भारत में राजनीतिक आदर्श-शून्यता का दौर

डॉ राजीव रंजन-

अनिश्चितता राजनीति की चिरस्थाई प्रकृति है। अगर मौजूदा दौर के सत्ता की बात करें तो इसकी शुरुआत 2014 के लोकसभा के प्रयासो में देखी जा सकती है। बाबा रामदेव और अन्ना हज़ारे के दो आंदोलनों तथा इण्डिया अगेन्स्ट करप्शन के भी देशव्यापी प्रयास ने काँग्रेस के प्रति लोगों की नाराजगी को गहरा किया था । मंहगाई, भ्रष्टाचार और भारत की आर्थिक स्थिति जैसे मुद्दे कांग्रेस के पतन के प्रमुख करणों में से एक थे । इन आन्दोलनों ने यूपीए की राजनीतिक साख को काफी हद तक प्रभावित कर दिया। सत्ता के खिलाफ हुए इन संघर्षो में भारतीय जनता पार्टी कही दूर दूर तक भी सम्मलित नहीं थी । परन्तु जब विकल्प की बात आई तो अपने को विकल्प के तौर पर प्रस्तुत करने में सफल हो गई । आन्दोलन और एनजीओ से जन्मे आम आदमी पार्टी संगठनिक तौर पे नवजात थी, लिहाजा वो पूरे देश में अपने आप को बतौर विकल्प स्थापितं करने में असमर्थ रही ।

सांगठनिक तौर पे भाजपा के पास आरएसएस का कैडर था, लिहाजा जो जंग किसी और ने लड़ी थी उसमें भाजपा विजयी हुई। बहुत ही नाटकीय ढंग से भाजपा ने नरेंद्र मोदी जी को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार घोषित किया और उसके साथ गुजरात मॉडल, हिन्दुत्व और पूंजीवाद जैसे विचारो का एक संकलित प्रारूप की मदद से हिंदुत्व के रंग में रचे बसे हिन्दुओं को( खास कर उसका सबसे बड़ा तपका मध्यम वर्ग) तथा नए और बड़े लाभ जैसे स्वपन से ग्रसित भारतीय पूंजीपतियों को क्रमश आकर्षित किया। ये बात भी ध्यान देने योग्य है कि 2014 में राम मन्दिर और अनुच्छेद 370 जैसे मुद्दे इनके घोषणापत्र में गौण रहे ।

खुद बतौर भाजपा पीएम उमीदवार रहे नरेंद्र दामोदर दास मोदी इन मुद्दों को घोषणापत्र में शामिल करने पर सहज़ नहीं थे, जो उस समय तक निर्विवादित कट्टर हिन्दुत्व के आइकॉन माने जाते थे। बहरहाल भाजपा ने खुद को बड़ा खिलाडी घोषित कर, महंगाई, भ्रष्टाचार, आर्थिक विपन्नता, मुस्लिम तुस्टिकरण तथा पाकिस्तान और चाइना के सीमा विवाद जैसे राष्ट्रीय मसलों पर भी अपने को मजबूत विपक्ष के तौर पर प्रस्तुत किया। इसके लिए लोकलुभावन नारों के मदद से आशावादी राजनीति का अच्छा प्रयोग किया गया था। कभी आशावादी राजनीति का प्रयोग कर आम आदमी पार्टी ने दिल्ली विधानसभा में बड़ी जीत हासिल की थी। जहां तक भाजपा के वादो का सवाल है उनके वादों की अर्थहीनता जगजाहिर हैं। ये भी एक इतर बात है कि उन सारे वादो को पूरा करने के लिए जरूरी संसाधनों का घोर अभाव है और उन संसाधनों को पैदा करने की कोई राजनीतिक मंशा भी नहीं है।

