
कन्हैया शुक्ला-
भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ ज़ीरो टॉलरेंस का दावा करने वाली आम आदमी पार्टी की सरकार की नाक के नीचे एक ऐसा घोटाला रचा जा रहा है जो न सिर्फ़ पारदर्शिता के दावों को खोखला साबित करता है बल्कि सरकारी खज़ाने पर करोड़ों का बोझ डालने जा रहा है। अरविंद केजरीवाल मंचों से भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, संजय सिंह संसद में खड़े होकर सरकारी एजेंसियों को घेरते हैं, लेकिन सवाल है—क्या उन्हें अपने ही राज्य पंजाब में चल रही इस संगठित लूट की भनक तक नहीं है या फिर जानबूझकर अनजान बने बैठे हैं?
पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार आई थी ‘बदलाव’ और ‘ईमानदार सिस्टम’ के नाम पर। लोगों ने उम्मीद की थी कि अब बोली-टेंडर की प्रक्रियाएँ साफ़-सुथरी होंगी, घोटालों और मिलिभगत पर लगाम लगेगी, और जनता के पैसे का सही इस्तेमाल होगा। लेकिन जो हकीकत सामने आ रही है वह चौंकाने वाली है—सरकारी विभागों और ठेकेदारों की मिलीभगत से टेंडर ऐसे डिज़ाइन किए जा रहे हैं कि नाकाबिल और अनुभवहीन कंपनियाँ भी योग्य ठहरा दी जाती हैं और करोड़ों की परियोजनाएँ पहले से तय खिलाड़ियों की झोली में डाल दी जाती हैं।
यह सब उस सरकार में हो रहा है जो खुद को ‘ईमानदारी की मिसाल’ और ‘भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ जंग’ का चेहरा बताती है। अगर पंजाब इंफोटेक के स्मार्टफोन टेंडर में गड़बड़ियों की ये परतें सच हैं तो यह न सिर्फ़ आप सरकार के दावों की पोल खोलती हैं बल्कि यह भी दिखाती हैं कि भ्रष्टाचार का वायरस कितना गहराई तक सरकारी ढांचे में फैला हुआ है। सवाल सीधा है—क्या केजरीवाल और संजय सिंह इस सुनियोजित खेल से वाकिफ़ हैं, और अगर हाँ, तो क्या उनकी चुप्पी ही इस मिलीभगत की सबसे बड़ी गवाही नहीं है? अगर नहीं, तो क्या वे अब इस प्रकरण की जाँच कराकर एक्शन लेंगे?

पहले जानिये Punjab Infotech का पूरा नाम और काम क्या है। इसका पूरा नाम है- Punjab Information and Communication Technology Corporation Limited। यह पंजाब सरकार की एक पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग (PSU) है। इसे पंजाब सरकार ने राज्य में आईटी, इलेक्ट्रॉनिक्स, सॉफ्टवेयर, हार्डवेयर और ई-गवर्नेंस को बढ़ावा देने के लिए बनाया था। इसका मालिकाना हक़ पंजाब सरकार के पास है और यह सीधे तौर पर Department of Industries & Commerce, Government of Punjab के अधीन काम करती है। कई बार इसे अन्य विभागों (जैसे Social Security & Women & Child Development) की ओर से procurement agency की तरह इस्तेमाल किया जाता है। मतलब साफ़ है कि Punjab Infotech सरकार का ही हिस्सा है, और जो भी टेंडर या खरीदी यह करती है, उसकी जिम्मेदारी सीधे राज्य सरकार पर आती है।
अब जानिये पूरा प्रकरण क्या है-
पंजाब इंफोटेक द्वारा 27 जून 2025 को जारी टेंडर (नं. GEM/2025/B/6391039) के जरिए 28,515 स्मार्टफोन खरीद की प्रक्रिया गंभीर विवादों में घिर गई है। यह टेंडर सामाजिक सुरक्षा एवं महिला एवं बाल विकास विभाग, पंजाब की ओर से जारी हुआ था। आरोप है कि इसमें अनिवार्य शर्तों की अनदेखी की गई और मूल्यांकन प्रक्रिया को इस तरह से संचालित किया गया जिससे पहले से तय परिणाम निकल सके।
शिकायत में कहा गया है कि चावला डिजिटल सिस्टम्स प्राइवेट लिमिटेड के आकाश चावला और पंजाब इंफोटेक की एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर (HoD ITeG डिवीजन) अशूनीत कौर के बीच मिलीभगत से पूरा खेल रचा गया। चावला डिजिटल ने लावा इंटरनेशनल के साथ मिलकर भागीदारी की, लेकिन उसकी वास्तविक क्षमता और वित्तीय विश्वसनीयता संदिग्ध है। इसके बावजूद कंपनी ने टेंडर स्ट्रक्चर और तकनीकी क्वालिफिकेशन को अपने हिसाब से प्रभावित किया।
गंभीर आरोप यह भी है कि जिन कंपनियों ने मोबाइल डिवाइस मैनेजमेंट (MDM) फीचर का सुरक्षित चैट फ़ंक्शनलिटी कभी प्रदर्शित ही नहीं किया, उन्हें केवल कागज़ी अनुपालन के आधार पर योग्य घोषित कर दिया गया। जबकि ऐसे फीचर को सपोर्ट करने वाले असली MDM प्रदाता भारत में गिने-चुने हैं और उन्होंने किसी बोलीदाता को मैन्युफैक्चरर ऑथराइजेशन फॉर्म भी जारी नहीं किया।
