मैं हेमन्त शर्मा वल्द मनु शर्मा…

मित्रो ने मेरे जन्मदिन पर जो भावनाएँ, और मंगलकामनाएँ प्रकट की है, उन सबका ह्रदय से आभार। आपकी मंगलकामनाओ से लगता है। जीवन से एक साल और बीत गया। जो उम्र मिली है, वह तेज़ी से ख़त्म हो रही है। अभी अभी कोविड से जूझकर लौटा हूं। एक बार तो लगा कि कोविड ने अपना काम कर दिया मगर आप लोगों की दुआ से वापिस लौटा हूं। जन्मदिन पर हर साल ऐसा लगता है कि मैं पंचगंगा घाट की एक सीढ़ी और नीचे उतर गया हूँ।

सो अब वक्त है पीछे देखने का। विचार करने का, अब तक क्या किया….जीवन क्या ज़िया ? बकलमखुद ,सफ़र कहॉं से शुरू किया था और कहॉं पहुंचे। बता दूँ की मेरा जीवन समतल,सपाट कभी नही रहा। इसमें आपको कहीं गड्डे ,कहीं जंगल तो कहीं खण्डहर भी मिलेंगे। पिता तेजस्वी संघर्षशील, सतोगुणी सत्य साधक रचनाकार थे, जो चपरासी से लाईबेरियन होता हुआ अध्यापक बना और मॉं इस जीवन संघर्ष में त्याग और तपस्या की प्रतिमूर्ति।

तो मित्रों, मैं हेमन्त शर्मा वल्द मनु शर्मा , क़द-पॉंच फुट दस इंच ,सफ़ेद बाल ,मूँछें काली क़ौम -सनातनी ब्राह्मण,पेशा -अख़बार नवीसी और अफ़साना नवीसी, साकिन -कबीर चौरा जिला बनारस, हाल मुक़ाम दिल्ली, ज़िन्दगी के अठ्ठावन बरस पूरे कर रहा हूँ।आस्तिक हूँ। घरेलू संस्कारों से धार्मिक हूँ।पर पोंगा पंडित नहीं हूँ। मै आधुनिक जातिविहीन हक़ीक़त को समझने वाला सर्वसमावेशी हिन्दू हूँ। किसी धर्म-जाति से परहेज़ नहीं है।मेरा धर्म मुझे मनुष्य मात्र से बांधता है। लोगों को इक्ठ्ठा कर उत्सवधर्मिता सिखाता है और जीवन को मेल-जोल, उत्सव-आनंद के साथ जीने की प्रेरणा देता है। कुल मिलाकर यही अपनी पहचान है।

संकोच था कि अपने बारे में क्या लिखूँ। अपने बारे में लिखना एक रोग है आजकल।हर कोई बैचेन है। तो मैंने सोचा कि होली दिवाली में, मैं भी ललही छठ्ठ।क्यो न लिखू ?कोरोना वायरस ने वक्त को रोक लिया है। रूके हुए वक्त में पीछे देखने को मजबूर किया है। अज्ञेय के शब्दों में, समय ठहरता नही। अगर ठहरता है तो सिर्फ़ स्मृतियों में। तो पेश है, मेरी स्मृति की मंजूषा से निकला मेरा अब तक का सफ़रनामा।

बचपन बनारस में छूट गया।जवानी लखनऊ में बीती और अब उत्तरार्द्ध में दिल्ली वास। मैंने पहले ही कहा था कि इस जीवन में गड्डे भी है और खण्डहर भी। तो शुरूआत खण्डहर से। २७ सितंबर पितृपक्ष की तृतीया के रोज़ बनारस के दारानगर के मध्यमेश्वर के पास जिस खण्डहरनुमा घर में मैं पैदा हुआ, वह खपरैल का कच्चा घर था। दालान का दरवाज़ा गिर गया था। छत छलनी थी। मिट्टी की उबड खाबड़ फ़र्श और टूटी छप्पर। पैदा होते ही ज़बर्दस्त पानी। घन घमण्ड नभ गरजत घोरा। पानी चार घंटा बरसा और छत रात भर बरसती रही। इस बरसात ने माता की प्रसव पीड़ा को भुला दिया। मॉं और दादी मिल कर रात भर छप्पर से चूते पानी के नीचे कहीं परात तो कहीं बाल्टी रखती रही और पानी से बचाने के लिए मेरा स्थान परिवर्तन करती रही।यानी मैं बरसात का आनन्द लेते हुए पैदा हुआ।इसलिए आज भी काले बादल मुझे अपनी ओर खींचते है।