अब परिस्थिति दूसरी है। अपना सात साल का कार्यकाल पूरा करने के बाद पार्टी फिर से उत्तर प्रदेश के चुनावी समर में है। इस दौरान उसने 2019 के लोकसभा चुनाव में पहले से भी उम्दा जीत दर्ज की. परन्तु उपलब्धियों पर कुछ ठोस नहीं कहा जा सकता. हालात पहले से भी बदतर है, पुरानी समस्याए यथावत है, और कई नयी समस्यावों ने फन उठा लिया. कोरोना काल में नौकरिया, अर्थव्यवस्था पहले से भी बद्तर है. ऑक्सीजन की घोर कमी , असंख्य लोगो की मौत, गंगा में तैरती लाशे, चीख व कोलाहाल बेशक लोग भूल गए हों परन्तु ये सत्य है कि मानवता इसकी भुक्तभोगी रही है. परंतु यह सरकार ऐसे किसी भी तोहमत को अपने ऊपर आने से रोकने का प्रयास बहुत ही संगठित तौर से करती रही हैं। पूंजी, धर्म, मीडिया और घृणा ऐसे प्रयासों का मूल तत्व है.

आज सत्तादल का गठजोड़ कुछेक कॉर्पोरेट घरानों से है जो देश की राजनीति को दिशा और दशा प्रदान करते है. आर्थिक लोकतंत्र और समाजवाद के अवधारणा के विपरीत ये देश के संसाधनों का संचय कुछ पूंजीपतियों के हाथ में है. ये खाई दिन प्रतिदिन बढती जा रही है. कोरोना काल में जहाँ लोग भूख और बेरोजगारी से लड़ रहे है, देश की जीडीपी -23.8 जा गिरी है, वहां सत्ता से नजदीकियां रखने वाले पूंजीपतियों के टर्न ओवर में दोगुना तक का इजाफा हुआ है. इसके एवज में कॉर्पोरेट पूंजी की मदद से मीडिया, धर्म तथा नफ़रत का प्रबंधन सत्ता दल के राजनितिक जनसांख्यिकी को बेहतर करने में की जाती रही है.

इस तरीके से भारतीय लोकतंत्र के अन्दर बहुसंख्यकवाद का तानाशाह पैदा हुआ है जिसके केंद्र में धर्म तथा पूंजी है. पूंजी के बिना धर्म अपाहिज है, और धर्म के बिना पूंजी असुरक्षित। इसके लिए मीडिया नियंत्रण अतिआवश्यक था जो किया गया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उन 37 राष्ट्राध्यक्षों या सरकार के प्रमुखों की सूची में शामिल हो गए हैं, जिन्हें वैश्विक निकाय रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (आरएसएफ) ने प्रेस स्वतंत्रता को नियंत्रण करने वालों (प्रीडेटर्स) के रूप में पहचाना है. आज की सत्ता पूंजी, मीडिया, धर्म तथा नफ़रत के अनैतिक मिश्रण से बनी इंधन के सहयोग से चल रही है.

2019 में लोकसभा चुनाव जीतने के पीछे भी कमोबेश हिंदुत्व ही था. क्युकी इसके दामन के ओट में हुकूमत अपने तमाम नाकामियों के साथ साथ पूंजीपतियों से अपने संबंधो पर भी परदा डाल देती है. हिंदुराष्ट्र का चादर इनके नाकामियों को ढकने के लिए काफी मददगार साबित हुया है. इसके लिए ज्ञान व सुचानावों का अंधकार बहुत जरूरी था और इस कार्य के लिए भाजपा ने मेनस्ट्रीम मीडिया के अतरिक्त बड़े पैमाने पर ट्रोल (सायबर सेना) विकसित किया। ट्रोल भाजपा का बहुमुखी प्रोपेगेंडा यंत्र है। ये सोशल मीडिया के तमाम साधनों की मदद से झूठ का बाज़ार गरम रखते है। ये अपने प्रयासों से जनता को जनवादी मुद्दों से दूर रखना चाहते है और उनके अंदर हिन्दुत्व का संचार करते रहते हैं। लिहाज़ा ये कहा जा सकता है की अगर मीडिया अपने प्रसारण में विपक्ष को जगह देना बंद कर दे तो धीरे धीरे लोकतांत्रिक ढ़ाचा के अन्दर इक अधिनायकवादी राष्ट्र जनम ले लेगा.