शिकायतकर्ताओं का कहना है कि यह न सिर्फ नियमों की खुली अवहेलना है बल्कि इससे सरकारी खरीदी की पारदर्शिता और प्रतिस्पर्धा पूरी तरह से खत्म हो गई है।
अनुभवहीन कंपनियों की क्वालिफिकेशन, NABL रिपोर्ट और बजट में गड़बड़ी भी उजागर
टेंडर पर उठे सवाल यहीं तक सीमित नहीं हैं। आरोप है कि सैमसंग के साथ बोली लगाने वाली SISL इंफोटेक प्राइवेट लिमिटेड के पास चार साल का अनिवार्य अनुभव ही नहीं था, फिर भी उसे तकनीकी रूप से योग्य मान लिया गया। उनके अनुभव प्रमाणपत्रों को संदिग्ध बताया गया है और मांग की गई है कि आपूर्ति आदेश, चालान और बैंक स्टेटमेंट जैसे सबूत प्रस्तुत किए जाएं।
इसके अलावा, अनिवार्य NABL टेस्ट रिपोर्ट, BIS और अन्य सर्टिफिकेशन बोली के समय जमा नहीं किए गए। इसके बावजूद विभाग ने बोलीदाताओं को बाद में दस्तावेज़ जमा करने की छूट दी, जो खरीद नियमों का सीधा उल्लंघन है। आरोप है कि कुछ कंपनियों ने पोस्ट-डेटेड MAF और मेक इन इंडिया सर्टिफिकेट भी बाद में जमा कर दिए।
सबसे गंभीर सवाल बजट पर उठ रहा है। केंद्र सरकार की योजना के तहत प्रति स्मार्टफोन 10,000 रुपये (+GST) यानी 11,800 रुपये का बजट निर्धारित है। इसके बावजूद पंजाब इंफोटेक ने टेंडर वैल्यू को इतना बढ़ाया कि एक स्मार्टफोन की कीमत लगभग 20,000 रुपये मान ली गई। इससे सरकारी खजाने पर 22–23 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ने की आशंका जताई गई है।
शिकायत में साफ कहा गया है कि पूरा टेंडर पहले से तय परिणाम की ओर ले जाया जा रहा है, जिसमें वास्तविक प्रतियोगिता का कोई स्थान नहीं है। इससे न सिर्फ सरकारी धन की बर्बादी होगी बल्कि आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को भी घटिया और गैर-मानक उपकरण मिलने का खतरा है।
शिकायतकर्ताओं ने मुख्यमंत्री के मुख्य सचिव, सामाजिक सुरक्षा एवं महिला एवं बाल विकास विभाग और गवर्नमेंट ई-मार्केटप्लेस (GeM) के सीईओ से तत्काल हस्तक्षेप कर इस बोली प्रक्रिया को रोकने और नया टेंडर जारी करने की अपील की है।
इसी संदर्भ में सबसे गंभीर आरोप यह है कि पूरा खेल पंजाब डेवलपमेंट कमीशन के सदस्य श्री अनुराग कुंडू के इशारे पर रचा गया। कुंडू ने यह भूमिका किसी व्यक्तिगत स्तर पर नहीं निभाई बल्कि सीधे दिल्ली से मिले आदेशों पर काम किया। दिल्ली से मिले इन निर्देशों को कुंडू ने मुख्यमंत्री कार्यालय तक पहुँचाया और उन्हें अपने सुझावों के रूप में प्रस्तुत किया। मुख्यमंत्री कार्यालय ने इन शर्तों को बिना किसी सवाल-जवाब के स्वीकार किया और फिर पंजाब इंफोटेक को इन्हीं निर्देशों के आधार पर कार्य करने का आदेश दिया। इस तरह आदेशों की यह पूरी श्रृंखला दिल्ली से शुरू होकर कुंडू के माध्यम से मुख्यमंत्री कार्यालय तक और फिर पंजाब इंफोटेक तक पहुँची। यही कारण है कि पूरा टेंडर तकनीकी प्रक्रिया नहीं बल्कि राजनीतिक योजना की तरह संचालित हुआ, ताकि पहले से तय कंपनियों को लाभ पहुँचाया जा सके।
आम आदमी पार्टी की सरकार पारदर्शिता और भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ सबसे ऊँची आवाज़ उठाने का दावा करती है। अरविंद केजरीवाल और संजय सिंह जनता के सामने बड़ी-बड़ी बातें करते हैं। लेकिन सवाल है—क्या उन्हें पंजाब में अपनी ही सरकार की नाक के नीचे चल रहे इस सुनियोजित भ्रष्टाचार का पता है या वे जानबूझकर चुप हैं?
पंजाब इंफोटेक, जो खुद सरकार का हिस्सा है, ने 28,515 स्मार्टफोन खरीदने के लिए निकाले गए टेंडर में ऐसी धांधली की है कि ईमानदारी और पारदर्शिता के सारे दावे मज़ाक बनकर रह गए हैं। अनुभवहीन कंपनियों को क्वालिफाई कराना, अनिवार्य NABL रिपोर्ट्स को बाद में स्वीकार करना, और बजट को फर्जी तरीके से इतना बढ़ा देना कि सरकारी खजाने पर 20 करोड़ से ज़्यादा का अतिरिक्त बोझ आ जाए—यह सब मिलकर बताता है कि सिस्टम को अंदर से कैसे दीमक खा रही है।
क्या यही है “ईमानदार राजनीति”?
क्या यही है “झाड़ू से सफाई”?
क्या यही है “भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ लड़ाई”?
इस प्रकरण से जुड़े सभी दस्तावेज, शिकायत, टेंडर आदि भड़ास के पास सुरक्षित है जिसे सक्षम अथॉरिटी के समक्ष प्रस्तुत किया जा सकता है। इस मामले में अगर किसी भी आरोपी पक्ष को अपनी कोई बात कहना बताना है तो भड़ास को मेल कर सकते हैं- [email protected]