बनारस का दारा नगर मुहल्ला दारा शिकोह के नाम पर है। दारा शिकोह जब अपने भाई औरंगजेब से बग़ावत कर संस्कृत पढ़ने बनारस आया तो इसी मुहल्लें में रहता था।मेरे जन्मस्थान से दो सौ मीटर बाएं काशी का प्रसिद्ध मृत्युजंय महादेव का मंदिर और दो सौ मीटर दाँए मध्यमेश्वर का प्राचीन मंदिर था। दो जागृत शिवलिंगों के बीच जन्म के कारण अपना नाता महामृत्युजय से दोस्ताना रहा। जिस खण्डहर में मैं जन्मा वह किराए का था। चन्दौली के एक बाबूसाहब का। पिता के दिन अब अच्छे होने की ओर थे। वे चपरासी से लाईब्रेरियन होत हुए अध्यापक हो चुके थे। उन्हें यह मुश्किल इसलिए उठानी पड़ी कि दादा जी का कपड़ों का कारोबार था। पर आज़ादी और आर्यसमाज के आन्दोलन में सक्रिय रहने के कारण वे कभी लाहौर जेल में होते कभी अम्बाला में। वे समाज को समर्पित थे। सो कारोबार चौपट।

पॉंच भाई बहनों का परिवार चलाने की ज़िम्मेदारी पिता के अबोध और कमजोर कन्धों पर आ गयी। इसलिए आठवीं के बाद उन्होने कभी स्कूल का मुंह नहीं देखा। दिन में फेरी लगा या फुटपाथ पर गमछे बेचते और रात में पढते । फिर प्राईवेट इम्तहान देते। इसलिए गमछे से अपना सांस्कृतिक परंपरागत रिश्ता है। लिखने पढ़ने में पिता जी को अपने नाना से सहयोग मिलता।वे साहित्यिक रूचि के थे। नाना के पिता भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के चाकर अभिवावक थे। भारतेन्दु बाबू ने अपनी लिखने वाली एक डेस्क पिता के नाना को दी। उनसे होते हुए वो डेस्क पिता और फिर मुझ तक आते आते वह लगभग लकड़ियों में तब्दील हो गयी थी पर आई। यही अपनी लेखकीय विरासत थी।

जन्म लेने के आठ महीने बाद ही हम अपने मौजूदा घर पियरी पर आ गए।इसलिए मेरी दादी और मॉं मुझे परिवार का शुभंकर मानती थी। मेरे जन्म लेने के बाद स्थितियॉ बदली।हम अपने मौजूदा घर में आ गए।राजपूताने से अहिराने में।यादवों का मुहल्ला , गाय और गोबर में बड़ा हुए।मेरे दिमाग में जो गोबर तत्व आपको मिलेगा ।शायद इसी वजह से। बग़ल में औघडनाथ तकिया। जुलाहा कबीर को ब्रह्मज्ञान यहीं हुआ। लहरतारा से कपड़ा बुन जब वे बाज़ार जाते तो यहीं ठहर औघड साधुओं से ज्ञान लेते। बड़ा वैचारिक संघर्ष का माहौल था बचपन में। बग़ल में निर्गुण कबीर। घर में परम सनातनी दादी। जिनकी सुबह रोज़ गंगास्नान और महामृत्युंजय से लेकर काशी विश्वनाथ के दर्शन से होती। और दादा जी परम आर्यसमाजी।

वे अकबरपुर ( फैजाबाद) के आर्यसमाज के संस्थापक रहे। दादी आधे दिन अपने अराध्यों, देवो की मूर्ति के सामने होतीं और दादा जी मूर्ति पूजा के सख़्त विरोधी। एक परम मूर्तिपूजक। दूसरा मूर्तिपूजा का परम विरोधी। एक कहे ‘अंत काल रघुवरपुर जाई।’ और दूसरा कहे ‘अंत काल अकबरपुर जाई ‘। घर में रोज़ सनातन धर्म के पक्ष और विपक्ष में शास्त्रार्थ होता। सोचिए एक परिवार में इतनी धार्मिक धाराएँ! यही सॉंस्कृतिक विरासत अपने मूल में है।

घर के पड़ोस में भुल्लू यादव के स्कूल में गदहिया गोल ( तब नर्सरी का यही नाम होता था ) में मेरा दाख़िला हुआ। तो भंतो ,यादव जी के अक्षर ज्ञान से अपना शैक्षिक जीवन शुरू हुआ। यादवी संस्कार मिले। दूसरी जमात तक यहीं पढ़ा। तीसरी में आधुनिक हिन्दी के जन्मदाता भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की संस्था द्वारा संचालित हरिश्चन्द्र मॉडल स्कूल पढ़ने चला।फिर दसवीं तक यहीं था।जीवन में अराजकता, उद्दडंता,शरारत, खिलंदडापन और रंगबाज़ी ने यहीं प्रवेश किया। बाहरी दुनिया से भी सामना यही हुआ।अध्यापकों से चुहलबाजी हो या स्कूल से भागकर सिनेमा देखना हो। मेरे चरित्र के चौखटे में सारे ऐब यहीं जड़े गए ।बेफ़िक्री में पगा यह शरारती स्कूली वक्त जीवन में फिर नहीं आया।

