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सुख-दुख

द मॉरल के संपादक और वरिष्ठ पत्रकार शिव शरण त्रिपाठी की कैंसर ने छीनी सांसें

शैलेश अवस्थी-

दुःखद….. वरिष्ठ पत्रकार द मॉरल के संपादक शिवशरण त्रिपाठी अपने साहस, स्वाभिमान, निडरता, ईमानदारी और जुझारूपन के लिए हमेशा याद किए जाएंगे l उन्होंने पत्रकारिता को जिया और पत्रकारिता करते हुए इस मायावी संसार से विदा हुए l

Older man with white hair and beard speaking into a microphone at a podium, wearing a turquoise kurta and scarf.

कैंसर जैसी घातक बीमारी का मुस्कुराते हुए मुकाबला किया, विषम परिस्थितियों में भी बिना विचलित हुए दुरूह रास्तों पर चले और प्रेरणा बन गए l

अभी बीते 25 मार्च को कानपुर प्रेस क्लब में उनका सम्मान किया गया था l वह कमज़ोर नजर आ रहे थे, लेकिन दमदार आवाज़ में पत्रकारिता की चुनौतियों को गिनाते रहे… उनके निधन पर हम स्तब्ध और दुखी हैं l ईश्वर उन्हें अपने चरणों में स्थान दे l


विजय प्रकाश त्रिपाठी-

Older man with grey hair and beard wearing glasses, beige shirt and grey blazer, standing indoors with framed certificates behind him.
शिव शरण त्रिपाठी

श्रद्धांजलि – वरिष्ठ पत्रकार शिव शरण त्रिपाठी के निधन का दुखद समाचार मिला। वह लंबे समय से कैंसर से पीड़ित थे। हाल ही हार्ट प्रॉब्लम के चलते कार्डियोलॉजी में उन्हें भर्ती कराया गया था।

पत्रकारिता की ठसक और तेवर उनकी पहचान थी। अपने बूते मॉरल हिंदी और अंग्रेजी दोनों संस्करण निकलते रहे। बीते कोई 40 साल से साप्ताहिक हिंदी मॉरल त्रिपाठी जी निकाल रहे थे। पत्रकारिता की दुनिया में कुछ लोग संस्थान नहीं, अपने आप में एक विचार होते हैं। ‘

मॉरल’ साप्ताहिक के संपादक शिव शरण त्रिपाठी जी का निधन ऐसी ही एक निर्भीक आवाज़ का शांत हो जाना है, जिसने लगभग 40 वर्षों तक अकेले दम पर अखबार को केवल जीवित ही नहीं रखा, बल्कि उसे जनपक्षधरता और बेबाक तेवरों की पहचान भी दिलाई। यह वह दौर था जब बड़े मीडिया घरानों की चमक, विज्ञापनों की राजनीति और सत्ता के दबावों के बीच छोटे और स्वतंत्र अखबार लगातार हाशिये पर धकेले जा रहे थे। ऐसे समय में ‘मॉरल’ का प्रकाशन केवल पत्रकारिता नहीं, बल्कि एक वैचारिक संघर्ष था। सीमित संसाधनों, आर्थिक कठिनाइयों और तमाम दबावों के बावजूद संपादक ने कभी अपने तेवरों से समझौता नहीं किया।

सत्ता से सवाल करने का साहस उनके संपादकीय लेखों में झलकता था। वे मानते थे कि अखबार केवल खबरों का पुलिंदा नहीं, समाज का नैतिक दर्पण होता है। शायद यही कारण था कि उनके साप्ताहिक का नाम ‘मॉरल’ भी पाठकों के बीच एक भरोसे की तरह स्थापित हुआ। खबर जुटाने से लेकर संपादन, छपाई और वितरण तक की जिम्मेदारियां उन्होंने जिस जिद और जुनून के साथ निभाईं, वह आज की कॉरपोरेट पत्रकारिता के दौर में दुर्लभ उदाहरण है।

उनके निधन के साथ हिंदी पत्रकारिता का एक ऐसा अध्याय समाप्त हुआ है, जिसमें प्रतिबद्धता, वैचारिक स्पष्टता और निर्भीकता थी। वे उन पत्रकारों की पीढ़ी के प्रतिनिधि थे जिनके लिए पत्रकारिता पेशा नहीं, सामाजिक दायित्व भी थी।

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