नक्सली बताकर गौतम नवलखा समेत कई पत्रकार, वकील और लेखक किए गए गिरफ्तार

Urmilesh Urmil : देश के कई वरिष्ठ बुद्धिजीवियों, जिनमें प्रख्यात पत्रकार, एडवोकेट और लेखक शामिल हैं; की गिरफ्तारी भारतीय राज्यसत्ता की निरंकुशता के खतरनाक स्तर तक पहुंचने का भयावह संकेत है! इनमें ‘इकोनामिक एंड पोलिटिकल वीकली’ जैसी देश की श्रेष्ठतम पत्रिका से लंबे समय तक सम्बद्ध रहे जाने-माने पत्रकार और मानवाधिकार कार्यकर्ता गौतम नवलखा और आदिवासी हक के लिए आवाज उठाने वाली मशहूर एडवोकेट सुधा भारद्वाज सहित कई बुद्धिजीवी शामिल हैं।

अभी-अभी पता चला कि श्री नवलखा को नजरबंद रखा गया है। संभवतः कोर्ट में कल सुनवाई होगी। दलित मामलों के गंभीर जानकार और विख्यात लेखक आनंद तेलतुंबडे जैसे कई लोगों के महाराष्ट्र स्थित घरों पर छापेमारी की गई है! इनमें ज्यादातर पर जो आरोप लगे हैं, वे राजनीति-प्रेरित और हास्यास्पद हैं! अभिव्यक्ति पर अंकुश लगाने या असहमति की आवाज़ दबाने के लिए भारत में अब ‘इमरजेंसी’ लगाने की जरूरत क्या है?

Sheetal P Singh : “सरकार” को शक़ है कि नक्सली मोदी जी की हत्या की प्लानिंग कर रहे हैं। उसने प्लॉन का भंडाफोड़ करके देश के तमाम मानवाधिकारों के लिए लड़ने वालों को धर लिया है। मजिस्ट्रेट के यहां तो यह कहानी चल गई (इस देश में मजिस्ट्रेट आंख मूंद कर पुलिस की कहानी पर अदालत की मोहर लगाने की परंपरा बचाये हुए हैं) पर दिल्ली और चंडीगढ़ में हाई कोर्ट की स्क्रूटिनी में पता चला कि मामला कितना कागजी है! दोनों ही जगह पुलिस कोर्ट को यह बताने में पूरी तरह नाकाम रही कि गिरफ़्तार किये जा रहे लोगों पर स्पेसिफिक चार्ज क्या है? पुलिस की ओर से सामान्य व्याख्यान ही जारी रहा । सुनवाई आज भी चलेगी तबतक कम से कम सुधा भारद्वाज और गौतम नवलखा का ट्रांजिट रिमांड स्थगित हो गया है।

Sanjaya Kumar Singh : देश के छह राज्यों में छापे मारकर पांच जानी-मानी हस्तियों को गिरफ्तार किए जाने और इसकी कोशिश की खबर लगभग सभी अखबारों में पहले पेज पर है। मैंने कई अखबार देखे, कुछ में नहीं भी है। लेकिन बहुत कम। कुछ अखबारों ने बहुत ही रूटीन तरह से छापा है और कुछ ने बहुत ही विशेष तरीके से प्रमुखता देकर। हिन्दी और अंग्रेजी के ज्यादातर अखबारों में यह खबर लीड ही है। पर दैनिक जागरण अपने शीर्षक के लिए अनूठा है। यही नहीं, गिरफ्तारी सरकार विरोधी बुद्धिजीवियों की हुई है पर जागरण ने ऐसे छापा है जैसे सचमुच हत्याआरोपियों की गिरफ्तारी हुई हो। यह सही है कि पुलिस की विज्ञप्ति में ऐसे लोगों में भेद नहीं किया जाता है पर संपादकीय आजादी और बुद्धिमत्ता या रुझान ऐसे ही मौकों पर देखने को मिलता है।

