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बिहार

क्या प्रशांत किशोर बिहार चुनाव जीत सकते हैं?

-अभिरंजन कुमार

सही बात यह है कि यदि सही से कुंडली खंगाली जाए तो आज के ज्यादातर विधायकों, सांसदों, मंत्रियों का भांडा फूट जाएगा। बिहार अनपढ़, अपराधी, भ्रष्ट, जातिवादी और परिवारवादी नेताओं का अड्डा बन चुका है।

    प्रशांत किशोर आज की तिथि तक चुनाव जीतने की स्थिति में भले नहीं दिखाई देते, लेकिन अंतिम परिणाम इस बात पर निर्भर करेगा कि

    1. अगले एक महीने में वे और क्या क्या खुलासे करते हैं?
    2. अपने खुलासों के पक्ष में क्या क्या सबूत देते हैं?
    3. जिनपर आरोप लगाए जा रहे हैं, वे उन आरोपों का बचाव कैसे करते हैं?
    4. अपने द्वारा लगाए गए आरोपों को अधिक ताकत देने और जनता के मन में स्थापित करने के लिए प्रशांत किशोर और क्या क्या करते हैं?
      और,
    5. अंततः किन उम्मीदवारों को वे चुनाव मैदान में उतारते हैं?

    हालांकि प्रशांत किशोर की भी अब तक की रणनीति यही दिखाई दे रही है कि जैसे भाजपा समर्थक मोदी के नाम पर, राजद समर्थक लालू के नाम पर वोट देते हैं, वैसे ही जनसुराज के मामले में भी उम्मीदवार गौण हो जाएं एवं लोग उन्हीं के नाम और चेहरे पर जनसुराज को वोट दे दें। अभी जनसुराज की स्थिति यह है कि उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष और प्रदेश अध्यक्ष तक डमी से ज्यादा कुछ दिखाई नहीं दे रहे, तो उन आम उम्मीदवारों की क्या हैसियत, जिनके नामों का अभी तक एलान भी नहीं हुआ है।

    बहरहाल, चाहे प्रशांत किशोर की जो भी रणनीति हो, अगर वे उसे एरर फ्री तरीके से लागू करने में कामयाब हो गए, तो अभी अपेक्षित परिणाम यानी एनडीए की विजय की संभावना दो तरह से प्रभावित हो सकती है –

    1. प्रशांत किशोर एनडीए को तगड़ी क्षति पहुंचाएं और इसका सर्वाधिक लाभ महागठबंधन को मिले और उसकी सरकार बन जाए।
    2. प्रशांत किशोर एनडीए को तगड़ी और महागठबंधन को सामान्य क्षति पहुंचाएं और बिहार में दोनों को बहुमत प्राप्त करने से रोक दें और राज्य में त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति पैदा हो जाए।

    यूं तो चुनाव में वोटिंग खत्म होने से पहले कोई भी भविष्यवाणी करना जोखिम से खाली नहीं, लेकिन बिहार जैसे जटिल राजनीतिक और सामाजिक समीकरणों वाले राज्य में पहले चुनाव में ही उनका बहुमत प्राप्त करना संभव नहीं लगता। इसके कई ठोस कारण हैं।

    1. एनडीए सरकार ने समूचे बिहार में विशाल लाभार्थी वर्ग तैयार कर लिया है, जो लाभ देने वाली सरकार को उलटने का जोखिम तब तक नहीं उठाना चाहेगा, जब तक कि वह सुनिश्चित न हो कि अगली सरकार किसकी आएगी और उसे उस आने वाली सरकार से क्या निश्चित फायदे मिलने वाले हैं।
    2. बिहार में जिन जातियों समुदायों के अपने राजनीतिक दल और नेता हैं, वे आम तौर पर अपने राजनीतिक दल और नेता के साथ बने हुए हैं। वे उन्हें छोड़कर किसी और के साथ चले जाएं, यह आसान नहीं है। आज एनडीए और महागठबंधन दोनों के अपने अपने मजबूत जातीय समीकरण हैं। जैसे मुस्लिम यादव महागठबंधन को छोड़कर जनसुराज को वोट दे दें, यह संभव नहीं है। इसी तरह कुर्मी नीतीश कुमार का, पासवान चिराग पासवान का साथ छोड़ दें, यह संभव नहीं है।
    3. एनडीए और महागठबंधन दो में से किसी को वोट देने वाले वोटर मतदान के दिन जनसुराज को वोट देने से पहले यह अवश्य सुनिश्चित करना चाहेंगे कि कहीं उनके पालाबदल करने से विरोधी गठबन्धन का उम्मीदवार न जीत जाए। यानी अगर एनडीए समर्थक को लगेगा कि उसके पालाबदल का लाभ महागठबंधन उम्मीदवार को मिल सकता है, तो वह पालाबदल नहीं करेगा। इसी तरह यदि महागठबंधन के वोटर को लगेगा कि उसके पालाबदल का लाभ एनडीए उम्मीदवार को मिल जाएगा तो वह भी पालाबदल नहीं करेगा।