तीसरी-चौथी तो ठीक से बीती पर पॉंचवी तक आते आते बनारसी रंग चढ चुका था। मेरे जीवन मे अब तक कई नए और दिलचस्प किरदार दाखिल हो चुके थे। मोछू उनमे से एक थे। स्कूल के बाहर झाल मूडी बेचने वाले मोछू हमारे स्कूल में हमारे स्थानीय अभिभावक जैसे थे। मेरे पैसे उनके पास जमा रहते थे। हर रोज़ मूडी खिलाते फिर इक्कठे एक रोज़ पैसे लेते। कभी कभी कुछ और खाना होता तो अपने पास से भी पैसा देते। मोछू दिलदार आदमी थे।अब जईफ हो गए हैं। कबीर चौरा पर अभी भी अपनी दुकान लगाते है।मेरी बिटिया की शादी में उन्होंने मेरा आग्रह स्वीकार किया और वो दिल्ली आए ।

पढ़ाई में अपना सबसे निकट साथी अस्थाना था जो रुड़की से इंजीनियरिंग कर इण्डियन आयल में शीर्ष पर पहुँचा। बदमाशियो में मेरा अज़ीज़ जायसवाल था जिसने स्कूल से भाग कर सिनेमा देखना सिखाया। आनन्द मंदिर में उसके पिता मैनेजर थे। मैंने महज साढ़े सात बार शोले वहीं देखी।प्रोजेक्टर रूम में बैठ कर। शोले हाउस फ़ुल होती थी। प्रोजेक्टर रूम में एक छेद ख़ाली होता था जिसमें से इंटरवल में विज्ञापन वाली स्लाईड चलती थी। मुझे सिनेमा देखने के बदले इण्टरवल में वही स्लाईड खिसकानी होती थी। मैं वो कर देता था।

ज़्यादातर गुरू पिता के परिचित थे। इसलिए अपना ख़्याल रखते था। “गुरु सुआ जेहि पंथ देखावा। बिन गुरु जगत को निरगुन पावा।।” मध्यकालीन कवि जायसी की यह उक्ति मेरे जीवन पर खरी उतरती है। अगर गुरू न मिलते तो जीवन निर्गुण, निर्जीव बेजान रहता। गुरुओं का महत्व मैं बचपन से ही जान गया था। जबकि बाकि दुनियावी चीजों से अनजान था। केवल व्यवस्थित पढ़ाई ही नहीं जीवन का व्यवहारिक ज्ञान भी मुझे इन्ही गुरुओं से मिला। तमाम अपराधों और शरारतों के बाद भी मैं स्कूल से लेकर विश्वविद्यालय तक अपने गुरुओं का हमेशा प्रिय रहा।

आज जब मैं गुरुजनों तो याद करने के लिए पीछे मुड़ता हूं तो ग्लानि भी होती है। लड़कपन के चलते गुरुओं से शरारत भी हुई और अवज्ञा भी। पर आज जो हूं “बलिहारी गुरू आपने”। जीवन के प्रति जो समझ बनी उनके कारण भी यही गुरूजन थे। हालांकि कुछ गुरुओं के साथ कुछ अलग किस्म के तजुर्बे भी हुए। लड़कपने के जोश में कभी कभी मैं होश भी खो बैठा।ज्यादा पीछे का याद नहीं, पर उस दौरान 9वीं में पढ़ता था। हमारे क्लास टीचर श्रीवास्तव जी थे। विद्वान आदमी थे। कोर्स के अलावा गुरू-शिष्य सम्बंधों की बारिकियां भी समझाते थे। अच्छे विद्यार्थी के क्या लक्षण होते हैं।