परंतु आज का विमर्श ये है की कैसे सत्तादल ने मीडिया के सहयोग से इक आम राय विकसित करने में सफल रही है की सारे समकालीन समस्यायों का कारण विपक्ष है और उपाय हिन्दुराष्ट्र की पुर्स्थापना. जहाँ जनवादी समस्याए मुंह ताके खड़ी है और सत्ता अपने प्रोपेगैंडा यंत्र की मदद से गेंद विपक्ष के पाले में डाल दी है। बतौर नागरिक जब लोगों के रोटी रोजगार जैसे बुनियादी जरूरते पूरा नहीं होगे और इसका कारण विपक्ष को समझा जायेगा, इस स्थिति में समस्या और समाधान के दर्मिया बढती खाई राजनितिक आदर्शशुन्यता पैदा करेगी. इमाइल दुर्खीम के एनोमी सिद्धांत( साधन और साध्य के बिच अंतर के कारण आदर्शशुन्यता आ जाना) से देखा जाए तो लोगों के अन्दर धीरे धीरे आदर्शशुन्यता की वजह से सामूहिक नियम के प्रति आस्था कम हो जाएगी. लोगों का जनाक्रोशित समूह सामूहिक नियम( विधिक तंत्र ) तोड़ देगा और यह राजनीतिक आदर्श-शून्यता का सबसे भयावह परिणाम होगा, जहा लोगों के अन्दर इक अलग तरह की अराजकता जन्म ले सकती है.

भारत को राजनीतिक आदर्श-शून्यता की स्थिति से बचाने के लिए सामूहिक नियम(विधिक तंत्र) के प्रति लोगों की आस्था गहरी करनी होंगी। इसके लिए ये भी जरूरी है की तंत्र भी लोगों के लिए काम करे न की सिर्फ लोक लुभावन नारा दे और धर्म और जाति के मुद्दे पे भ्रामकता फैलाये। ये नारे जन आकांक्षावों को और भी उद्वेलित कर देता है और बाद में आकांक्षावों की पूर्ति नहीं होती तो यही नारे आदर्श-शून्यता के सहयोगी बनते है। ये तब ही संभव है जब चुनी सरकार में स्ंवेदनहीनता न हो।

सरकार के संवेदनशीलता का मतलब संविधानवाद से है और संविधानवाद का आसन सा अर्थ ये है की सरकार पर हम भारत के लोगों का नियंत्रण हो, जो किसी भी संवैधानिक लोकतन्त्र की पहली आवश्यकता है। परन्तु इसके विपरीत यहाँ हम भारत के लोगों पर सरकारी प्रोपोगंडा हावी है, जिसका जिक्र इस लेख में किया गया है. कई बार तो विपक्ष हम भारत के लोग की आवाज़ बनता है, इसलिए भी मजबूत लोकतन्त्र के लिए मजबूत विपक्ष जरूरी है। लेकिन अगर झूठ, धर्म और पूंजी की मदद से ये स्थिति उत्पन्न हो जाये की जनता अपने बहुतायत समस्यावों के लिए विपक्ष को ही जिम्मेदार माने तो ऐसे में सत्ता दल के अंदर तानाशाही प्रवृतिया मजबूत होने लगती है जो फासीवाद की तरफ एक मजबूत कदम है।

(लेखक डॉ राजीव रंजन आईसीएफएआई विश्वविद्यालय, देहरादून में विधि के सहायक प्रोफेसर है।)

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Comments on “भारत में राजनीतिक आदर्श-शून्यता का दौर

  • Dr. Anjum Parvez says:

    Only few can write in such daring and categorical manner. Dr Rajiv Ranjan, a law luminary, has exposed the reality of government in this magnificent and vibrant article, however, I think that politics in India become that dirty where it is hard to survive for a politician without adopting these tactics, for which ultimately nation has to pay the price. Such critical articles, if taken seriously, help in improving the system.

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  • Maan Singh Negi says:

    आपने बहुत ही सटीक व्याख्या की है वर्तमान भारतीय राजनीतिक परिदृश्य की, यूं ही आप अपने लेखों से सत्ता को आईना दिखाते रहिए। और इस देश के लोगों को भी सच्चाई से रूबरू करवाते रहिएगा।।

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