    उपरोक्त तीन स्थितियों के परिप्रेक्ष्य में

    1. बिहार में 100 प्रतिशत में लगभग 70 प्रतिशत वोट मजबूत जातीय प्रतिबद्धताओं और एनडीए व महागठबंधन समर्थकों में एक दूसरे से डर के कारण फिक्स हैं।
    2. बचे हुए 30 प्रतिशत में वैसी मजबूत जातीय प्रतिबद्धता तो नहीं है, लेकिन कम से कम 15 प्रतिशत लाभार्थी योजनाओं वाली प्रतिबद्धता से जुड़े हैं।

    इस प्रकार बिहार में अधिकतम 15 प्रतिशत वोट बचते हैं, जिन्हें मौजूदा परिस्थितियों में प्रशांत अपनी तरफ आकर्षित कर सकते हैं। कई सर्वेक्षणों के हिसाब से अभी वे लगभग 8 से 10 प्रतिशत तक पहुंच चुके हैं।

    यदि वे किसी गठबन्धन का हिस्सा होते, तो इन 10 (अभी) से 15 (स्कोप) प्रतिशत वोटों के साथ भी वे अच्छी संख्या में सीटें जीत सकते थे, लेकिन चूंकि वह अकेले चुनाव लड़ रहे हैं तो यह बहुत मुश्किल है कि इतने वोटों से सीटों की संख्या में क्रांति कर सकेंगे।

    हालांकि ऐसा लग रहा है कि पीके मुस्लिम बहुल विधानसभा क्षेत्रों में महागठबंधन के साथ एक हिडेन अलायंस बनाना चाह रहे हैं, क्योंकि उन्होंने कहा है कि जिन सीटों पर महागठबंधन मुस्लिम उम्मीदवार उतारेगा, उन सीटों पर वे मुस्लिम उम्मीदवार नहीं उतारेंगे।

    यदि ऐसा होता है, तो इससे कुछ सीटों पर महागठबंधन को और कुछ सीटों पर उन्हें फायदा मिल सकता है, लेकिन पूरे बिहार में यह संदेह चला जाएगा कि चूंकि प्रशांत किशोर इस बार खुद तो सरकार बना नहीं सकते, तो क्या वे एनडीए को हराकर महागठबंधन की सरकार बनवाने की योजना पर काम कर रहे हैं?

    प्रशांत किशोर की पूरी योजना और रणनीति में इस संदेह को बढ़ावा देने वाले बीज तत्व प्रचुर मात्रा में मौजूद हैं।

    1. 2014 लोकसभा चुनाव के बाद उन्होंने कभी भी भाजपा या सहयोगी दलों के लिए रणनीति नहीं बनाई, विपक्षी दलों के लिए ही काम किया है। बीच में नेता के तौर पर जेडीयू से जरूर जुड़े, लेकिन जल्दी ही निकल भी गए।
    2. ऐसा समझा जाता है कि पिछले कुछ वर्षों में उनपर पैसा लगाने वाले और खासकर बिहार चुनाव के लिए पैसा देने वाले ज़्यादातर या सभी लोग भाजपा विरोधी हैं।
    3. खुद प्रशांत किशोर यह कहते रहे हैं कि उनकी विचारधारा आज़ादी से पहले वाली कांग्रेस जैसी है।
    4. हाल में भी प्रशांत किशोर ने एक इंटरव्यू में साफ तौर पर यह कहा कि अपनी योजनाओं के साथ वे राहुल गांधी से मिले थे, जब उनके साथ उनकी बात नहीं बनी, तो अपनी पार्टी बनाकर उसी योजना को वे बिहार में आजमा रहे हैं।
    5. शुरू में लालू यादव को चारा चोर और तेजस्वी को नौवीं फेल कहकर एनडीए समर्थकों, खासकर बिहार की अगड़ी जातियों में यह संदेश तो भेजा कि हम आपसे अलग नहीं हैं, लेकिन अब वे महागठबंधन नेताओं पर नहीं, बल्कि चुन चुनकर केवल एनडीए नेताओं को ही निशाना बना रहे हैं।
    6. मुस्लिम उम्मीदवारों के मामले में महागठबंधन से सांकेतिक गठबंधन की बात तो खुलकर वे कर ही चुके हैं।

