शिशिर सोनी-
लंबे समय बाद एक बेहद रोचक इंटरव्यू देखा। गंभीर। आत्मचिंतन की ओर प्रेरित करने वाला। और टू द प्वाइंट। अजीत अंजुम ने सौरभ दास से बातचीत की। सौरभ दास खोजी पत्रकार हैं। कई बड़े खुलासे उन्होंने समय समय पर किए हैं। देश की कानून व्यवस्था और उसके चलन पर उनकी गहरी पकड़ है। युवा हैं। लेकिन उनकी बातों में गहराई है। सोचने समझने और बिटवीन द लाइंस परत उधेड़ने का माद्दा उनमें कई गरिष्ठ पत्रकारों से बेहतर दिखा। चीफ जस्टिस के “कॉकरोची” बयान पर सौरभ का इंटरव्यू है। ये इंटरव्यू देश के हर युवा को देखना चाहिए। उस पर मीमांसा करनी चाहिए।
देश की न्यायायिक व्यवस्था पर सार्वजनिक बहस का समय आ गया है। एक जज के घर के अहाते में जले हुए नोटों का जखीरा मिलता है। आज तक एफआईआर भी नहीं हुआ। “गोली मारो सालों को” भाषण में जजों को कुछ गलत नहीं लगा। एक पक्ष विशेष के कार्यक्रमों में सार्वजनिक मंच साझा करने, अपने बच्चों को उसी सॉलिसिटर के अंदर काम करने भेजना जो सामने किसी पक्ष की पैरोकारी कर रहा हो – उसमें कोई बुराई जजों को नहीं दिखती। लोकतांत्रिक और संवैधानिक अधिकारों के तहत आंदोलन करने वाले लोग, पत्रकार, आरटीआई एक्टिविस्ट सब मी-लार्ड को कॉकरोच, परजीवी दिखते हैं ! आरटीआई की क्या हालत बना दी गई है, इस पर लॉर्डशिप खामोश हैं।
ऐसे ही अन्य बहुत सारे सम्यक सवालों को इस इंटरव्यू में सवालों के मार्फत और जवाबों के सहारे बेहद प्रभावी ढंग से रखा गया है। उठाया गया है। बहुत प्रासंगिक है। यूट्यूब पर अजीत अंजुम का ये इंटरव्यू अवश्य देखा जाना चाहिए। सौरभ दास जैसे युवा “कॉकरोच” पत्रकार के कहे को सुना जाना चाहिए।
चरण सिंह राजपूत-
देश के लिए इससे चिंतनीय और शर्मनाक कुछ और नहीं हो सकता है कि सुप्रीम न्याय संस्था बेरोजगारों की तुलना कॉकरोच से कर रही है। जिस सुप्रीम कोर्ट को देश की सर्वोपरि संस्था माना जाता है। जिससे सुप्रीम न्याय की उम्मीद की जाती है। मान सम्मान और अधिकार के लिए सुप्रीम संरक्षणकर्ता माना जाता है। उस सुप्रीम कोर्ट से ऐसी टिप्पणी सामने आई कि किसी भी हालत में उस टिप्पणी को न्यायप्रिय नहीं कहा जा सकता है। सबसे बड़ी चिंता तो यह है कि टिप्पणी करने वाले मुख्य न्यायाधीश हैं।
हमारे मुख्य न्यायाधीश की इस टिपण्णी ने सत्ताधारियों की घटिया टिप्पणियों को भी पीछे छोड़ दिया। मुख्य न्यायाधीश बेतहाशा बेरोजगारी पर सरकार को फटकार क्या लगाते उन्होंने तो मुखर बेरोजगारों के आरटीआई एक्टिविस्ट बनने, सोशल मीडिया और इंटरनेट मीडिया में काम करने वाले कॉकरोच बता दिया और सिस्टम के खिलाफ मोर्चा खोलने वाले करार दे दिया। सिस्टम से लड़ना तो हिम्मत का काम है। देश और समाज के लिए देशभक्त बनना है।
मीडिया उन्होंने उन लोगों के लिए बोला है जो सत्ता की आंख में आंख डालकर प्रश्न कर रहे हैं। गोदी मीडिया के लिए नहीं। यह टिप्पणी की यह भाषा किसी राजनेता की तो हो सकती है पर किसी न्यायाधीश की नहीं। वह भी मुख्य न्यायाधीश। मतलब मुख्य न्यायाधीश भी नहीं चाहते कि सिस्टम के खिलाफ लड़ा जाए। वह नहीं चाहते कि गलत बात का विरोध हो। करप्शन के खिलाफ मुहीम छेड़ी जाए। तो यह माना जाए कि सीबीआई, ईडी, इनकम टैक्स, मीडिया के साथ ही न्यायपालिका भी सत्ता किये काम कर रही है। वैसे भी अब बिना सरकार की सहमति के कोई जज नहीं बन रहा है। स्वाभाविक है कि ये जज सरकार के दबाव में फैसले देंगे। समझा जा सकता है कि देश कहां जा रहा है ? आने पीढ़ी का क्या होने वाला है?
अवमानना के डर से न्यायपालिका के खिलाफ बोलने और लिखने से लोग हिचकते हैं। और देश और समाज के लिए लाठी डंडे खाने, जेल जाने और अवमानना का केस भी झेलने के लिए तैयार होना होगा। मुठ्ठीभर लोग व्यवस्था को कब्जाकर नई पीढ़ी को बंधुआ मजदूर की तरह इस्तेमाल करना चाहते हैं। आज की तारीख में हर तंत्र सत्ता के लिए काम कर रहा है और सत्ता कुछ पूंजीपतियों के लिए। ऐसे में मीडिया तो जन समस्याएं उठा ही नहीं रहा है। विपक्ष भी जमीनी मुद्दे उठाने को तैयार नहीं। जनता से सीधे संवाद करने को तैयार नहीं। देश अराजकता की ओर जा रहा है। आम लोगों को ही हक़ के लिए खड़ा होना होगा। देश का युवा दिशाहीन है। वह अपने भविष्य के प्रति जागरूक नजर नहीं आ रहा है।
राजनीतिक दलों की धर्म और जाति की राजनीति में देश का युवा भी फंस रहा है। युवा क्रांति ही देश को बचा सकती है। मामला सीधे जमीर से जुड़ा है किसी को न तो देश समाज की चिंता है और न ही युवाओं के भविष्य की। बस उनका स्वार्थ पूरा होता रहे। राजनीतिक दलों ने लोगों को जाति और धर्म के नाम पर उलझा दिया है। लोकतंत्र को बचाने के लिए बनाई गई संस्थाएं देश और समाज के लिए काम न कर सत्ता के लिए काम करती प्रतीत हो रही हैं। दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को नकली लॉ डिग्रियों और कानूनी पेशे से जुड़े मामलों की सुनवाई करते हुए कुछ तीखी टिप्पणी की।
सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश ने कथित तौर पर टिप्पणी की कि कुछ बेरोजगार युवा कॉकरोच की तरह होते हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि जिन्हें न तो कोई रोजगार मिलता है और ना ही पेशे में कोई जगह है। उनमें से कुछ इंटरनेट मीडिया में चले जाते हैं, कुछ आरटीआई कार्यकर्ता बन जाते हैं और फिर हर किसी पर हमला करना शुरू कर देते हैं।
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