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महिला एंकर के इस्तीफे पर सोशल मीडिया ट्रायल, क्या ‘हिंदी खबर’ ने लांघ दी मर्यादा?

नौकरी छोड़ने को ‘धोखाधड़ी’ बताकर पोस्टर जारी करना कितना उचित, मीडिया संस्थानों के आचरण पर उठे गंभीर सवाल

Hindi news alert poster showing a female news anchor on the left, with a large red 'आवश्यक सूचना' headline and dense bullet-point text on the right, plus a yellow caution box at the bottom.

हिंदी खबर न्यूज़ चैनल और इसके मालिक व प्रधान संपादक अतुल अग्रवाल ने अपने यहाँ कार्यरत रही लड़की का ये पोस्टर बनवा कर ठीक नहीं किया। सोशल मीडिया पर अपनी एंप्लॉयी को वायरल कर बदनाम करना ग़लत है। उनके एचआर और लीगल टीम को एक्शन लेना चाहिए था। लड़की को मेल करना चाहिए था, नोटिस भेजना चाहिए था। इसके बजाय सीधे बदनाम करने की मुहिम! मीडिया ट्रायल शुरू! ये न्यायसंगत नहीं है। जितनी बड़ी गलती नहीं है उससे बहुत ज़्यादा बड़ा दंड है। हर कोई अपनी बेहतरी को संस्थान छोड़ने पकड़ने का काम करता है। कई बार लोग नोटिस पीरियड इग्नोर कर देते हैं। ऐसे में उनको लीगल नोटिस भेजकर हर्जाना माँगना चाहिए। पर यहाँ तो कंगारू कोर्ट लगा दी गई। 

Facebook post by Hindi Khabar Bharat with long Hindi text about Ritu Bhandari; hashtags included, and a bottom red news banner featuring a woman in a suit.

मीडिया संस्थानों से अपेक्षा की जाती है कि वे न्याय, संतुलन और गरिमा के मूल्यों का पालन करें। लेकिन ‘हिंदी खबर’ न्यूज़ चैनल द्वारा अपनी पूर्व एंकर रितु भंडारी के खिलाफ सोशल मीडिया पर जिस तरह का पोस्टर और सार्वजनिक अभियान चलाया गया है, उसने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सवाल सिर्फ एक कर्मचारी के इस्तीफे का नहीं है, बल्कि उस तरीके का है जिसके जरिए एक महिला पत्रकार को सार्वजनिक रूप से कटघरे में खड़ा किया गया।

चैनल की ओर से जारी पोस्टर में रितु भंडारी को “धोखेबाज”, “गैर-जिम्मेदार” और संस्थानों को नुकसान पहुंचाने वाली कर्मचारी के रूप में पेश किया गया है। पोस्टर में उनकी तस्वीर, नाम और निजी रोजगार संबंधी विवाद को सार्वजनिक करते हुए अन्य मीडिया संस्थानों को उनसे सावधान रहने की सलाह दी गई है। यह पूरा अभियान किसी कानूनी नोटिस, न्यायिक आदेश या निष्पक्ष जांच की बजाय सोशल मीडिया के जरिए चलाया जा रहा है।

मीडिया जगत के जानकारों का कहना है कि यदि किसी कर्मचारी ने नियुक्ति शर्तों का उल्लंघन किया है, नोटिस पीरियड पूरा नहीं किया है या अचानक नौकरी छोड़ी है, तो उसके लिए श्रम कानूनों और अनुबंधीय प्रक्रियाओं के तहत कार्रवाई के पर्याप्त प्रावधान मौजूद हैं। संस्थान कर्मचारी को नोटिस भेज सकता है, जवाब मांग सकता है, हर्जाना मांग सकता है या अदालत का दरवाजा खटखटा सकता है। लेकिन किसी कर्मचारी की तस्वीर के साथ उसे सार्वजनिक रूप से बदनाम करने का अभियान शुरू कर देना न केवल एक्सट्रीम रिएक्शन माना जा सकता है बल्कि मानहानि और निजता के अधिकार से जुड़े सवाल भी पैदा कर सकता है।

विशेष रूप से तब, जब मामला अभी एकतरफा दावों पर आधारित हो। रितु भंडारी का पक्ष सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आया है। ऐसे में किसी व्यक्ति को दोषी घोषित कर देना और उसे मीडिया तथा सोशल मीडिया की अदालत में खड़ा कर देना न्याय के मूल सिद्धांतों के विपरीत माना जा सकता है।

विडंबना यह भी है कि जिस मीडिया उद्योग का काम ट्रायल बाय मीडिया पर सवाल उठाना और संस्थाओं को जवाबदेह बनाना है, वही उद्योग अपने आंतरिक विवादों में सोशल मीडिया ट्रायल का रास्ता अपनाने लगे तो यह चिंताजनक संकेत है। कर्मचारी और संस्थान के बीच विवाद नया नहीं है। बेहतर अवसर मिलने पर पत्रकारों, एंकरों और कर्मचारियों का संस्थान बदलना भी कोई असामान्य घटना नहीं है। कई बार नोटिस पीरियड को लेकर विवाद होते हैं, जिनका समाधान कानूनी और प्रशासनिक स्तर पर किया जाता है।

यहां प्रश्न यह नहीं है कि रितु भंडारी सही हैं या गलत। प्रश्न यह है कि क्या किसी संस्थान को यह अधिकार है कि वह अपने पूर्व कर्मचारी को सोशल मीडिया पर पोस्टर लगाकर सार्वजनिक रूप से अपमानित करे? क्या यह शक्ति का दुरुपयोग नहीं माना जाएगा? और क्या ऐसी परंपरा शुरू होने पर कल हर संस्थान अपने पूर्व कर्मचारियों की ‘ब्लैकलिस्ट’ जारी करने लगेगा?

मीडिया संस्थानों को यह नहीं भूलना चाहिए कि कर्मचारियों से जुड़े विवादों का समाधान कानून और संस्थागत प्रक्रियाओं के जरिए होना चाहिए, न कि सोशल मीडिया पर सार्वजनिक अभियोजन चलाकर। यदि आरोप सही हैं तो कानूनी मंच मौजूद हैं। लेकिन यदि बिना न्यायिक निष्कर्ष के किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाया जाता है तो यह स्वयं मीडिया की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगा सकता है।

रितु भंडारी प्रकरण ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि क्या मीडिया संस्थान अपने कर्मचारियों के साथ वही व्यवहार कर रहे हैं जिसकी अपेक्षा वे समाज की अन्य संस्थाओं से करते हैं, या फिर वे खुद ही कंगारू कोर्ट बनकर फैसले सुनाने लगे हैं।

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1 Comment

1 Comment

  1. Ankush Sagar Saariya Thakur

    June 2, 2026 at 7:26 am

    Farzi khabar hai atul agrawal jaise logo ko sb jante hai.

    Khabar ko post krne se phle khabar ki jaanch jarur karni cahahiye.

    Atul agrawal aise gire logo ka sath dene se phle 100 baar sochna chahaiye atul aggarwal ke baad aapki is post par bhi case na ho jaye.

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