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सरकारी कारिंदा तय करेगा अयोध्या से कौन होगा जनसत्ता का पत्रकार!

ओमप्रकाश सिंह, अयोध्या 

अखबारों में संपादकों की नियुक्ति मालिकान या समूह सम्पादक या संपादक या संपादकीय विभाग के किसी वरिष्ठ कर्मी द्वारा की जाती है। अब तक यही होता चला आया है, लेकिन संपादकों के इस अधिकार को छीनने की सरकारी कोशिश हो रही है वो भी मर्यादा पुरुषोत्तम की नगरी अयोध्यापुरी में। उत्तर प्रदेश सूचना विभाग अयोध्या में उप निदेशक ने जनसत्ता अखबार के कार्यकारी संपादक को पत्र लिखकर जिला संवाददाता को मान्यता देने से मना किया है बल्कि इशारों-इशारों में निर्देश दिया है कि मेरे फरमान पर अमल करो।

रामनगरी अयोध्या में सूचना विभाग उप निदेशक मुरलीधर सिंह ने प्रेस क्लब सचिव त्रियुगीनारायण तिवारी को निशाने पर रखकर चरस बो रखा है, कारण साफ है कि जनसत्ता का ये पत्रकार जुझारू पत्रकार है ख़बर के लिए बेबाकी के लिए जाने जाते हैंं किसी अफसर की चटुकारिता में लिप्त नहीं रहते लेकिन इनका गुनाह ये है कि अयोध्या प्रेस क्लब (सोसायटी एक्ट के तहत रजिस्टर्ड संस्था ) के सचिव हैंं औऱ प्रेस क्लब के ज़िम्मेदार निगबान भी.पत्रकार को कंट्रोल में करने के लिए एक आपराधिक किस्म के पत्रकार को मोहरा बनाकर रजिस्टर्ड संस्था पर कब्जा करके खुद प्रशासक बनना चाहता है।

उप सूचना निदेशक ने प्रेस क्लब की गतिविधियों पर एक जांच समिति का गठन करवाया और समिति में खुद मेंबर भी बन गया। एकतरफा जांच में प्रेस क्लब की गतिविधि को संदिग्ध करार देकर शासन से प्रशासक नियुक्ति करने की मांग कर डाली। इस रिपोर्ट पर आला अधिकारियों ने नोटिस नहीं लिया तो जांच समिति के गोपनीय निर्णय की फोटोकापी करके अपने मोहरे को दे दिया कि बेटा लग जा अपने काम पर औऱ इनको बदनाम कर डाल तुझको ईनाम मैं दूंगा। अदालती सहारा लेकर प्रेस क्लब सचिव पर मुकदमा दर्ज करवा दिया। जब इस पर भी अपेक्षित कारवाई नहीं हुई तो प्रेस क्लब सचिव से खुन्नस खाए उप निदेशक ने जनसत्ता अखबार के कार्यकारी संपादक महोदय को ही पत्र लिख मारा। पत्र में उसने मांग की है पत्रकार की अखबारी मान्यता समाप्त किया जाए क्योंकि इनपर अभियोग दर्ज है, सूचना के महत्वपूर्ण पद में बैठे इस अफसर को पता होना चाहिए कि अभियोग तो देश के प्रधानमंत्री, गृहमंत्री व मुख्यमंत्री पर भी दर्ज हुए थे या हैंं लेकिन क्या वो दोषी हो गए। आजकल जहां बदले की कार्रवाई के तहत एक दूसरे को झूठे मामले में फँसा देने का चलन हो वहां Fir के आधार पर ये पत्रकार को उनके संस्थान से हटवाने का कुत्सित प्रयास कर रहे हैं। 

एक समय था कि जनसत्ता अखबार की हेडलाइन सत्ता के लिए जूड़ी का बुखार हो जाती थी। अब यह हालत है कि योगी सरकार का एक अदना सा अधिकारी जनसत्ता की सम्पादकीय सत्ता को सलाह दे रहा है कि किस पत्रकार को कहाँ रखिए या मान्यता निरस्त करिए। ये तो नहीं मालूम कि जनसत्ता अखबार इस पर क्या निर्णय लेगा लेकिन सरकारी हस्तक्षेप या दूसरी भाषा में कहें कि अपनी आपसी खुन्नस निकालने के लिए यह कोशिश प्रत्येक मीडिया संस्थान को भी नागवार लगनी चाहिए। 

यही नहीं मोदी को भगवान शंकर , योगी को भर्तृहरि व संघ प्रमुख मोहन भागवत को वृहस्पति का अवतार बताने वाले उप-सूचना निदेशक ने रामनगरी में फर्जी मान्यता देने की मंडी खोल रखी है। शासन ने पत्रकारों के लिए मान्यता की जो शर्तें रखी हैं उसे कुचलकर उप सूचना निदेशक मुरलीधर सिंह ने जिला सूचना कार्यालय में अपना काला साम्राज्य स्थापित कर रखा है।

जिन अखबारों के नाम पर उप सूचना निदेशक ने मान्यता की रेवड़ियां बांटी हैं, उनके नाम सुनकर आप चौंक जाएंगे। इच्छा शक्ति, मखदूम मेल, उदेतित सविता, नैतिक विकास, जिज्ञासु कुंज, ग्राम वार्ता, सूर्योदय भारत, अमरेश दर्पण, कौमी हालात, गुजराती न्यूज़ सर्विस, कौमी फलाह, वारिस ए अवध यह सब नाम अखबारों के हैं। यह अखबार आपको दिखते हों या ना दिखते हों, लेकिन अयोध्या के जिला सूचना कार्यालय ने बड़ा गोरखधंधा कर ऐसे हवा- हवाई अखबारों के नाम पर खूब मान्यता बांटा है। यह खेल सहायक सूचना निदेशक का है। फर्जी पत्रकारों कि फौज खड़ी करने के बाद भी जब हवस नहीं मिटी तो प्रेस क्लब को ही हड़पने की साजिश रच डाली।

बताते चलें कि ये उपनिदेशक इसके पहले कमिश्नर को भी पत्र लिखकर पत्रकारों के कार्यक्रम में जाने से रोक चुका है जो कि घनघोर कदाचार के अंतर्गत आता है अरे कमिश्नर कोई चिड़ीबाज अफसर तो है नहीं जिसको डायरेक्टर पत्र लिखकर तुम निर्देश देते।

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