संदर्भ मजीठिया वेज बोर्ड : नेहरु-इंदिरा से लेकर वाजपेयी-मोदी तक की सरकारें प्रेसपतियों के आगे नतमस्तक होती रही हैं

लोकायुक्त एक दंत विहीन शेर है। यह पीड़ा बातचीत के दौरान उत्तरांचल के पहले लोकायुक्त हैदर रजा जी कहा करते थे। यह स्थिति सिर्फ लोकयुक्त की ही नहीं। पत्रकारों के लिए गठित वेजबोर्डों की भी है। पहला वेज बोर्ड कब गठित हुआ, यह तो मालूम नहीं लेकिन अब तक छह वेजबोर्ड गठित हो चुके हैं लेकिन किसी एक की भी संस्तुतियां आजतक लागू नहीं हुईं। अब सवाल यह उठता है कि जब केन्द्र और राज्य सरकारें वेतन आयोग की संस्तुतियों को लागू नहीं करा पातीं तो आयोग का गठन ही क्यों करतीं है? अखबार मालिकों की अब तक की भूमिका से तो ऐसा लगता है कि वेजबोर्ड गठित होता रहे हमारे ठेंगे से।

अगर अखबार के मालिकान ऐसा सोचते हैं तो इसलिए कि हम संगठित नहीं हैं और अखबारों में संगठनों में रीढ़हीनों की फौज घुस आई। प्रथम और दूसरे प्रेस आयोग के गठन (१९७८) के बाद आज तक तीसरा आयोग अस्तित्व में आ ही नहीं पाया। नेहरु/इंदिरा से लेकर वाजपेयी/ मोदी तक की सरकारें प्रेसपतियों के आगे नतमस्तक होती रही हैं और होती रहेंगी, अगर मालिक और पत्रकार की खाल में छिपे दलालों की रासलीला चलती रही। प्रसंगवश बता दूं कि लालकृष्ण आडवाणी के सूचना प्रसारण मंत्री बनने के समय से ही पत्रकारिता में दलालों की फौज घुसेड दी गई।

बहरहाल बात मजीठिया वेतन आयोग की। मनमोहन सरकार ने पूर्ववर्ती सरकारों की तरह अखबार में काम करने वालों के लिए मजीठिया आयोग का गठन किया। आयोग ने अपनी रिपोर्ट दी। चुनावी वर्ष होने के कारण यह संसद से पास हो गई और अधिसूचित भी हो गई। इस रिपोर्ट के खिलाफ आनंद बाजार पत्रिका टाइम्स आफ इंडिया और राजस्थान पत्रिका ने देश की सर्वोच्च अदालत का दरवाजा खटखटा दिया। लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद इन्हे मुंहकी खानी पड़ी। फिर भी ये इस तिकड़म में हैं कि वेजबोर्ड न देना पडे। फरवरी २०१३ के फैसले को लागू न करने के आदेश के खिलाफ मजीठिया मंच और भडास4मीडिया के सार्थक प्रयास से 7 फरवरी 2014 से मामला अवमानना का चल रहा है।

मित्रों अपनी चट्टानी एकता और एडवोकेट परमानंद, उमेश शर्मा, यशवंत सिंह, रवीन्द्र अग्रवाल, महेश्वरी जी आदि के सहयोग से लडाई मुहाने पर आ गई है। इस लडाई को जीतना इसलिए जरूरी है कि ताकि आने वाले अपने हक की लड़ाई लड़ सकें। मित्रों …एक बड़ा पत्थर है। हम जानते हैं कि इसे तोड़ नहीं सकते। पर प्रयास कर इसमें दरार तो डाल सकते हैं ताकि आने वाली पीढी दरार देखे और उसे तोड़े। हम पत्थर तोड़े नहीं तो दरार तो डालें, आने वाले पत्रकारों के लिए। फिर दशरथ मांझी का उदहारण हमारे सामने है। उसने अपनी बीवी के लिए किया। हम आने वाली पीढी के लिए करें। यदि मजीठिया आयोग (कम वेतन मंजूर नहीं जैसा जागरण अमर उजाला भाष्कर राजस्थान पत्रिका आदि चिरकुटयी कर रहे हैं) के हिसाब से वेतन और अन्य परिलाभ हासिल न कर सके तो भविष्य में भी सरकारें वेतन आयोग गठित करती रहेंगी और प्रेसपति उसे रद्दी की टोकरी में फेंकते रहेंगे।

अरुण श्रीवास्तव
उप संपादक
राष्ट्रीय सहारा देहरादून
संपर्क: arun.srivastava06@gmail.com

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Comments on “संदर्भ मजीठिया वेज बोर्ड : नेहरु-इंदिरा से लेकर वाजपेयी-मोदी तक की सरकारें प्रेसपतियों के आगे नतमस्तक होती रही हैं

  • Dear Arun ji, aapney Majithia ki Ladai me jin-2 wakilon ka naam liya hai, unme ek jo main hain, ka naam chhod diya hai. Unka Naam hai… Colin Gonsalvese, jo Majithia ki Ladai me Aham bhoomika adaa ker rahey hain, workers ko unke shahar me ja-ja ker motivate ker rahey hain. Itna hi nahin, Nishwarth bhav se ladai lad rahey hain. Colin jaise wakil aaj ke zamaney me kahan hain. Pl. agey se jab bhi likhein, Inka naam zaroor daalein. Dhanyavad.

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  • KASHINATH MATALE says:

    Dear sir,
    Mr. Colin Gonsalvese, shab ne Majithia Wage Board ki Ladai me Aham bhoomika adaa ki hain. Isme koi domat nahi.

    Mr. Colin Gonsalvese, ne suru se hi workers ke justice ke liye ladh rahe hai.

    Unka nam kabhi bhi nahi bhulna chahiye.

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  • अरुण श्रीवास्तव says:

    साथियों कुछ लोगों के नाम मेरी अज्ञानता और भूल की वजह से छूट गये । मै छमा चाहता हूं ।

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