दैनिक जागरण का शीर्षक है, “मोदी की हत्या की साजिश में पांच गिरफ्तार”। दूसरी लाइन है, “भीमा कोरेगांव की हिंसा की जांच में छह राज्यों में छापे, सुधा भारद्वाज, वरवर राव, गौतम नवलखा धरे गए”। प्रभात खबर का डिसप्ले जबरदस्त है। प्रभात खबर के साथ खास बात यह रही कि छापे वाले देश के पांच शहरों में एक रांची भी रहा औऱ मैंने रांची एडिशन ही देखा। हालांकि, हमेशा की तरह सबसे सूचनाप्रद खबर टेलीग्राफ की रही। टेलीग्राफ ने गिरफ्तार किए गए (या निशाने पर लिए गए) पांचों लोगों लोगों का परिचय भी छापा है। वैसे तो जागरण ने भी परिचय छापा है। आप देखिए और इसकी तुलना टेलीग्राफ के परिचय से कीजिए। वैसे भी, दैनिक जागरण ने चार जनों का ही परिचय छापा है। अखबारों की दुनिया, उनकी समझदारी, जानकारी और रुझान को समझने के लिए कई अखबार पलटना अलग मनोरंजन है। अगर सुविधा और समय हो।

Ajay Prakash : वरवरा राव देश के लोकप्रिय जनकवि हैं औऱ गौतम नवलखा ने हंस पत्रिका को जिंदा रखने में बड़ी भूमिका निभाई है, उम्मीद है दिल्ली-एनसीआर के साहित्यकार विरोध प्रदर्शन में पहुचेंगे

Pushya Mitra : हमारे पीएम सबसे सहज और सुरक्षित कहाँ होते हैं?- व्यापारियों के बीच। हमारे पीएम को किनसे जान का खतरा है?- पढ़े लिखे और गरीबों के बीच रहने वालों से। ऐसे में सरकार को मेरा सुझाव है। तत्काल प्रभाव से देश के सभी शिक्षण संस्थानों को या तो बन्द कर दें या दुकानों में बदल दें। और गरीबों को जाकर फेक आएं बंगाल की खाड़ी में।

Dhruv Gupt : आपातकाल की आहट? नक्सलवादियों का उद्देश्य कागज़ पर चाहे जितना मानवीय और न्यायसंगत लगे, मैं उनकी हिंसा की राजनीति का विरोधी रहा हूं। मैंने नक्सली कहे जाने वाले इन लोगों की कार्यप्रणाली और बर्बरता को बहुत निकट से देखा है। सैद्धांतिक रूप से ये आदिवासियों और दलितों के प्रतिरोध की आवाज़ होने के जितने भी दावे करें, ज़मीन पर यह संगठन अपराधियों, लुटेरों, रंगदारों और अय्याशों के संगठित गिरोह के सिवा कुछ भी नहीं। वैसे भी कोई राजनीतिक विचारधारा एक इंसानी जान से ज्यादा क़ीमती नहीं हो सकती। वर्तमान सड़ी-गली और जनविरोधी सरकार को उखाड़ फेंकना ज़रूरी है लेकिन यह क्रान्ति हिंसा से नहीं, अहिंसक प्रतिरोध और लोकतांत्रिक रास्तों से ही आएगी। सरकार और पुलिस द्वारा हिंसा की राजनीति करने वालों का दमन बुरी बात नहीं। अगर कुछ नक्सल समर्थकों द्वारा देश के प्रधानमंत्री की हत्या की योजना बनाई गई है तो साक्ष्य जुटाकर उनके खिलाफ कठोर कार्रवाई होनी ही चाहिए। लेकिन कल से देश के विभिन्न भागों से अरबन नक्सली या हिंसक नक्सलवाद का समर्थक बताकर जिस तरह स्वतंत्र लेखकों, विचारकों, न्याय के लिए लड़नेवाले वकीलों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, समाज सेवियों और सत्ता के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने वाले लोगों की गिरफ्तारियों का सिलसिला शुरू हुआ है, उससे यह संदेह गहरा हुआ है कि प्रधानमंत्री पर खतरे की आड़ में कही सत्ता और व्यवस्था के ख़िलाफ़ उठने वाली तमाम आवाज़ों को ख़ामोश करने का सिलसिला तो नहीं शुरू हो गया है? जहां तक जानकारी मिली है, इनमें से कोई भी व्यक्ति राजनीतिक या सामाजिक बदलाव के लिए हिंसा की राजनीति का कभी समर्थक नहीं रहा है। सरकार और व्यवस्था से की आंखों में आंखें डालकर सवाल पूछने का साहस करिए अन्यथा बहुत देर हो जाएगी। आज ये लोग गिरफ्तार हो रहे हैं। कल आपकी और हमारी बारी भी आ सकती है।

