खुशदीप सहगल-
“हम दिए जलाएँगे…लेकिन पटाखे फोड़ कर…. बहुतेरों के दिल भी जलाएँगे… समाचार समाप्त हुए…” एक्स पर ये पोस्ट अंबानी के चैनल न्यूज़ 18 की कंसल्टिंग एडीटर रूबिका लियाक़त ने डाली…
“दिल्ली में ऑलरेडी AQI 300 के करीब है. कल दिवाली पर इकोसिस्टम छाती पीटने आएगा तो लोड नहीं लेने का है. पटाखे फोड़ने का है…” एक्स पर ही ये पोस्ट सुशांत सिन्हा ने डाली. सिन्हा टाइम्स नाऊ नवभारत के कंसल्टिंग एडीटर हैं।
ये अलग बहस का विषय हो सकता है कि नेशनल न्यूज़ चैनल्स के पत्रकारों या एंकर्स की भाषा कैसी होनी चाहिए?
ये भी यहां गिनाने की ज़रूरत नहीं कि दिवाली के बाद दिल्ली कैसे गैस चैम्बर बनी. वो भी तब जब दिवाली पर सिर्फ़ दो घंटे के लिए ग्रीन क्रैकर्स चलाने की अनुमति थी…
मेरा इस पोस्ट का लिखने का मकसद सिर्फ़ रूबिका लियाक़त और सुशांत सिन्हा के विरोधाभासों को आपके सामने लाना है. रूबिका और सुशांत ने पटाख़े फोड़कर बहुतेरों के दिल जलाने की बात की या लोड न लेकर पटाखे फोड़ने का आह्वान किया. यही जो दोनों पत्रकार अब ध्वनि या वायु प्रदूषण को ताक पर रख कर पटाखे चलाने का आह्वान कर रहे हैं, इन दोनों के ही 8-9 साल पुराने कुछ ट्वीट्स पर भी नज़र डाली जाए…
सुशांत सिन्हा के अक्टूबर 2017 के दो ट्वीट्स-
3 अक्टूबर 2017 को सुशांत ने शाम 3.43 पर अपने ट्वीट में लिखा- “रावण जल गया पर पीछे प्रदूषण का गुबार छोड़ गया. दिल्ली में हवा फिर ज़हरीली हो रही, दिवाली पर पटाखे कम छोड़ें, इसी हवा में सांस लेना है आपको भी… “
इन्हीं महोदय ने 9 अक्टूबर 2017 को शाम 3.37 पर ट्वीट में लिखा-

“Delhi NCR में पटाखों की बिक्री बंद होने से कुछ लोग यूं परेशान हैं मानो आदमी संडास में हो और कोई पानी बंद कर दे. दिवाली मने पर बिन फेफड़े जले…”
इसी तरह अब पटाखे फोड़ कर दूसरों को जलाने की बात करने वाली रूबिका लियाक़त ने 6 नवंबर 2016 को 12.58 PM पर क्या ट्वीट किया था, उस पर भी नज़र डालिए. इसमें दिल्ली की दमघोंटू हवा के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर तंज कसते कहा था-
रुबिका ने लिखा था- “डियर Arvind Kejriwal मैं मास्क नहीं खरीदना चाहती (हंसने की इमोजी). क्या साफ़ हवा (ऑक्सीजन) दिल्ली में कहीं बिक रही है? मैं कर्ज़ लेकर इसे खरीदूंगी. मैं सांस नहीं ले सकती…”

क्या रूबिका लियाक़त और सुशांत सिन्हा स्पष्ट करेंगे जो इनके लिए 2016-2017 में ग़लत था वो 2025 में कैसे सही हो गया? या उपकृत होने का पुरस्कार कुछ ज़्यादा ही बड़ा हो गया है?
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