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सुख-दुख

सरकार की आंख मे आंख डालकर प्रश्न करने वाले सेकुलर पत्रकारों को मुस्लिम संगठनों से पुरस्कार लेना चाहिए क्या?

रंगनाथ सिंह-

ऐसी मुखौटा संस्थाएँ लोकतांत्रिक देशों में “रिलीजियस फ्रीडम” के नाम पर इस्लामीकरण को बढ़ावा देती हैं। इस संस्था ने अभी “मानवाधिकार और धार्मिक आजादी” के नाम पर एक पुरस्कार की शुरुआत की है जिससे न्यूजलॉन्ड्री, कारवां, न्यूजमिनट, मूकनायक, वायर, स्क्रॉल के पत्रकारों को नवाजा गया है।

अमेरिकी हिन्दू संगठनों द्वारा रेडिकल हिन्दू संगठनों को की जाने वाली फण्डिंग पर पापिया घोष जैसे ने अच्छा काम किया है। फिलहाल, आप एक ऐसी अमेरिकी हिन्दू संस्था का नाम बताएँ जो किसी मुस्लिम बहुल देश में कथित धर्माधिकारी पत्रकारिता के लिए पुरस्कार देती हो?

सुशांत झा की टिप्पणी-

भारत के बहुत सारे वामपंथी आखिर-आखिर तक लड़ाई लड़ेंगे, जेनुइन लोगों के खिलाफ। वे मोदी और संघ से लड़ते-लड़ते हर उस व्यक्ति से लड़ते हैं जो मध्यममार्गी है, उदार है, डेमोक्रेट है, गैर-भाजपाई भी है, लेकिन तथाकथित सेक्यूलरिज्म के इस मॉडेल की विसंगतियों पर प्रकाश डालता है।

दिक्कत ये है कि वामपंथियों का एक खेमा जिहाद, मुस्लिम कट्टरपंथ, इत्यादि को आँख मूंदकर समर्थन देता है और हिंदू धर्म का नाम सुनते ही घृणा से भड़क उठता है। वो हिंदू धर्म से दूसरे धर्मों की तरफ धर्मांतरण का समर्थन करता है, लेकिन उसके लिए घरवापसी, फासीवाद है।

असल बात ये है कि सांस्थानिक मीडिया के युग में ये दोहरापन चल गया था, इंटरनेट के जमाने में उजागर हो गया है!

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