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पूर्व पत्रकार और सांसद साकेत गोखले के माफी और जुर्माने से क्या बदलेगा?

रंगनाथ सिंह-

साकेत गोखल के माफी और जुर्माने से क्या बदलेगा?

कुछ लोगों को लगेगा कि साकेत गोखले को थूक कर चाटना पड़ा है मगर मेरी नजर में गोखले के समर्थकों पर इस चर्चित मामले का कोई खास असर नहीं होगा। गोखले इस बात के उदाहरण बने रहेंगे कि कैसे कोई बन्दा केवल ट्रॉल बनकर भी राज्य सभा तक पहुँच सकता है। गोखले ने पत्रकारिता करियर में जो नहीं हासिल किया था वह महज कुछ सालों की ट्रोलिंग से हासिल कर लिया। मगर मेरी मूल चिन्ता राजनीतिक दल द्वारा गोखले को संरक्षण दिया जाना नहीं है। मेरी मूल चिंता है बौद्धिक समाज में ट्रॉलरों की बढ़ती स्वीकार्यता और वर्चस्व है।

ट्विटर ट्रॉल ने देश के बड़े-बड़े पत्रकारों और प्रोफेसरों को रुतबा कम कर दिया है। ट्रॉलरों की तुलना रामरहीम और आसाराम जैसों से की जा सकती है जिनके प्रभाव में हजारों-लाखों लोग रहते हैं। जनता के वोटों के तलबगार राजनेता ऐसे लोगों को भाव देते हैं क्योंकि इसमें उनका फायदा है मगर बौद्धिक समाज को अपनी बात रखने के लिए वोटिंग की जरूरत नहीं होती है इसलिए उसे इनकी कृपा की जरूरत नहीं होती थी मगर व्यूज और यूजर के लालच में मीडिया संस्थानों ने ट्रॉलरों और पत्रकारों के बीच मिलावट करना शुरू कर दिया।

इनमें सबसे खतरनाक ट्रॉल वो हैं जिन्होंने दो-चार साल किसी मीडिया संस्थान में रहकर बुनियादी काम सीखा और उसका सदुपयोग ट्रॉल बनने में किया। मेरे दोस्तों को याद होगा कि जब आदरणीय ध्रुव राठी को बीबीसी और एनडीटीवी ने मुख्यधारा में स्टैब्लिश किया तभी मैंने मीडिया के दुर्दिन की आशंका जतायी थी। आज स्थिति ये है कि एनडीटीवी और बीबीसी के सीनियर एडिटरों की भी हैसियत ध्रुव राठी से कम हो चुकी है। और आज हम सब रोज इसी दबाव में जी रहे हैं कि पत्रकार ही बने रहें या इन्फ्लुएंसर बनने का प्रयास करें!

इस दबाव का पोलिटिकल लाइन से भी कोई लेना-देना नहीं है। चाहे जो भी राजनीतिक विचारधारा हो, जेनुइन पत्रकार अप्रासंगिकता के गहरे संकट से गुजर रहे हैं। और ज्यादातर मीडिया संस्थान विश्वसनीयता के संकट से गुजर रहे हैं। अगर यही हाल रहा तो अगले कुछ दशक में मीडिया 500 साल पहले की स्थिति में पहुँच जाएगा। जीसस मुर्दे को जिन्दा कर देते थे, पानी पर चल लेते थे, गम्भीर बीमारियों का छू कर इलाज कर देते थे, इत्यादि खबरों पर यकीन करना न करना आपके बचपन में विकसित फेथ पर निर्भर करेगा। बस फेथ का आधार रिलीजन के बजाय पोलिटिकल लाइन होगी। अमेरिका में लगभग यही हो चुका है। किसी भी मुद्दे पर डेमोक्रेट और रिपब्लिकन समर्थकों का बहुमत वही सोचता है जो उनकी पार्टी लाइन है।

लक्ष्मी पुरी की तारीफ करनी होगी कि उन्होंने कष्टकारी कानूनी लड़ाई लड़कर गोखले को माफी और जुर्मान के लिए मजबूर किया। मगर बहुत से लोग देश में इसलिए ही इन्फ्लुएंसर बने हुए हैं क्योंकि उनके पास कपिल सिब्बल जैसे वकील फ्री में उपलब्ध रहते हैं। सिब्बल नेता हैं। उन्होंने वकालत के दम पर राज्य सभा सीट ली है तो वह वकालत का इस्तेमाल राजनीति के लिए करते हैं तो इसे समझा जा सकता है। मगर पत्रकार और मीडिया संस्थान ऐसे लोगों के चरणों में क्यों लोट रहे हैं इस पर विचार करने की जरूरत है।

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