कितना खतरनाक है नया संशोधित श्रम कानून, देखें

श्रम कानून में संशोधन से बंधुवा मजदूरी को बढ़ावा मिलेगा : अजय मुखर्जी

अब दुकान कर्मचारी की भंति पत्रकारों को सिर्फ मंहगाई भत्ता दिया जाएगा, छंटनी भी बढ़ेगी

केन्द्र सरकार द्वारा श्रम कानूनों में संशोधन को कोविड -19 की महामारी के समय चोरी छिपे लाकर बिना प्रश्नोउत्तरी के पेश कर बिना बहस के पास करवाना श्रम कानूनों के जरिए मिले सामाजिक सुरक्षा की हत्या करने के समान है।

वर्षों से प्राप्त श्रमिकों के अधिकार को इस संशोधन बिल 2020 के जरिये समाप्त कर दिया गया। वर्तमान श्रम संशोधन बिल 2020 में 300 कर्मचारी के नीचे के किसी भी संस्थान को बन्द करना मालिक के अधिकार क्षेत्र में आ गया है। वह बंद करना चाहे तो अब उसके लिए किसी की अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं होगी।

किसी कर्मचारी की सेवासमाप्ति, छंटनी करना जायज कर दिया गया है. श्रमिकों को वर्षों से प्राप्त औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 को खत्म किया जाना, समाजिक सुरक्षा का हनन, रोजगार की गारंटी आदि को पूंजीपतियों के हाथों में सौप दिया गया है।

वर्तमान श्रम संशोधन बिल 2020 से पूर्व पत्रकार व गैर पत्रकार के हितों की सुरक्षा के लिए वेज बोर्ड का गठन किया जाता था. इसे नए बिल में समाप्त कर दिया गया है.

अब दुकान कर्मचारी की भांति पत्रकारों को सिर्फ मंहगाई भत्ता दिया जाएगा। आने वाले दिनों में इस बिल की आड़ में बैंक, बीमा, रेलवे, भेल, कोल आदि संस्थानों में भी वेज बोर्ड को भी खत्म कर दिया जाएगा।

यह श्रम संशोधन बिल 2020 एक तानाशाही शासक की सनक की बानगी है।

देश के 70 प्रतिशत कामगार असुरक्षित हो गए हैं। जो बिल लाया गया है उस बिल के तहत राज्य बीमा कर्मचारी निगम, कर्मचारी भविष्य निधि के जरिए जो सामजिक सुरक्षा थी वो मिलेगा या नहीं मिलेगा, यह कहना बेहद मुश्किल हो गया है। इस सब कुछ को अन्धेरे में रखा गया है। इस श्रम संशोधन बिल में सेवायोजक संस्थानों को मात्र 2 घंटे, 4 घंटे के लिए नियुक्ति कर कार्य लिए जाने की व्यवस्था प्रदान की गई है। न्यूनतम मजदूरी पाने का जो कामगारों का अधिकार होता है उसे भी छीन लिया गया है, जो काला कानून व तुगलकी फरमान है।

इस श्रम संशोधन बिल 2020 में वर्ष 1926 में बनी ट्रेड यूनियन ऐक्ट को भी निष्प्रभावी कर दिया गया है। अब कोई नया यूनियन बनना चाहेगा तो उस संस्थान से अनुमति लेना अनिवार्य कर दिया गया है। क्या सेवायोजक अपने संस्थान में यूनियन बनाने की अनुमति प्रदान करेगा?

कोविड-19 की महामारी के दौरान उत्तर प्रदेश सरकार ने इस बिल की आड़ मे 39 श्रम कानूनों में से 36 श्रम कानूनों को अगले तीन वर्षों के लिए स्थगित कर दिया। इससे कामगार असुरक्षित हो गए और उनके लिए कोई कानून का दरवाजा खुला नहीं रह गया।

कोविड-19 की महामारी के दौरान इस बिल के आने से पूर्व श्रम कानूनों में वेतन न दिए जाने पर माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा यह कहा गया था कि सेवायोजक व कामगार आपसी बातचीत करके अपनी समस्या का समाधान करें। इस कानून से 15 करोड़ श्रमिकों को अपने वेतन से हाथ धोना पड़ जाएगा।

इस बिल के तहत ग्रेचुटी ऐक्ट में जो नियमित कामगार भुगतान रजिस्टर में होगे वो एक वर्ष पश्चात् सिर्फ उपादान राशि प्राप्त करने के अधिकारी होंगे। ऐसे में कैजुअल, पार्टटाइम व संविदा कर्मचारियों को कुछ भी नही मिलेगा। इस श्रम संशोधन बिल 2020 को तत्काल वापस लिया जाए ताकि श्रमिक सुरक्षित हो सकें।

अजय मुखर्जी
मंत्री / राज्य सचिव
उ0 प्र0 आखिल भारतीय ट्रेड यूनियन काँग्रेस
समाचार पत्र कर्मचारी यूनियन (पत्रकार व गैर-पत्रकार)
मोबाइल नंबर- 9838438210

प्रस्तुति- शशिकांत सिंह, मुंबई

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