    तो अगर एनडीए के नेता अगले एक महीने में यह सिद्ध कर दें कि जनसुराज कुछ और नहीं, बल्कि बिहार में महागठबंधन की सरकार बनवाने का हिडेन एजेंडा है, तो प्रशांत किशोर को यह सारा खेल बैकफायर भी कर सकता है और वे 15 प्रतिशत वोटों की तरफ बढ़ने के बजाय मौजूदा 10 प्रतिशत वोटों से नीचे भी लुढ़क सकते हैं।

    इसके लिए एनडीए को ज़्यादा कुछ करने की जरूरत नहीं होगी। केवल

    1. जिन नेताओं पर आरोप लग रहे हैं, उन्हें साइडलाइन कर देना होगा। उन्हें स्टार प्रचारक वगैरह नहीं बनाना होगा। चुनाव मैदान से भी दूर रखना होगा। वे मंत्री, उपमुख्यमंत्री, मुख्यमंत्री बन सकते हैं, ऐसे संदेश को जनता में जाने से रोकना होगा।
    2. प्रशांत किशोर के आर्थिक स्रोतों की गहन समीक्षा जनता में पेश करनी होगी और उनके लूप होल्स को हाइलाइट करना होगा।
    3. यह सिद्ध कर देना होगा कि प्रशांत किशोर इस बार का चुनाव खुद जीतने के लिए नहीं, बल्कि महागठबंधन को जिताने और उसकी सरकार बनवाने के लिए लड़ रहे हैं।

    मतलब, बिहार चुनाव की परतें अभी पूरी तरह से खुली नहीं हैं और बहुत सारे खेल अभी बाकी हैं। लेकिन फिलहाल इतना सच है कि

    1. बिहार में सबसे ज्यादा सुर्खियां इस वक्त प्रशांत किशोर बटोर रहे हैं।
    2. मेनस्ट्रीम इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में उन्हें पूरा कवरेज मिल रहा है, क्योंकि उनके नाम और चेहरे पर जमकर टीआरपी मिल रही है।
    3. सोशल मीडिया मैनेजमेंट के वे पहले से ही किंग रहे हैं, इसलिए अपना सोशल मीडिया भी बहुत मजबूत कर लिया है। अन्य लोग भी उनकी चर्चा करने को मजबूर हैं।
    4. लगभग पूरा बिहार वे घूम चुके हैं, जिसके कारण कुछ न कुछ मात्रा में पूरे बिहार के लोग उनसे जुड़े हैं।
    5. पूरे बिहार में हर विधानसभा सीट पर वे अपना नेटवर्क भी फैला चुके हैं, हालांकि उनका कार्यकर्ता आधार अभी स्थापित राजनीतिक दलों की तरह मज़बूत नहीं हुआ है। इसकी जगह पेड वर्करों का बोलबाला है।
    6. पैसे की कमी उन्हें है नहीं। यहां तक कि इस विधानसभा चुनाव में जितने पैसे वे खर्च कर रहे हैं, उतना शायद कोई भी दूसरी पार्टी खर्च नहीं कर पा रही है।
    7. बिहार के किसी दूसरे नेता में उनसे बहस करने या उलझने लायक योग्यता फिलहाल दिखाई दे नहीं रही।
    8. चूंकि वे लगभग सभी राजनीतिक दलों/गठबंधनों के साथ काम कर चुके हैं, तो उन्हें लगभग सारे राजनीतिक दलों के भेद भी मालूम हैं।
    9. चूंकि वे लगभग सभी राजनीतिक दलों/गठबंधनों के साथ काम कर चुके हैं, तो लगभग सभी राजनीतिक दलों के भीतर उनकी घुसपैठ भी है।
    10. इस चुनाव के लिए पिछले तीन वर्षों से उन्होंने सुनियोजित तरीके से तैयारी की है। मुमकिन है कि उन्होंने इन तीन वर्षों का स्टेप बाय स्टेप प्लान बनाकर काम किया है और सब कुछ स्क्रिप्टेड है। इसीलिए पैसे की भी उन्हें कोई कमी नहीं है। सारा प्रबंध पहले ही कर लिया गया। फाइनेंसर्स भी पहले ही तैयार कर लिए गए। पूरा आश्वासन रहा होगा कि आप आगे बढ़ें, आपको पैसे की कोई कमी नहीं होने दी जाएगी।

    तो लब्बोलुआब क्या निकला? बिहार का चुनाव कभी किसी के लिए आसान नहीं रहा। जो बीस साल से राज कर रहे हैं, वे भी अपने दम पर नहीं, बल्कि दूसरों के सहारे ही हैं। यूं ही नहीं बिहार में किसी भी एक पार्टी के लिए 20-22 प्रतिशत से अधिक वोट हासिल करना चुनौतीपूर्ण बना हुआ है। धन्यवाद।

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