सोशल मीडिया पर जो ‘माँसाहार विमर्श’ चल रहा है वह एक समुदाय के खिलाफ फैलाए जा रहे प्रमाद का हिस्सा है!

रंगनाथ सिंह-

वेद-बाइबिल-कुरान लिखे जाने के हजारों साल पहले से मनुष्य माँसाहार करता आ रहा है। अन्न उपजाना उसने कब सीखा? अभी 4-6-8 हजार साल पहले। मनुष्य की उम्र क्या है? 1.5 से 3 लाख साल। प्रकृति में माँसाहारी और शाकाहारी दोनों तरह के जीव होते हैं। मनुष्य शाकाहारी और माँसाहारी दोनों है।

क्षुधापूर्ति के लिए जीव-हत्या का निषेध एक दार्शनिक आत्मबोध है लेकिन यह तभी सम्भव हो पाया होगा जब हम मरुस्थल से नदियों के देश में आ गये होंगे। भारतीय सभ्यता में भी जीव-हत्या का निषेध वैदिक-युग के बहुत बाद में बढ़ा। आज इसका ज्यादातर श्रेय बुद्ध और महावीर जैसे दार्शनिकों को दिया जाता है। इन दोनों धर्मों के कुछ अध्येता मानते हैं कि उस समय भारतीय समाज में इतना खून-खराबा हो रहा था कि बुद्ध इत्यादि के दर्शन में जीव-हत्या का निषेध केंद्रीय भूमिका में आ गया।

बुद्ध जैसा अद्भुत व्यक्ति दुनिया में दूसरा न हुआ। उन्होंने माँसाहार मात्र को अनैतिकता से नहीं जोड़ा। उन्होंने जीव-हत्या को अनैतिक माना। बुद्ध ने माँसाहार को अपथ्य नहीं कहा। स्वाभाविक मृत्यु को प्राप्त जीव का माँस खाने की उन्होंने अनुमति दी। केवल खाने के लिए जीव की हत्या करने को उन्होंने अनुचित माना।

बुद्ध ने मूलतः मनुष्य के प्रति अपनी करुणा का विस्तार किया और उसमें समस्त जीव-जन्तुओं को समाहित किया। बुद्ध के लिए शाकाहार चेतना के विकास का स्वाभाविक फल था न कि समाज प्रदत्त लोकाचार। आज जो लोग शाकाहार के नाम पर साम्प्रदायिक वैमनस्य बढ़ा रहे हैं, क्या उनकी चेतना सामान्य से ऊपर उठकर बुद्धत्व की दिशा में बढ़ चुकी है!

अजीब विडम्बना है कि हमारे देश में कुछ लोगों में शाकाहार की इतनी सनक है कि इसके लिए वह मनुष्य-विरोधी होने में भी परहेज नहीं करते। ऐसे सनकियों और उन सनकियों में क्या अन्तर है जो किसी की पूजा-पद्धति के आधार पर उसकी हत्या जायज ठहरा देते हैं! ये खानपान के आधार पर वही कर रहे हैं। गजब यह है कि अन्यान्य कारणों से किसी एक समुदाय की सामूहिक हत्या की पैरवी करने वाले आजकल पेटा एक्टिविस्ट बने घूम रहे हैं।

यदि शाकाहार और माँसाहार के बीच शास्त्रार्थ हो तो बहुत सम्भव है कि मैं शाकाहार की तरफ से दलील देना चाहूँ लेकिन अभी सोशलमीडिया पर जो विमर्श चल रहा है वह माँसाहार की व्यथा से नहीं उपजा बल्कि वह मूलतः एक समुदाय के खिलाफ फैलाए जा रहे प्रमाद का हिस्सा है। अतीत में एक समुदाय के सामूहिक वध को जायज ठहराने वाले आज अपने मुस्लिम-द्वेष पर शाकाहार का मुलम्मा चढ़ा रहे हैं। इस्लामी कट्टरपंथ की आलोचना एक बात है, इस्लामी कट्टरपंथी तंजीमों की आलोचना एक बात है, इस्लाम या कुरान की आलोचना एक बात है लेकिन माँसाहार के बहाने परोक्ष रूप से मुसलमानों को एक एकाश्मी समूह दिखाते हुए ‘वधिक’ के रूप में पेश करना दूसरी गर्हित बात है।

यदि किसी सर्वेक्षण में यह कह दिया गया कि 70 प्रतिशत हिन्दू माँसाहारी हैं तो कुछ लोगों की छाती फट गयी, क्यों फट गयी? क्योंकि यह आँकड़ा उनके उस पूर्वाग्रह पर कुठाराघात करता है जिसमें एक समुदाय विशेष को ही माँसभक्षी वधिक बताने की मंशा छिपी रहती है। हो सकता है कि 70 के बजाय 50 या 40 प्रतिशत ही हिन्दू माँसाहारी हों तो…तो ऐसे जन्तु-प्रेमी इन 40-50 प्रतिशत हिन्दुओं की हत्या की पैरवी करने से परहेज नहीं करेंगे! मैग्लोमैनियाक नारसिस्ट लोगों की यही अंतिम परिणति होती है।