Priyabhanshu Ranjan : उन लोगों का संक्षिप्त परिचय जिनके घरों में आज महाराष्ट्र पुलिस ने छापेमारी की और उन्हें गिरफ्तार किया : –

(1) वरवर राव: – राव 1957 से कविताएं लिख रहे हैं। वीरासम (क्रांतिकारी लेखक संगठन) के संस्थापक सदस्य राव को अक्तूबर 1973 में आंतरिक सुरक्षा रखरखाव कानून (मीसा) के तहत गिरफ्तार किया गया था। साल 1986 के रामनगर साजिश कांड सहित कई अलग-अलग मामलों में 1975 और 1986 के बीच उन्हें एक से ज्यादा बार गिरफ्तार और फिर रिहा किया गया। करीब 17 साल बाद 2003 में राव को रामनगर साजिश कांड में बरी कर दिया गया। राव को एक बार फिर आंध्र प्रदेश लोक सुरक्षा कानून के तहत 19 अगस्त 2005 को गिरफ्तार कर हैदराबाद के चंचलगुडा सेंट्रल जेल में भेज दिया गया। 31 मार्च 2006 को लोक सुरक्षा कानून के तहत चला मुकदमा निरस्त कर दिया गया और राव को अन्य सभी मामलों में जमानत मिल गई।

(2) अरुण फेरेरा: – मुंबई में रहने वाले नागरिक अधिकार कार्यकर्ता फेरेरा को 2007 में प्रतिबंधित भाकपा (माओवादी) की प्रचार एवं संचार शाखा का नेता बताया गया। उन्हें 2014 में सभी आरोपों से बरी कर दिया गया। अपनी किताब ‘कलर्स ऑफ दि केज: ए प्रिजन मेमॉयर’ में फेरेरा ने जेल में बिताए करीब पांच साल का ब्योरा लिखा है।

(3) सुधा भारद्वाज: – सुधा छत्तीसगढ़ में अपने काम के लिए जानी-पहचानी जाती हैं। वह 29 साल तक वहां रही हैं और दिवंगत शंकर गुहा नियोगी के छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा की सदस्य के तौर पर भिलाई में खनन श्रमिकों के अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ चुकी हैं। आईआईटी कानपुर की छात्रा होने के दौरान पश्चिम बंगाल, बिहार और उत्तर प्रदेश में बिताए दिनों में श्रमिकों की दयनीय स्थिति देखने के बाद उन्होंने छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा के साथ 1986 में काम करना शुरू किया था। नागरिक अधिकार कार्यकर्ता एवं वकील सुधा जमीन अधिग्रहण के खिलाफ भी लड़ाई लड़ती रही हैं और वह अभी पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) की छत्तीसगढ़ इकाई की महासचिव हैं।