वे हमें नागरिक शास्त्र पढ़ाते थे। पर गुरू न जाने घर में क्या करके आते कि क्लास में आते ही सोने लगते। पढ़ाते-पढ़ाते सो जाते। कुछ छात्रों ने विचार किया कि ऐसा क्या करें कि गुरू चेते। कक्षा को शयन कक्ष न समझें। एक रोज हम सब विद्यार्थी गुरू के सोते ही, क्लास के बाहर निकल गए और बाहर आ दरवाजे की कुण्डी लगा दी। प्रिंसिपल प्यारे कृष्ण जुत्शी राउंड पर आए। उन्होंने पहले ही पीरियड के दौरान छात्रों को बाहर देखा तो कुपित हुए। श्रीवास्तव जी के खर्राटें सुने। उन्हें अपने साथ लिवा ले गए। कहते हैं कि उन्हें उस रोज काफी फटकार लगाई गई। गुरु जी ताड़ गए कि इस घटना के पीछे हम तीन लोग है। सो उन्होंने अब हमें निशाने पर रखा। हर रोज किसी न किसी सवाल पर बहाने से हमें क्लास में खड़ा कर देते। इस बात से गुस्साए हम मित्रों से एक पाप हो गया। इस अपराध में सिर्फ मैं ही शामिल नहीं था। तीन-चार मित्र और थे। आज जब सोचता हूं तो लगता है कि बड़ा भारी अपराध हुआ था। दरअसल गुरु सोने की आदत छोड़ नहीं रहे थे। पांच मिनट पढ़ाते फिर सोने लगते। गुरु के व्यक्तित्व का सबसे आकर्षक हिस्सा उनका ‘हाइड्रोसील’ था। उसे देख हमें दुनिया कि गोलाई का अंदाज लगता था।हम बच्चो की उत्सुकता का केन्द्र भी।

हम स्कूल में अकसर यहां वहां निशाना लगाया करते थे। एकदम से उस रोज दिमाग चला, क्यों न निशाने पर इस बार गुरु का आकर्षक हिस्सा हो ? तय हुआ कि गुरु की सोने कि आदत छुडाने के लिए समाज के लिए यह महान कार्य करना है। पर निशाना लगाएगा कौन? इस महान लक्ष्य के लिए दो लोग आगे आए। मैं और एक मेरा दोस्त जयसवाल। बेचारा जयसवाल हिचक रहा था। मैंने कहा सोचो मत। कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। कर्म करो फल की चिन्ता न करो वत्स यह भगवान कृष्ण ने कहा है। हिचक अपने आप कम हो जाएगी। फिर भी वह पीछे हट रहा था। गुरु ने “मौलिक अधिकार” पढ़ाना शुरू ही किया था । मैंने चाक के चार टुकड़े कर उसे थमाए और कहा मित्र कर्तव्य पथ पर आगे बढ़ो। पहली ही चाक निशाने पर लगी। गुरु बिलबिला उठे ।पीड़ा से छटपटाते गुरुदेव गालियां दे रहे थे। “नराधम, कृतघ्न, पातकी, नीच। कौन है? सामने आओ। छोडूंगा नहीं। आज ही स्कूल से बाहर होगा।” लेकिन इस डांट में ज्यादा रौद्र रस नहीं था। करूणा का संचार हो रहा था क्योंकि गुरु साथ-साथ कराह भी रहे थे।

गुरुदेव परेशान थे। तय हुआ की तलाशी ली जाय। ‘चाक किसके पास है’। फिर नाराज गुरुदेव क्लास छोड़ चले गए। हमें अपनी गलती का एहसास होने लगा था। दूसरे रोज़ मैं और मेरा मित्र ग्लानि से आकंण्ठ मग्न थे। हमारा चेहरा देख गुरु को कुछ अहसास हो गया।

गुरुदेव ने पूछा, कल तुम्ही लोग थे? मैंने कहा नहीं गुरुदेव हम तो ऐसा कैसे कर सकते हैं। आपसे ज्यादा हम आपके ‘हाइड्रोसील’ का ख्याल रखते हैं। “तुम्हारे इस बेहूदे जवाब से लगता है कि तुम्ही लोग होगे। क्या करते हैं तुम्हारे पिता? मैंने कहा “अध्यापक हैं।” गुरुदेव चुप रहे। फिर धीरे से बोले “अध्यापक के बेटे होकर ऐसा नहीं कर सकते”। गुरु का गुस्सा गायब था। सिर्फ अध्यापक का पुत्र मान गुरु का इतना बड़ा विश्वास!! इस ‘इम्यूनिटी’ से हम और ज्यादा अपराध बोध में डूब गए। इस घटना से मेरे भीतर गुरुओं के प्रति अपार श्रद्धा की बुनियाद पड़ी। इसके बाद मैंने किसी गुरु के इस हिस्से को देखा तक नहीं| …. जारी…

टीवी9भारतवर्ष न्यूज चैनल के संस्थापक और वरिष्ठ पत्रकार हेमंत शर्मा की एफबी वॉल से.

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One comment on “मैं हेमन्त शर्मा वल्द मनु शर्मा…”

  • अच्छा लगा.. ऊम्मीद है आगे का हिस्सा भी जल्द ही आयेगा..अपने अजीज मित्र रजत शर्मा की मित्रता के बारे में भी जरुर खुलासा करें.

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