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उत्तर प्रदेश

भड़ास एडिटर की सपा मुखिया से मुलाकात (पार्ट-2) : सबको आने दो, दरवाजे खोल दो!

यशवंत सिंह-

समाजवादी पार्टी लखनऊ ऑफिस अंडरग्राउंड ऑडिटोरियम में प्रेस कांफ्रेंस ख़त्म करने के बाद अखिलेश यादव जी बग़ल के एक कक्ष में चले गये और कक्ष गेट पर सुरक्षा कर्मियों व ‘टीम अखिलेश’ के नेतृत्वकारी लोगों का पहरा हो गया।

मनीष यादव जी मेरा हाथ पकड़े ले जाने लगे। मैं थोड़ा असहज हो रहा था, क्योंकि मुझे आईडिया नहीं था ऐसे भी मुलाक़ात हो जाया करती है। गेट पर आशीष जी मिले, जो अखिलेश जी को किन-किन से मिलना है, तय करते हैं, उनकी हरी झंडी के बाद सिक्योरिटी टीम अंदर प्रवेश करने देती है। संभवतः मनीष भाई ने पहले से लाइनअप कर रखा था इसलिए हम लोग सहज ही ओके ओके सुनते पाते घुसते गए।

अंदर अखिलेश जी झक सफ़ेद दाढ़ी मूँछ वाले एक बुजुर्ग लीडर से बातचीत में व्यस्त थे।

नेता जी मुलायम सिंह यादव की आदमकद प्रतिमा के नीचे बैठे अखिलेश यादव सहज संदेश दे रहे थे कि वे मज़बूत नींव पर पल्लवित एक जगमग सितारे हैं जिसे उन धरती में गड़े मज़बूत ईंटों का एहसास है जिनके दम पर सितारों भरा आकाश रोशन है!

नेताजी की प्रतिमा जैसे सब कुछ मौन देख निहार रही हो।

अंदर घुसते ही मनीष जी ने अखिलेश जी से मेरा परिचय कराया। वे खड़े होकर गर्मजोशी से हाथ मिलाये और बैठने के लिए कहा। अब वो दो लोगों से एक साथ मुखातिब थे। अपने दायें बुजुर्ग लीडर से, अपने बायें बैठे मुझ भड़ासी से।

मेरे पास बोलने के लिये कुछ ज़्यादा नहीं था। पहली मुलाक़ात में वैसे भी क्या कहा बोला जा सकता है।

भड़ास की सोलह साल की यात्रा में अपना नाम-बदनाम सब जगह तो पहुँचा लेकिन अपन कहीं नहीं पहुँचे। अपनी सड़क छाप जनता छाप वाली दुनिया में मस्त मसरूफ़ रहा। पचास की उम्र होने के बाद आंतरिक रूप से बदला। क्रांति से शांति का नारा दे दिया। अब सहज भाव से जीना है। सब जगह जाना है। सबसे मिलना है। बेवजह किचकिच किचाइन से भरसक बचना है। इस क्रम में जो जहां ले जाता है, चल देता हूँ। अतिवादी से मध्यमार्गी हो गया हूँ। अब तक दुनिया बदलने में लगा था। अब ख़ुद को बदल रहा हूँ। अप्प दीपो भव को अपना लिया। इसलिए बाहरी जगत में कुछ भी त्याज्य नहीं, कुछ भी अस्वीकार नहीं।

अखिलेश जी जब पहली दफे सीएम बने थे तो उस परिघटना को क़रीब से देखने वालों को पता होगा कि उनका व्यक्तित्व अराजनीतिक ज़्यादा लगता था। किसी चॉकलेटी हीरो माफ़िक़ जनता का दिल जीत कर एंट्री मारे थे। वो अखिलेश और थे। अपने ख़ानदानियों से घिरे। कहने को अखिलेश सीएम थे लेकिन शासन चाचा पापा बाबा भइया लोग चला रहे थे। अखिलेश जी लर्निंग प्रोसेस में थे। वो राजनीति के स्पेस में सफल लॉंच थे। उन्हें अब सियासी टेरिटरी के नये लेवल पर प्रक्षेपित होना था। इसके लिए एक रणनीतिक धैर्य के साथ इंतज़ार करना था। उनके इर्द गिर्द संचालित ढेरों इंजन अपने अपने ईंधन खर्च कर ऊर्जहीन होते गये, नेपथ्य में ग़ायब होते गये। अब सिर्फ़ और सिर्फ़ अखिलेश बचे हैं। अब अखिलेश सपा हैं और सपा अखिलेश है।

जातीय – धार्मिक ध्रुवीकरण के पहियों से संचालित यूपी की भदेस राजनीति में अखिलेश उस ताजी हवा की तरह हैं जिन्हें मर्यादा की लक्ष्मणरेखा पता होती है। वे अतिवाद को बोलने से बचते हैं। वे अतियों को जीने से बचते हैं। वे समझदार पढ़े लिखे शहरी से लेकर भदेस देसी, दोनों को अपनी शालीन सियासत से लुभाते हैं। उन्होंने माफियाओं, कट्टरपंथियों, धंधेबाज़ों के चंगुल में जाने से ख़ुद को बचाया और एक रेशनल लीडर के बतौर ख़ुद को एवोल्व करते गए। एक चुंबकीय आकर्षण अपने इर्द गिर्द बुनते गये। लेफ्ट, सेंटर, सोशलिस्ट, डेमोक्रेटिक, लिबरल हर क़िस्म के धूमकेतु चुंबकीय खिंचाव के इर्द गिर्द सुसंगत तरीक़े से मंडराने लगे। ये प्रचंड मजबूती के संकेत हैं।