(4) सुजैन अब्राहम्: – नागरिक अधिकार कार्यकर्ता सुजैन ने एल्गार परिषद के कार्यक्रम के सिलसिले में पुलिस की ओर से जून में की गई छापेमारियों के दौरान गिरफ्तार किए गए कई लोगों की अदालत में पैरवी की थी। सामाजिक कार्यकर्ता वर्नोन गौन्जैल्विस की पत्नी सुजैन केरल में एक शिक्षक परिवार में पैदा हुईं और जांबिया में पढ़ाई की। उन्होंने नोटबंदी के खिलाफ भी प्रदर्शन किया था। उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर जी एन साईबाबा, सामाजिक कार्यकर्ता प्रशांत राही एवं अन्य को दिए गए सश्रम कारावास के खिलाफ काफी लिखा है और इसे ‘गैर कानूनी गतिविधि निरोधक कानून का दुरूपयोग’ करार दिया है।

(5) वर्नोन गौन्जैल्विस :- वर्नोन के दोस्तों की ओर से चलाए जा रहे एक ब्लॉग में उन्हें ‘न्याय, समानता एवं आजादी का जोरदार पैरोकार’ बताया गया है। मुंबई यूनिवर्सिटी से स्वर्ण पदक विजेता और रूपारेल कॉलेज एंड एचआर कॉलेज के पूर्व लेक्चरर वर्नोन के बारे में सुरक्षा एजेंसियों का आरोप है कि वह नक्सलियों की महाराष्ट्र राज्य समिति के पूर्व सचिव और केंद्रीय कमेटी के पूर्व सदस्य हैं। उन्हें करीब 20 मामलों में आरोपित किया गया था और साक्ष्य के अभाव में बाद में बरी कर दिया गया। उन्हें छह साल जेल में बिताने पड़े।

(6) गौतम नवलखा :- नवलखा दिल्ली में रहने वाले पत्रकार हैं और पीपुल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स (पीयूडीआर) से जुड़े रहे हैं। वह प्रतिष्ठित पत्रिका ‘इकनॉमिक एंड पोलिटिकल वीकली’ के संपादकीय सलाहकार हैं। उन्होंने सुधा भारद्वाज के साथ मिलकर गैर-कानूनी गतिविधि निरोधक कानून 1967 को निरस्त करने की मांग की थी। उनका कहना है कि गैरकानूनी संगठनों की गतिविधियों के नियमन के लिए पारित किए गए इस कानून का गलत इस्तेमाल हो रहा है। पिछले दो दशकों से अक्सर कश्मीर का दौरा करते रहे नवलखा ने जम्मू-कश्मीर में कथित मानवाधिकार हनन के मुद्दे पर काफी लिखा है।

(7) आनंद तेलतुंबड़े : – इंजीनियर, एमबीए और पूर्व सीईओ आंनद दलित अधिकारों के चिंतक के तौर पर ख्यात हैं। उन्होंने कई जन आंदोलनों पर किताबें लिखी हैं। उन्होंने मुंबई यूनिवर्सिटी से साइबरनेटिक्स में पीएचडी की है। यह संयोग है कि उन्होंने अक्सर दलील दी है कि दलितों के लिए आरक्षण ने उन्हें लांछित किया है और भारत की राजव्यवस्था में जाति को पवित्रता प्रदान किया है।

(8) फादर स्टन स्वामी:- मानवाधिकार कार्यकर्ता फादर स्टन स्वामी ने विस्थापन विरोधी जनविकास आंदोलन की स्थापना की, जो आदिवासियों एवं दलितों के अधिकारों की लड़ाई लड़ता है। स्वामी उन 20 लोगों में शामिल थे जिनके खिलाफ पिछले साल जुलाई में राजद्रोह का केस दर्ज किया गया था। उन पर पत्थलगडी आंदोलन के मुद्दे पर तनाव भड़काने के लिए झारखंड सरकार के खिलाफ बयान जारी करने के आरोप थे।

(9) क्रांति टेकुला : – क्रांति ‘नमस्ते तेलंगाना’ के पत्रकार हैं।

सौजन्य : फेसबुक

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