दुबे


Arundhati Roy is a wonderful writer and she’s so wonderful that on page many a times she can make immoral things look ethical.

I haven’t read the book yet but her first novel I read when I was very young and it was the first adult book which I read cover to cover.

Then she stooped to didacticism (referring here to some western reviews about her books), I hope she recovers and I love this book as much I loved the first one. A full circle.

-Ammber Pandey


She never clings to money… She gave away her award money to social causes.

This I understand perfectly… Compassion towards a violent mother. In fact the more the violence the less the victimhood and the more the compassion

I’m dealing with this paradox in my mother book too.

-Teji Grover

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