भीड़ के कमरे के भीतर आने का दबाव गेट पर खड़े लोगों की तरफ़ से आते शोर से महसूस हो रहा था। अखिलेश जी ने कहा- “सबको आने दो, एक एक कर मिलाते फोटो खिंचाते विदा कराते रहो।”

वे किसी का दिल तोड़ना नहीं चाहते थे। जो थे सब अपने ही तो थे। अलग अलग भूमिकाओं को निभाते अलग अलग क़िस्म के नेता कार्यकर्ता। ढेरों लोग अंदर आ गये। फोटोग्राफर ने अपने पीछे सबको लाइन में लगाया। एक-एक को आगे बढ़ने का इशारा करता। सिंगल सिंगल पीस में लोग अपने नेता से मिलते, अपनी बात कहते, फोटो खिंचाते और कमरे से बाहर निकल जाते। अखिलेश जी ने सहज भाव से ये ज़रूरी कार्य संपन्न किया। जिससे मिले, सबको पहचाने, उसको इसका एहसास कराया- तुम अपने हो, तुम्हें जानता हूँ, खूब जुट कर काम करो।

सब ख़ुशी ख़ुशी विदा हुए।

नेता ऐसा ही होता है। नेताजी भी तो ऐसे ही थे।

लखनऊ की टीवी पत्रकारिता की प्रतिभावान तिकड़ी संजय त्रिपाठी, रतीश और विवेक ने कमरे में एंट्री मारी। इन तीनों भाइयों-मित्रों से एक दिन पहले जिस होटल में रुका था, वहाँ मुलाक़ात हो चुकी थी इसलिए यहाँ हम एक दूसरे को देखकर थोड़ा चौंके- अरे आपभी यहाँ!

तीनों युवा और प्रतिभाशाली पत्रकार साथी मेरे और मनीष के बग़ल में बैठ गये। हम पाँच हुए। अखिलेश जी से बातों का सिलसिला शुरू हुआ। कुछ ऑफ दी रिकॉर्ड कुछ ऑन दी रिकॉर्ड बतकही होती रही। कुछ भड़ास मीडिया के बारे में तो कुछ सियासी भड़ास को लेकर चर्चा हुई। किसी ने अपने मोबाइल फ़ोन से किसी अपने सीनियर से अखिलेश जी की बात कराई तो किसी ने अपने फ़ोन के वीडियो कॉल से सपाइयों के एक आयोजन के उदघाटन को ऑनलाइन आग़ाज़ करवाया। मोबाइल फ़ोन से पलटकर आती समवेत आवाज़ साफ़ साफ़ सुनाई पड़ रही थी- अखिलेश भइया ज़िंदाबाद।

हाथ आशीर्वाद की मुद्रा में उठाये वीडियो कॉल वाली मोबाइल स्क्रीन पर चमकती आँख गड़ाये अखिलेश भइया हंस मुस्कुरा और बोल बतिया रहे!

कमरे से एक लिफ्ट कनेक्ट थी, जिससे एकाध मिलने जुलने वाले लोग ले आये ले जाये जाते रहे। प्रबंधन इतना सही कि भड़भड़ की स्थिति तनिक न आई। बहुत कुछ हो रहा था, कुछ पता भी नहीं चल रहा था। मेरी नज़र बार बार नेताजी की आदमकद प्रतिमा पर जाकर टिकती और उनकी शक्ल निहारने लगता। ये आदमी कितना वैविध्यपूर्ण, चमत्कारिक और ज़मीनी था, इसका ठीकठीक अंदाज़ा अभी तक लोग लगा नहीं पाये होंगे। वारिस के सामने और विरासत के आगे बहुत बड़ी लकीर खिंची हुई है। पारंपरिक केंचुल उतार फेंकती आधुनिक राजनीति के बहुत बलवान आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस को मात देना है। काम आसान नहीं है। बहुत से बंद दरवाज़े हैं। गेम के कई लेयर और लेवल हैं।

यही सब सोचता अंत में मैंने ही अपनी तरफ़ से विदा देने का अनुरोध किया क्योंकि अखिलेश जी से भीड़ की एक नई खेप मिलने को तैयार हो भीतर घुसने पर आमादा थी। उन्होंने मिलते रहने को कहा। मैंने मिलकर अच्छा लगा बोला। फिर हाथ मिलाए और चल दिये। दरवाज़े पर भीड़ को दम साधे रोके थी सिक्योरिटी। भीतर से वही आवाज़ आई- सबको आने दो, दरवाज़ा खोल दो।

“सबको आने दो, दरवाजे खोल दो।” मेरे कानों में गूंजने लगा। समाजवादी कितने देर बंद रख पायेंगे दरवाज़े। उन्हें सबके लिए खोलना ही होगा दरवाज़ा। एक सर्वप्रिय नेता ऐसे ही बनता है।

अखिलेश जी से आँख बचाकर दस सेकंड का ये वीडियो अपन ने चुपके से बना लिया-

https://youtube.com/shorts/dBg8anCLkeU?si=1MVHowB8lOZzBYTv


इसके पहले का पार्ट पढ़ने के लिए नीचे क्लिक करें-

https://www.bhadas4media.com/yashwant-ki-akhilesh-yadav-se-mulakat/

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