मेरी सोच में आलोचना से कोई ऊपर नहीं है। न कोई धर्म-ग्रन्थ, न कोई पैगम्बर न कोई ईश्वर न कोई मसीहा, न कोई समुदाय लेकिन इन आलोचनाओं का उद्देश्य क्या होना चाहिए! अपनी सनक और हनक मनवाना! अपनी जीवनशैली, खानपान, पूजापद्धति दूसरे पर थोप देना? नहीं। इन सभी आलोचनाओं की मूल प्रेरणा है, सभी मनुष्यों की अधिकतम बेहतरी। जो सभी मनुष्यों की बेहतरी नहीं सोचते, उन्हें जन्तु-प्रेमी होने का ढोंग नहीं करना चाहिए।

गऊ-हत्या का मैं विरोधी हूँ क्योंकि हमारी कृषक सभ्यता में गाय का श्रद्धेय स्थान रहा है। मैं मानता हूँ कि मन्दिरों के आसपास माँस बिक्री पर प्रतिबन्ध होना चाहिए। खानपान की प्रथाओं में पासपड़ोस के सामुदायिक सम्वेदनाओं का ख्याल रखना चाहिए। भारतीय समाज ने काफी हद तक यह संतुलन अर्जित किया हुआ है। ओवरनाइट पेटा-एक्टिविस्ट बनकर इस संतुलन को बिगाड़ने का प्रयास निन्दनीय है।

माँसाहार या शाकाहार के नाम पर मनुष्य-विरोधी उन्माद फैलाने का कतई समर्थन नहीं किया जा सकता। अगर कुछ मनुष्य रूपी जीव मुर्गों की रक्षा के लिए मनुष्यों के वध की पैरवी कर सकते हैं तो मनुष्य होने के नाते हम शाकाहारी मुर्गों से मनुष्यता की रक्षा में एक पोस्ट तो लिख ही सकते हैं।

कुछ सनकी यह भी दिखाना चाह रहे हैं जैसे शाकाहारी होना सदाचारी होने की गारंटी है! ऐसे कुतार्किकों से क्या ही कहा जाए। ऐसे लोग शायद अखबार तक नहीं पढ़ते। पढ़ते तो उन्हें पता होता कि कई शाकाहारी सन्त अपने कुकर्मों के लिए जेल की हवा खा रहे हैं। यदि आपकी आत्मा कहती है तो शौक से शाकाहारी बनिए लेकिन उसके पहले मनुष्य बनिए। बुद्ध की दुकान चलाने का शौक है तो हृदय में थोड़ी करुणा धारण कीजिए। हमारे यहाँ, निर्बुद्धि से भी बुरी गति कुबुद्धि की बतायी गयी है। आप किस श्रेणी में है, खुद तय कर लीजिए। ईश्वर आपको सद्बु्द्धि दे।


इस लिटिल बुद्ध को प्रणाम! ❤️
https://youtu.be/F11PhDcaE4A



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One comment on “सोशल मीडिया पर जो ‘माँसाहार विमर्श’ चल रहा है वह एक समुदाय के खिलाफ फैलाए जा रहे प्रमाद का हिस्सा है!”

  • Do Teen Dino se har jagah Mansahar par vimarsh sun or dekh raha hu. Chahe neta ho, patrakar ho ya fir Buddhijeevi, sabhi ees vishay ko hindu muslim ke chasme se dekh rahe hain. Khaskar, Jaisa ees lekh me bhi hai, Navratro me Maans par partibandh ko muslimo ke khilaf dwesh failane ke liye kiya ja raha hai.
    Magar kisi ke muh se ye nahi nikal raha ki Jin Maans bechne walo ki dukane jitane din band hongi (Elite meet shops ko chorkar) uatne din ki unaki kamayee ka kya hoga.
    Magar bhaiya wo to gareeb log hai to unki baat kon karega. kya fark padta hai ki wo maans bechne wala kis dharm ka magar hai to wo roj kamane khane wala.
    Or bawela macha bhi sirf ees liye hai kyonki DMC me BJP ka raj chalta hai. warna Mumbai me to saalo se Jain logo ke varshik pujan me hamesha maans ki bikri band rahti hai.
    Ye bhi sahi hai ki hindu log maans khate hai magar Navratro me adhiktar log Khas kar Delhi, UP or Bhiar ke belt me bilkul satvik rahate hai kuch ke apwad ko chhorkar.
    Ant me sirf itana ki bila wajah hindu muslim kiya ja raha hai.. Behtar hota eese roj kamane khane walo ke roji roti ka mudda banaya jata.

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