गिरीश मालवीय-
आज भारत के चीफ जस्टिस (CJI) सूर्यकांत ने एक केस के सिलसिले में बेरोजगार युवकों की तुलना कॉकरोच से करते हुए कहा कि उनमें से कुछ मीडिया, सोशल मीडिया और आरटीआई एक्टिविस्ट बन जाते हैं और हर किसी पर हमला करना शुरू कर देते हैं। (There are youngsters like cockroaches, who don’t get any employment and don’t have any place in the profession. Some of them become media, some of them become social media, some of them become RTI activists)


इस टिप्पणी को लेकर देश में बड़ी बहस शुरू हो गई है लेकिन जस्टिस सूर्यकांत पहले व्यक्ति नहीं है जिन्होंने किसी युवा की तुलना काकरोच से की है फ्रेंज काफ्का एक मशहूर जर्मन कथाकार थे उन्होंने एक कहानी The Metamorphosis लिखी थी जिसमें ठीक यही कल्पना की गई है
कहानी का मुख्य पात्र ग्रेगर साम्सा है, जो एक सेल्समैन है। एक सुबह वह नींद से उठता है और पाता है कि वह एक कॉकरोच जैसे जीव में बदल चुका है। उसका परिवार उसके बारे में क्या सोचता है समाज उसे किस नजरों से देखता है उसकी खुद की राय अपने बारे में किस तरह से बदलती है कहानी इस विषय पर है कहानी का अंत दुखांत है उपेक्षा, अकेलेपन और मानसिक पीड़ा के कारण ग्रेगर की मृत्यु हो जाती है।
इस एक कहानी ने फ्रेंज काफ्का को अमर कर दिया , जस्टिस सूर्यकांत को एक बार यह कहानी जरूर पढ़नी चाहिए।

कारवां हिंदी एफबी पोस्ट में लिखता है-
सूर्यकांत पर गंभीर अनियमित्ता के आरोप हैं. 2012 में एक रियल एस्टेट एजेंट ने सूर्यकांत पर कम कीमत दिखा कर करोड़ों रुपए की संपत्ति का अवैध कारोबार करने का आरोप लगाया था. 2017 में पंजाब में एक कैदी ने याचिका दायर कर सूर्यकांत पर 8 मामलों में रिश्वत लेकर जमानत देने का आरोप लगाया. इस याचिका पर छह सालों तक कॉलेजियम ने सुनवाई नहीं की और वे पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के जज बने रहे.
अक्टूबर 2018 में उन्हें हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट का मुख्य न्यायाधीश बना दिया गया और अब उनके खिलाफ शिकायतों का निवारण किए बिना कॉलेजियम ने उन्हें मुख्य न्यायाधीश नियुक्त कर दिया. एक पूर्व जज के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट में सूर्यकांत को पदोन्नत करने के लिए भी कॉलेजियम यही करने वाला है.
युवाओं! आने वाली पीढ़ी को समाज और सत्ता दिशा नहीं दे पा रहा है तो युवा शक्ति कॉकरोच?
लगता है भारत के चीफ जस्टिस के भेजे में मोटी चर्बी जमा हो चुकी है और इनकी अपनी औलादे सिस्टम में सेट हैं। जीवन के संघर्ष से कोई वास्ता नहीं रहा?
हर गुजरती पीढ़ी ने आती पीढ़ी को कमअक्ल, अधीर, नासमझ कहा। मानो हरेक अपनी जवानी में आदर्श रहा हो? हमारे साथ भी यही हुआ। हम भी यही कर रहे हैं। भूल जाते हैं, इन्हीं में हमारी अपनी संतानें भी हैं।
हम भूल जाते हैं, बड़े बाप की औलादें तभी तक सुरक्षित हैं, जब तक ये कॉकरोच बेकाबू नहीं हो रहे हैं। हालांकि हालात बता रहे हैं, वक्त के बेकाबू होने में ज्यादा वक्त नहीं बचा।
कहां तक भागोगे चीफ जस्टिस साहब? अमेरिका? फ्रांस या ब्रिटेन? कॉकरोच हर कहीं फैल चुके हैं। मनुष्य निर्माण की फैक्ट्री परिवार और समाज को तबाह करने के असल गुनहगार आप मी लॉर्ड की शक्ल में जंतु ही हैं। भारत को आपके कानून ने ध्वस्त किया। हर रोज! तिनका-तिनका मारा! -सुमंत कबीर
डॉ राकेश पाठक-
अदालतों में बैठे ‘कॉकरोचों’ के बारे में आपके क्या विचार हैं माय लॉर्ड? देश के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्य कांत ने कहा है- “न्याय व्यवस्था पर परजीवी हमला कर रहे हैं। कुछ युवा ऐसे हैं जो ‘कॉकरोच’ की तरह हैं।
उन्हें कोई रोजगार नहीं मिलता, पेशे में कोई जगह नहीं मिलती। उनमें से कुछ मीडिया में चले जाते हैं, कुछ सोशल मीडिया पर सक्रिय हो जाते हैं, कुछ RTI एक्टिविस्ट बन जाते हैं और कुछ दूसरे तरह के एक्टिविस्ट बनकर हर किसी पर हमला शुरू कर देते हैं।”
हमारे सवाल..
- क्या छोटी से लेकर ऊंची और सबसे ऊंची अदालत में भी ऐसे ही परजीवी, ऐसे ही कॉकरोच हैं?
- ऊंची अदालत वाले जिन न्यायमूर्ति के घर नोटों का जखीरा मिला क्या आप उन्हें आप परजीवी कहना चाहेंगे?
- ऊंची अदालत वाले एक न्यायमूर्ति ने हिंदू मुस्लिम वाला संविधान विरोधी भाषण दिया था क्या आप उन्हें कॉकरोच कहना चाहेंगे?
- उपरोक्त न्यायाधीशों की किसी भी तरह का कोई दंड नहीं दिया गया। तो जिन जिम्मेदार लोगों ने दंड नहीं दिया उन्हें कॉकरोच कहना चाहेंगे?
सवाल तो बहुत हैं माय लॉर्ड..! लेकिन देश की एक पूरी की पूरी पीढ़ी को परजीवी और कॉकरोच कहने पर हम आपको ससम्मान लानत भेजते हैं। अगर उचित लगे तो कृपया ‘अन्यथा’ ले लीजिए। शेष शुभ नहीं है।



